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February 24, 2026

बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय- एकल मां द्वारा पाले गए बच्चे को पिता का नाम, सरनेम या जाति नहीं लेनी पड़ेगी ! 

The CSR Journal Magazine
मुंबई उच्च न्यायालय (Aurangabad बेंच) ने एक महत्वपूर्ण और लड़की के अधिकारों से जुड़े फैसले में कहा है कि जो बच्चा सिर्फ अपनी मां द्वारा पाला गया है, उसे अपने पिता का नाम, सरनेम या जाति सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह फैसला 12 साल की एक बच्ची की याचिका पर सुनाया गया, जिसमें उसने अपनी स्कूल की रिकॉर्ड में पिता से जुड़ी पहचान हटाने की मांग की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला महाराष्ट्र के बीड जिले से है। 12 वर्षीय लड़की का पालन-पोषण उसकी एकल मां ने ही किया था। उसके पिता पर मां के साथ अपराध से संबंधित आरोप लगे थे और उसने बच्चे के साथ कोई संपर्क नहीं रखा। कोर्ट को बताया गया कि पिता ने अपने रिश्ते और अभिभावक होने से खुद को अलग कर लिया है, लेकिन स्कूल ने लड़की की याचिका को नाम, सरनेम और जाति बदलने से इंकार कर दिया।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

मुंबई हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि-
• एकल मां को बच्चे के लिए ‘पूरा अभिभावक’ माना जाना चाहिए और उसके अनुसार बच्चे की पहचान तय करने का अधिकार संविधान के अधिकारों में आता है। यह कोई सेवा या दया नहीं है।
• कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि एक समाज जो खुद को विकसित कहता है, वह एक बच्चे की सार्वजनिक पहचान को ऐसे पिता से जोड़ नहीं सकता जो उसके जीवन में नहीं है, जबकि उसकी मां ने ही उसे पाला-बढ़ाया है।
• सरकारी दस्तावेज़ जैसे स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम और जाति रखना सिर्फ पुराने नियमों पर आधारित प्रशासनिक ज़रूरत नहीं हो सकती जब फ़ैक्ट वास्तव में अलग हो।

कोर्ट का आदेश

• लड़की के स्कूल रिकॉर्ड में उसका नाम बदलकर मां के नाम और सरनेम के अनुसार दर्ज किया जाएगा।
• उसकी जाति प्रविष्टि भी ‘माराठा’ से बदलकर उसकी मां के अनुसार ‘अनुसूचित जाति (Scheduled Caste-Mahar)’ दर्ज की जाएगी, जब तक कि उसकी मां के जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सही प्रक्रिया पूरी होती है।

न्यायालय के विचार

उच्च न्यायालय ने कहा-
• एकल मां का अधिकार पूर्ण अभिभावक के रूप में मानना पूरा अधिकार है, दया नहीं।
• पहचान का फैसला सिर्फ पारंपरिक नियमों पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि बच्चे की वास्तविक जीवन स्थिति पर आधारित होना चाहिए।
 • अदालत की यह टिप्पणी भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक परंपराओं से आगे बढ़कर बच्चों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय से क्या बदलाव आएगा

अब अगर कोई बच्चा समुचित आधार पर बताता है कि वह पिता से अलग जीवन जी रहा है, पिता उसकी ज़िंदगी में नहीं है और उसकी मां ने ही उसे पाला-बढ़ाया है, तो उसे भी सरकारी रिकॉर्ड में अपनी मां की पहचान चुनने का अधिकार हासिल हो सकता है। यह आदेश सिर्फ नाम बदलने का फैसला नहीं है, बल्कि एकल माताओं और उनके बच्चों के अधिकारों को मजबूत बनाने वाला फैसला भी माना जा रहा है।

बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले पर पक्ष में तर्क

1. संवैधानिक अधिकारों की रक्षा
समर्थकों का कहना है कि यह फैसला संविधान में दिए गए समानता और गरिमा के अधिकार को मजबूत करता है। बच्चे की पहचान उसकी वास्तविक परवरिश के आधार पर तय होनी चाहिए।
2. एकल माताओं को पूर्ण अभिभावक का दर्जा
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि एकल मां को “आधा अभिभावक” नहीं माना जा सकता। वह अपने बच्चे के लिए पूर्ण कानूनी अभिभावक है।
3. सामाजिक न्याय की दिशा में कदम
ऐसे मामलों में, जहां पिता ने जिम्मेदारी नहीं निभाई या अनुपस्थित रहे, बच्चे को जबरन उनकी पहचान से जोड़ना अन्यायपूर्ण माना गया है।
4. मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा
बच्चे पर अनचाहा नाम या पहचान थोपने से उसके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। यह फैसला बच्चे की भावनात्मक सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।
5. बदलते सामाजिक ढांचे की स्वीकृति
आज के समय में सिंगल पेरेंट परिवार बढ़ रहे हैं। यह फैसला आधुनिक सामाजिक वास्तविकताओं को स्वीकार करता है।

विपक्ष (आलोचना और चिंताएं)

1. पारंपरिक व्यवस्था पर प्रभाव
कुछ लोगों का मानना है कि यह निर्णय पारंपरिक परिवार व्यवस्था और पितृवंश आधारित पहचान प्रणाली को चुनौती देता है।
2. प्रशासनिक जटिलताएं
नाम, सरनेम और जाति बदलने से स्कूल रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेज और आरक्षण से जुड़े मामलों में कानूनी व प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं।
3. भविष्य में विवाद की आशंका
अगर बाद में पिता अपने अधिकार का दावा करें, तो पहचान से जुड़े विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
4. दुरुपयोग की संभावना
आलोचकों का तर्क है कि कहीं-कहीं इस तरह के फैसलों का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है, विशेषकर जाति प्रमाण पत्र जैसे मामलों में।

एकल मांओं के अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय

यह फैसला एकल माताओं और उनके बच्चों के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इसके सामाजिक और प्रशासनिक प्रभावों पर बहस जारी है। कुल मिलाकर, यह निर्णय समाज में पहचान और अभिभावकत्व की परंपरागत सोच को नई दृष्टि से देखने का अवसर देता है।

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