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बोलो, अब कब बोलोगे…

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कब बोलोगे…
इन दिनों देश कुछ अजीबो-गरीब हालात से गुजर रहा है। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक सभी स्तर पर उथल-पुथल मची हुई है। लगभग किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति बन गई है। हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक अज्ञात सूक्ष्म वायरस ने समूचे विश्व को अपनी गिरफ्त में ले लिया और सारा विज्ञान, सारा विकास और सारी टेक्नोलॉजी को पंगु बना दिया। सारी सरकारें अपने-अपने तरीकों से इस महामारी से निपटने की कोशिशें करती रहीं। सरकार के साथ-साथ आम जनता भी इस आपदा से युद्ध लड़ती नजर आई। “जान है तो जहान है” की कहावत चरितार्थ होती नजर आई। अपने अपनों से मुंह फेरते और मुर्दे कफन को तरसते रहे। “अतिथि देवो भव” की संस्कृति से ओत प्रोत दिलों के और घरों के दरवाजे बंद नजर आए। सड़कें लाचारों और मासूमों के कदमों के लहुलुहान चिन्हों से सनती रहीं। हम खामोशी से सब देखते और अपने जज्बातों को पीते रहे। गलवान घाटी में शहीद हुए जवानों की लाशें हमसे सवाल करती रहीं और हम मौन की चादर ताने रोते रहे। सरहद पर चीनी अतिक्रमण होता रहा और हम टिकटॉक बैन पर शोर मचाते रहे। महामारी के चलते अप्रत्याशित मंदी के दौर में भी जीवनावश्यक वस्तुओं, दवाइयों,सुरक्षा किटों की कालाबाजारी हमारी जेबें काटती गई और हम हालात और मजबूरी का रोना रोकर चुपचाप बैठे रहे।
कोरोना वैक्सीन के नाम पर कई तरह की दवाइयाँ बाजार में कई गुना ज्यादा दामों पर बिकीं। यह जानते हुए भी कि किसी बीमारी की दवा बनने, उसकी जांच होने और हम तक पहुंचने में वक्त लगता है। हम बिना किसी सवाल के दवाइयों को किसी भी कीमत पर हासिल करने की होड़ में लगे रहे। हवा की गति से फैलने वाली इस महामारी का इलाज डॉक्टर्स बिना किसी सुरक्षा और समुचित साधन के करने को मजबूर हैं, क्योंकि सरकार उन्हें उचित और जरूरी दवाइयाँ, पीपीई किट, मास्क आदि मुहैया कराने में असमर्थ है। इन अत्यावश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी हर जगह अपने चरम पर है। गरीबों और लॉकडाउन के चलते बेरोजगार हुए मजदूरों को सरकार मुफ्त राशन और आश्रय देने का काम तो कर रही है, परंतु इस आश्रय स्थलों का हाल और उपलब्धता असंतोषजनक है। इन तक पहुंचने वाला राशन, अनाज सरकारी गोदामों से चलकर इनकी झोली में आते-आते जानवरों को देने लायक भी नहीं रह जाता। अपने ही देश में “प्रवासी” कहलाने वाले पैदल ही अपने-अपने “वास” की ओर हजारों किलोमीटर भूखे नंगे चलते रहे और प्रशासन खामोश रहा। सोशल मीडिया पर मची हलचल के चलते कुछ श्रमिक ट्रेनें चलाई गई जिसके टिकटों की कालाबाजारी जमकर हुई। गरीब मरकर भी अपने घरों को ना पहुँच पाए। हालिया मार बिजली विभाग ने दी है। सरकार के इस आश्वासन के बावजूद, कि लॉकडाउन के मद्देनजर लोगों की आर्थिक परिस्थिती को ध्यान में रखते हुए सरकार बिजली, किराए और मूलभूत जरूरतों में माकूल रियायत बरतेगी, बिजली के कई गुना ज्यादा अनाप-शनाप बिल ने लोगों की नींद उड़ा दी है। कई महीनों से घरों में बैठे लोगों ने इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं की थी। एक नौकरी पेशा मध्यम वर्ग के लिए यूँ भी हालत बदतर हैं ।उस पर बिजली विभाग ने उन पर यह “बिजली” गिरा दी। लोगों के सामने “मरता क्या न करता” वाले हालात पैदा हो गए हैं। सरकार से गुहार लगाई जा रही है, मगर कोई संतोषजनक उत्तर आने की अपेक्षा कम ही है।
