Home Leaders Speak आपदा में देवदूत बनकर आते हैं एनडीआरएफ जवान

आपदा में देवदूत बनकर आते हैं एनडीआरएफ जवान

207
0
SHARE
 
जब भी हम आपदा और विपत्ति में होते हैं, हमें सिर्फ एक ही नाम आता है एनडीआरएफ, मुसीबत में फंसे लोगों की जान बचाने के लिए एनडीआरएफ के जवान देवदूत बनकर सामने आते हैं। 19 जनवरी यानी कि एनडीआरएफ रेजिंग डे, इस खास मौके पर बातचीत करने के लिए हमारे साथ मौजूद है एनडीआरएफ के डीजी एस एन प्रधान। The CSR Journal में आपका बहुत-बहुत स्वागत है।

देश के कोने में कहीं भी आपदा होती है, तो देवदूत के रूप में एनडीआरएफ हमेशा हमारे सामने होती है। साल 2020 पूरे विश्व के लिए आपदा रही, भारत में भी कोरोना ने जिंदगीयों को प्रभावित किया, कोरोना काल एनडीआरएफ के लिए कैसा रहा। किस तरह से एनडीआरएफ ने लोगों की मदद की?

एनडीआरएफ आपदा मोचन के रूप में जानी जाती है। जो भी आपदा देश के सामने आएगी उससे लड़ना एनडीआरएफ का कर्तव्य है। हमारी ड्यूटी है। उसी के मद्देनजर हम लोगों ने पूरी तैयारी के साथ, पूरे जोश के साथ, कोरोना से लड़ाई का सामना किया। हमारे लिए यह डबल चैलेंज था। हम लोग को तूफ़ान से भी सामना करना था, बाढ़ को भी फेस करना था, कोई मानव निर्मित डिजास्टर है जैसे कि विशाखापट्टनम में गैस लीकेज हुआ उसको भी हमें सामना करना था और इन सभी को हम उस परिपेक्ष में फेस कर रहा थे जब कोरोना काल था। कहने का मतलब है कि हम लोग डिजास्टर के भीतर डिजास्टर को फेस कर रहे थे। यह अपने आप में बड़ा ही चैलेंज था। क्योंकि हम लोग फ्लड्स को फेस करते हैं, साइक्लोंस को फेस करते हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि महामारी के समय हम नैसर्गिक आपदाओं को भी फेस करें हो। हमें बहुत मुकम्मल रूप से तैयारी करना पड़ा। पहले जो जान बचाता है हमने उसको तैयार किया। ताकि कोविड-19 में भी हमारा एनडीआरएफ का जवान रेस्क्यू कर सके। रेल एक्सीडेंट में काम कर सके। यह हमारे लिए बहुत अहम तैयारी थी। इसके लिए हमें जनवरी से तैयारी करनी पड़ी थी। हम आपको बता दें कि जो वुहान से पहली फ्लाइट आ रही थी और ऐसी चर्चा थी कि हो सकता है कि उस लाइट में इनफेक्टेड लोग रहे, उस वक्त भी पहले हमारी ही टीम एयरपोर्ट पर पहुंची थी। वहां से जो सिलसिला शुरू हुआ था आज तक लगातार चल रहा है। और मुझे बताते हुए बड़ी खुशी हो रही है कि इस कोरोनावायरस के काल में हमने 4 बड़े बड़े तूफानों का सामना किया। हमने इम्फान का सामना किया, हमने निसर्ग का सामना किया, यह बहुत बड़ा तूफान था। आजाद भारत के इतिहास का दूसरा सबसे सुपर साइक्लोन था और उसके तुरंत बाद निसर्ग तूफान ने हमें प्रभावित किया। जिसके लिए ईस्टर्न इंडिया से हमें वेस्टर्न इंडिया में तुरंत एअरलिफ्ट करना पड़ा। इसी बीच और भी चुनौतियां आई जैसे कि फ्लड्स हुए, खासकर शहरी इलाकों में, यानी पटना में जो बाढ़ आई उसने भी हमें प्रभावित किया, हैदराबाद में बाढ़ आई, उसके बाद हमने देखा कि मैन मेड डिजास्टर हुए। पूरा साल भर इसी तरह से हम आपदाओं से निपटते रहे। इस दरमियान हमने बहुत कड़े प्रोटोकॉल्स को फॉलो किया, बहुत डिसिप्लिन वे से हमने काम किया और इसका नतीजा यह हुआ कि हम अपना मोराल बनाए रखें। हम लोगों ने विषम परिस्थितियों में भी जज्बा रखा और मैं बहुत गौरवान्वित हूं कि किसी भी हमारे शख्स ने यह नहीं कहा कि मैं कोविड काल में काम नहीं करुंगा।

