IAS Mittali Sethi: आज के दौर में जहां अधिकांश अफसर और अमीर परिवार अपने बच्चों को महंगे निजी स्कूलों (Private Schools) में पढ़ाने को प्रतिष्ठा मानते हैं, वहीं महाराष्ट्र की IAS अधिकारी मित्ताली सेठी (IAS Mittali Sethi) ने एक साहसिक और प्रेरक फैसला लिया है। उन्होंने कलेक्टर होने के बावजूद अपने दोनों बच्चों का दाखिला जिला परिषद (Zilla Parishad) के सरकारी स्कूल में कराया है। उनका यह कदम न केवल एक मिसाल बन गया है बल्कि पूरे महाराष्ट्र में शिक्षा और समानता की नई सोच को जन्म दे रहा है। सोशल मीडिया पर लोग उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।
कलेक्टर मैडम खुद लेकर पहुंचीं बच्चों को स्कूल
महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल नंदुरबार जिले में तैनात कलेक्टर मित्ताली सेठी ने हाल ही में अपने दोनों बच्चों का एडमिशन जिला परिषद स्कूल में कराया। खास बात यह रही कि उन्होंने किसी अधिकारी को नहीं भेजा, बल्कि खुद माता की भूमिका निभाते हुए बच्चों का हाथ पकड़कर स्कूल पहुंचीं। यह स्कूल एक साधारण सरकारी प्राथमिक विद्यालय है, जहां ज्यादातर बच्चे आदिवासी समुदाय से आते हैं और अहिराणी (Ahirani) भाषा बोलते हैं। यही वजह है कि यह निर्णय लोगों के दिल को छू गया।
सरकारी स्कूलों पर भरोसा जताने वाली अफसर
आईएएस मित्ताली सेठी ने यह कदम यह दिखाने के लिए उठाया कि सरकारी स्कूल भी बच्चों को बेहतरीन शिक्षा दे सकते हैं। वह मानती हैं कि सरकारी स्कूलों की स्थिति तभी सुधरेगी जब समाज के सभी वर्ग अपने बच्चों को वहां भेजने का भरोसा दिखाएंगे। नंदुरबार जिला शिक्षा के क्षेत्र में लगातार सुधार कर रहा है। मित्ताली के इस फैसले ने वहां के शिक्षकों और अभिभावकों का उत्साह और भी बढ़ा दिया है।
कौन हैं IAS Mittali Sethi:?
मित्ताली सेठी (IAS Mittali Sethi) महाराष्ट्र कैडर की 2017 बैच की आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने अपने तीसरे प्रयास में UPSC सिविल सेवा परीक्षा में 56 वीं रैंक हासिल की थी। दिलचस्प बात यह है कि एक समय उन्हें IAS का अर्थ भी नहीं पता था। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि मैंने कभी UPSC परीक्षा के नजरिए से अखबार भी नहीं पढ़ा था, लेकिन जब मैंने लोगों की जिंदगी बदलने की कहानी सुनी, तो उसी दिन तय कर लिया कि मुझे यही करना है।
डॉक्टर से आईएएस बनने तक का सफर
मित्ताली पेशे से डेंटिस्ट (Dentist) हैं। उन्होंने अमृतसर से BDS और चेन्नई से ऑर्थोडॉन्टिक्स में मास्टर्स (MDS) किया। उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट वह दिन था जब वह महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में एक युवा शिविर में शामिल हुईं। वहां उन्होंने विकास कार्यों में लगे लोगों को देखा और महसूस किया कि असली बदलाव दवाइयों से नहीं, नीतियों से आता है। यहीं से उन्होंने सिविल सेवा की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने बिना कोचिंग के तैयारी की, कई ऑनलाइन टेस्ट सीरीज़ दीं और असफलताओं के बाद भी हार नहीं मानी। तीसरे प्रयास में उन्होंने UPSC पास कर अपने सपने को हकीकत में बदला।
नंदुरबार में विकास की नई पहचान
कलेक्टर बनने के बाद मित्ताली सेठी ने नंदुरबार जिले को आदिवासी विकास की मिसाल बनाने की ठानी। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, पोषण और बाल विकास पर कई योजनाएं शुरू कीं। जिले में आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए उन्होंने न केवल डिजिटल लर्निंग प्रोग्राम शुरू किया बल्कि शिक्षकों के लिए ट्रेनिंग वर्कशॉप भी आयोजित की। उनकी पहचान एक ग्राउंड लेवल अफसर (Field-Oriented Officer) की है जो ऑफिस से ज्यादा गांवों और स्कूलों में दिखाई देती हैं।
‘सरकारी स्कूल, सरकारी जिम्मेदारी’ का संदेश
मित्ताली का मानना है कि अगर सरकारी अफसर अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजेंगे, तो वहां की शिक्षा गुणवत्ता अपने आप सुधरेगी। उन्होंने कहा था कि अगर हमें सरकारी स्कूलों में सुधार लाना है, तो पहले हमें उन पर भरोसा करना होगा। मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे वही सीखें जो इस देश का हर बच्चा सीखता है। उनका यह कदम “Equal Education Opportunity” की दिशा में एक ठोस संदेश देता है कि शिक्षा केवल अमीरों का अधिकार नहीं, बल्कि हर बच्चे का हक है।
महाराष्ट्र में बढ़ रही चर्चा
पूरे महाराष्ट्र में मित्ताली की इस पहल की चर्चा हो रही है। लोग उन्हें “रियल रोल मॉडल IAS” कह रहे हैं। उनके इस फैसले ने यह साबित किया है कि परिवर्तन ऊपर से भी शुरू हो सकता है बस नियत ईमानदार होनी चाहिए। आईएएस मित्ताली सेठी का यह कदम दिखाता है कि सच्चा बदलाव आदेशों से नहीं, व्यवहार और उदाहरण से आता है। सरकारी स्कूल में अपने बच्चों का दाखिला कर उन्होंने न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था में भरोसा जगाया, बल्कि समाज को यह सिखाया कि समानता की शुरुआत अपने घर से होती है।
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