यदि पिछले कुछ महीनों के देश के हालात पर गौर करें तो हम सरकार को ही जिम्मेदार ठहराएँगे । पर सोच कर देखें तो पाएँगे कि सरकार के गैरजिम्मेदाराना रवैये, बढ़ते भ्रष्टाचार, मरती संवेदना और गिरती इंसानियत के हम भी उतने ही भागीदार हैं। हमने अपने कंफर्ट ज़ोन में जीना सीख लिया है। उससे बाहर निकलकर गलत का विरोध करना, आवाज उठाना हम भूल चलें हैं। हमें चीन के आक्रमणकारी हमले उतने व्यथित नहीं करते, जितना सस्ते चीनी उत्पादों पर बैन करता है। भ्रष्टाचार और कालाबाजारी हमें तब तक बुरी या गलत नहीं लगती, जब तक वह हमारी जेब में छेद नहीं करती।सरकारी और निजी अस्पतालों में चल रहा गोरखधंधा और लूटपाट हम तब तक बर्दाश्त करते हैं जब तक कोई हमारा अपना इसका शिकार नहीं बनता।  मुश्किल की इस घड़ी में मसीहा बनकर उतरे डॉक्टरों की तकलीफ और व्यथा हमें तब तक उद्वेलित नहीं करती, जब तक हमारा कोई परिजन इन डॉक्टरों की भीड़ में शामिल ना हो। सोशल मीडिया पर कुछ हो हल्ला मचा कर हम बिजली का बिल भी भर आएँगे,सिर्फ इसलिए क्योंकि “हम कुछ नहीं कर सकते”।
कुछ नहीं कर सकते की इस सोच ने हमें अपाहिज और भ्रष्ट तंत्र को मजबूत बना दिया है। आखिर हम कब समझेंगे, कि वोट देकर जिन जनप्रतिनिधियों को हमने सत्ता सौंपी है, उनसे सवाल करने का हमें पूरा अधिकार है। हमें हक है यह जानने का, कि क्यों डॉक्टर्स बिना सुविधा के काम करने को मजबूर हैं। तालियां और थालियां इनकी सुरक्षा नहीं कर सकतीं। सड़े हुए गेहूं और चावल भूख से तड़पते लोगों की क्षुधा नहीं मिटा सकते। बिके हुए मीडिया के सामने दिए गए अर्थहीन भाषण लहुलुहान कदमों पर मरहम नहीं लगा सकते। महीनों से बंद पड़े घरों के दरवाजों में खोंसे गए बिजली के बिल लोगों के जख्मों पर नमक का काम कर रहे हैं। लोगों के दिलों में सरकार और व्यवस्था के खिलाफ असंतोष की एक लहर पैदा हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि इस लहर को सैलाब बनने से कैसे रोका जाए? एक ही रास्ता है – “आवाज उठानी होगी”।  लोकतंत्र से राजतंत्र में बदलती व्यवस्था का रुख मोड़ना होगा।  शासन तंत्र को अपनी उपस्थिति और अपने महत्व का एहसास कराना होगा। गलत के खिलाफ आवाज उठानी होगी, फिर चाहे वह हमारे साथ हो या किसी और के साथ। कोई और पहल करें, इसका इंतजार करना हल नहीं है। गिरती अर्थव्यवस्था को सहारा देने के नाम पर शराब की खुली दुकानों पर टूट पड़ने वाली भीड़, मुफ्त राशन की कतारों में मुंह छुपाती रही। पर क्या वही भीड़ आपको किसी भी बिजली विभाग के दफ्तर के बाहर दिखाई दी? नहीं, क्योंकि हम अपने अधिकारों के लिए लड़ना भूल चुके हैं। कोरोना के नाम पर मनमानी राशि बटोर रहे अस्पतालों के सामने हम मजबूर हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि जो हो रहा है, सरकारी महकमों की मिलीभगत से हो रहा है। या तो इस मनमानी को बर्दाश्त कीजिए या फिर आवाज उठाइए और अपने भीतर के सैलाब को तूफान का रूप लेने दीजिए। एक वैश्विक त्रासदी का रूप ले चुकी महामारी को हमने मजाक और मीम्स में उड़ा दिया।
लॉकडाउन के इस वक्त में हम अपने भीतर के शेफ़ को जगाने में इतने मशगूल रहे कि सरकार से यह पूछना ही भूल गए कि बड़े बड़े औद्योगिक घरानों के द्वारा दिए गए लाखों करोड़ रुपयों का लाभ वेंटिलेटर के अभाव में मरते कोविड-19 मरीजों तक क्यों नहीं पहुँचा? पीएम केयर फंड का कुछ हिस्सा महामार्गो पर दम तोड़ते श्रमिकों को राहत क्यों नहीं दे पाया? हम सरकार से यह सवाल क्यों नहीं कर पाए कि सरकारी राहत सामग्री की गुणवत्ता गरीबों के मुंह तक आते-आते निकृष्टतम कैसे हो गई ? करोड़ों रुपए खर्च कर खरीदी गई दवाइयां और पीपीई किट्स आखिर उन सेवाकर्मियों और डॉक्टरों तक क्यों नहीं पहुँचे जो इसके अभाव में कोरोना से संक्रमित हो गए? राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच एक संतुलन क्यों नहीं बन पाया जिससे इस विपत्ति को समय रहते रोका या नियंत्रित किया जा पाता? पहले ही आर्थिक तौर पर टूट चुकी जनता को अब बिजली की मार से आखिर सरकार क्यों नहीं बचा पा रही है? सवाल कीजिए मिलकर कि ट्विटर युद्ध करने वाली सरकार आखिर इन मुद्दों पर चुप क्यों हैं? हम मिडिल क्लास वाले ही अपने वोटों से सरकार चुनते हैं और हमारी चुनी सरकार हमारी ही अनदेखी क्यों करती है? आवाज बुलंद करनी ही होगी, क्योंकि खामोश शिकायतें दम तोड़ देती हैं। जनता के लिए, जनता द्वारा चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार को जनता के सवालों का जवाब देना ही होगा।