बिल्कुल सही कहा आपने कि आपदा के अंदर एक बड़ी आपदा थी। इस दौरान आप लोगों को काम करना बड़ा ही चैलेंजिंग रहा होगा। आपने जिक्र किया कि एक तरफ हम तूफान से लड़ रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ हम कोरोना की जंग को भी जीत रहे थे। प्रिकॉशंस बहुत लेने थे, सोशल डिस्टेंसिंग को फॉलो करते हुए और तमाम बाधाओं के बीच भी आप लोग एक वरीयर, एक हीरो की तरह सामने आए। आपसे जानना चाहेंगे सोशल डिस्टेंसिंग का फॉलो करते हुए भी आप लोग लोगों के बीच जाकर मदद के हाथ बढ़ा रहे थे यह कैसे संभव हो पा रहा था?

शुरुआत में थोड़ा सा चैलेंजिंग रहा क्योंकि हमें बाढ़ के अंदर जाकर लोगों को रेस्क्यू करना था, यह जानते हुए भी कि आधा से ज्यादा गांव कोविड पॉजिटिव है, आधा से ज्यादा इलाका कोविड से प्रभावितहै। यह कोई ऑप्शन नहीं है कि बाढ़ से घिरा हुआ गांव और अगर वह कोविड प्रभावित है तो आप उसको नहीं बचाएंगे। एनडीआरएफ का हर एक जवान इसको बखूबी समझता था कि अगर कोई गांव प्रभावित भी है तो भी वो रेस्क्यू होगा ही होगा। यह जरूर मैं कहना चाहूंगा कि इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशंस के दरमियान हर एक एनडीआरएफ का जवान एहतियात बरत रहा था। हम जो नॉर्मल कपड़े पहन कर जाते थे रेस्क्यू करने के लिए अब हमें बदलना पड़ा। हमें कुछ ऐसा जुुगाड़ करना पड़ा कि हमारे एनडीआरएफ के जवानों के हाथ, पैर, मुंह का हिस्सा ढका रहे। जो वॉटरप्रूफ हो, ऐसे पीपीई किट का हमने इजात किया जो अपने आप को सुरक्षित रखते हुए लोगों को भी हम सुरक्षित रख सकें। यहां तक कि हम ये भी कर रहे थे कि बोट से अगर किसी को रेस्क्यू कर बाहर गांव से लाया जा रहा है तो हम पहले उसको सैनिटाइज करते थे, उसको मास्क देते थे और फिर हम उनको बचाकर बाहर लेकर आते थे। हर एक की जान हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी, गुजरात से लेकर वेस्ट बंगाल तक, हर जगह आप लोगों की मौजूदगी है। कहीं भी कोई भी अप्रिय घटना घटती है तो तुरंत मौके पर पहुंच कर आप लोग रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर देते हैं। क्योंकि आप सेंट्रल बॉडी है, तो स्टेट के साथ कोआर्डिनेशन में कोई कहीं दिक्कत तो नहीं आती?

हमें बहुत गर्व होता है यह कहते हुए कि एनडीआरएफ एक ऐसा फोर्स है जिसका हर राज्य बहुत अच्छी तरह से स्वागत करता है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मैं एनडीआरएफ का डीजी हूं, मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह मेरा भी तजुर्बा है और हमारे जितने भी जवान है उनका भी तजुर्बा है। एनडीआरएफ एक पॉजिटिविटी का साइन लेकर आता है। हर नागरिक के दिलों में और हर राज्य में हम जगह बना पा रहे हैं और जहां तक कोआर्डिनेशन का सवाल है मुझे बहुत खुशी है यह कहते हुए की कि किसी भी स्टेट में हमें कोई भी प्रकार की समस्या का कोई सामना नहीं करना पड़ रहा है।

डिजास्टर मैनेजमेंट के जरिए आपदाओं का जो प्रभाव है उसको कम किया जा सकता है। नुकसान को कम किया जा सकता है। इसको लेकर आप लोग बड़े पैमाने पर अवेरनेस प्रोग्राम चलाते हैं। क्या कहेंगे आप कम्युनिटी अवेयरनेस प्रोग्राम को लेकर?

बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल आपने उठाया है क्योंकि डिजास्टर रिस्पांस के क्षेत्र में यह कहा जाता है कि कम्युनिटी इज द फर्स्ट रेस्पोंडेंट। डिजास्टर के दायरे में देखा जाए तो कम्युनिटी ही सबसे पहले आपदा का सामना करती है। डिजास्टर होने के पहले घंटे में कम्युनिटी ही अपने आपको सबसे पहले संभालती है। डिजास्टर के दरमियान पहले कम्युनिटी अपने आप को संभाल ले उसके बाद फिर डिजास्टर एजेंसीज कम्युनिटी को संभालेंगे। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि वही नेशन सबसे ज्यादा डिजास्टर रेडी होता है जहां कम्युनिटी डिजास्टर रेडी होती है। मैं यह जरूर कहूंगा कि उस लेवल की अवेयरनेस अपने देश में थोड़ा सा समय और लगेगा, क्योंकि अपने देश में डिजास्टर रेडी होने की जरूरत अभी हम नहीं समझ रहे हैं। अगर कोई भी किसी भी प्रकार की आपदा होती है तो हमारा समाज हमारी कम्युनिटी ही उसे सबसे पहले सामना करती है। उसके बाद लोकल एडमिनिस्ट्रेशन, उसके बाद फिर जाकर एनडीआरएफ काम करती है। यह 3 टियर लेयर है। उसकी महत्वता को अगर हम समझे तो कम्युनिटी को प्रीप्रेयर्ड करना बहुत ज्यादा जरूरी है और हम इसमें लगातार काम कर रहे हैं।

कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी यानी सीएसआर फंड का इस्तेमाल क्या एनडीआरएफ के लिए भी होता है?

सीएसआर अहम रोल निभा सकता है। कुछ महीने पहले डिजास्टर रिस्पांस को सीएसआर के सब्जेक्ट में इंक्लूड किया गया है। इसलिए डिजास्टर में सीएसआर करने की वैलिडिटी अब बन गई है। एनडीआरएफ सीधे तौर पर कॉर्पोरेट कंपनियों से सीएसआर फंड रिसीव नहीं करता। लेकिन कम्युनिटी लेवल पर पीएसीयू प्राइवेट सेक्टर के साथ काम करता है अवेयरनेस ड्राइव में। अवेयरनेस के लिए सीएसआर फंड का इस्तेमाल होता होगा ऐसा मेरा मानना है। सीएसआर को लेकर आने वाले दिनों में एक पुख्ता रोड मैप बनना चाहिए इसलिए मैं यह कहना चाहता हूं कि अब डिजास्टर रिस्पांस और डिजास्टर मैनेजमेंट सीएसआर के सब्जेक्ट में जुड़ गया है। कंपनियां जो कोस्टल एरिया में है, उदाहरण के तौर पर मान लीजिए एक बड़ा सा प्राइवेट फॉर्म है वह कुछ भी हो सकता है चाहे वह ऑयल कंपनी हो सकती है, चाहे वह आईटी की कंपनी हो सकती है, उनके पास अगर जो कोई भी ऐसी चीजें हैं जो डिजास्टर रिस्पांस के लिए काम आ सकती है। इन कंपनियों के पास हो सकता है कुछ ट्रैक्टर हो, अर्थ मूवर्स हो, उनके प्रोफाइल के ऊपर डिपेंड करते हुए अगर वह डेटाबेस के साथ जुड़ जाते हैं। हमें यह जानकारी होती है कि हां इन कंपनियों के पास आपदा में इस्तेमाल होने वाले उपकरण है तो वह हमारे लिए सहूलियत हो सकता है। हम डिजास्टर रिस्पांस नेटवर्क बना रहे हैं उसके तहत सभी डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन को कहा गया है कि आपके जिले में जो भी एसएक्स है या जो भी आपदा में इस्तेमाल होने वाले उपकरण हैं उसका डेटाबेस बनाएं और आपदा में काम करने वाली एजेंसी से साझा करें। सीएसआर के तहत हम यह भी चाहते हैं कि कंपनी जो है वह इन उपकरणों को जनसेवा के लिए लगाएं। डिजास्टर मैनेजमेंट में सीएसआर का रोल बहुत ही महत्वपूर्ण है।