बिहार सियासत: SIR प्रक्रिया पर उपेंद्र कुशवाहा ने चुनाव आयोग से मांगा अविलंब स्पष्टीकरण

The CSR Journal Magazine

बिहार में SIR विवाद पर घमासान: चिराग पासवान के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने भी चुनाव आयोग से की तत्काल स्थिति स्पष्ट करने की मांग

बिहार की सियासत में इन दिनों मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR – Special Intensive Revision) को लेकर चल रहा विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। विपक्षी दलों के तीखे हमलों के बीच अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के घटक दलों ने भी इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और प्रक्रिया को लेकर चिंता जतानी शुरू कर दी है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बाद अब राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से SIR विवाद पर अपनी स्थिति अविलंब और पूरी तरह स्पष्ट करने का जोरदार आग्रह किया है। उपेंद्र कुशवाहा ने शुक्रवार को अपने सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट साझा करते हुए लिखा, “SIR से संबंधित विवाद पर जनता में काफी उलझन की स्थिति पैदा हो गई है। विषय को एड्रेस करने की ज़रूरत है। कन्फ्यूजन दूर करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से अविलंब सही स्थिति पर स्पष्टीकरण आना चाहिए।” NDA के एक अहम सहयोगी होने के बावजूद चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर कुशवाहा का यह बयान बिहार के सियासी गलियारों में काफी अहम माना जा रहा है।

क्या है पूरा विवाद और जनता में भ्रम की वजह?

दरअसल, यह पूरा विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया के दौरान लिए गए कुछ निर्णयों को लेकर शुरू हुआ। हाल ही में मीडिया रिपोर्ट्स में यह खुलासा हुआ कि चुनाव आयोग के भीतर ही दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने इस प्रक्रिया के कुछ तकनीकी बदलावों और निर्णयों पर गंभीर लिखित आपत्तियां (डिसेंट नोट्स) दर्ज कराई थीं। इन बदलावों में ईरोनेट (ERONET) मतदाता सूची डेटाबेस का केंद्रीकरण, नए मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में संशोधन और मतदाता सूची से नाम हटाने के नियम शामिल हैं। इस आंतरिक मतभेद की खबरें बाहर आने के बाद बिहार सहित पूरे देश में यह संदेश गया कि चुनाव आयोग के भीतर ही सब कुछ ठीक नहीं है। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर मनमाने तरीके से फैसले लेने का आरोप लगाया है। वहीं, आम जनता, विशेषकर बिहार के गरीब, प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और दिव्यांगों के बीच यह डर बैठ गया है कि कहीं इस जटिल प्रक्रिया और कागजी कार्रवाई के चलते उनका नाम मतदाता सूची से न काट दिया जाए।

विपक्ष की भाषा पर उठाए सवाल, लेकिन मतभेद को माना स्वाभाविक

पटना में पत्रकारों से बातचीत और सोशल मीडिया के जरिए उपेंद्र कुशवाहा ने जहां एक तरफ जनता के भ्रम को दूर करने के लिए चुनाव आयोग से सामने आने को कहा, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने इस मुद्दे पर विपक्षी दलों द्वारा इस्तेमाल की जा रही भाषा की कड़ी निंदा की। कुशवाहा ने कहा कि लोकतंत्र में किसी बड़े संस्थान या राजनीतिक दलों के बीच किसी नीति अथवा प्रक्रिया को लेकर मतभेद होना एक स्वाभाविक बात है। दो व्यक्तियों या अधिकारियों के बीच विचारों में भिन्नता हो सकती है, और एक ‘वाइब्रेंट’ लोकतंत्र में यह बहुत ही आम प्रक्रिया है। RLM अध्यक्ष ने कहा, “इस मामले को लेकर विपक्ष द्वारा जो भाषा और शब्दावली इस्तेमाल की जा रही है, वह पूरी तरह से अनुचित है। ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। जिन अथॉरिटीज के पास इस मामले को देखने का अधिकार है, वे निश्चित रूप से इसकी जांच करेंगे।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मतभेद का मतलब यह नहीं है कि आयोग का अंतिम फैसला विवादास्पद है, लेकिन जब तक आयोग खुद सामने आकर स्थिति स्पष्ट नहीं करता, तब तक अफवाहों और भ्रम का बाजार गर्म रहेगा।

चुनाव आयोग की सफाई

विवाद के तूल पकड़ने और राजनेताओं के बयानों के बाद भारत निर्वाचन आयोग ने भी अपनी स्थिति साफ करने की कोशिश की है। चुनाव आयोग का कहना है कि एक बहु-सदस्यीय संस्था (Multi-member body) के भीतर किसी भी बड़े फैसले से पहले आंतरिक तकनीकी नोट, लिखित प्रश्न या अलग राय आना एक सामान्य और स्वस्थ विचार-विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने दावा किया कि SIR प्रक्रिया से जुड़े सभी अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति और कानूनी मंजूरी के साथ ही लिए गए हैं। हालांकि, आयोग की इस सफाई के बावजूद जमीन पर जनता का भ्रम और सहयोगियों की चिंताएं कम नहीं हो रही हैं। बिहार के संदर्भ में, जहां बड़ी संख्या में लोग रोजी-रोटी के सिलसिले में दूसरे राज्यों में रहते हैं, उन्हें अपनी नागरिकता और मतदान के अधिकार को लेकर डर सता रहा है। यही वजह है कि चिराग पासवान के बाद अब उपेंद्र कुशवाहा ने भी चुनाव आयोग को जनता के बीच जाकर सीधा संवाद करने और इस पूरे असमंजस को तुरंत खत्म करने की सलाह दी है। अब देखना यह होगा कि इस राजनीतिक दबाव के बाद चुनाव आयोग इस मुद्दे पर क्या नया कदम उठाता है।

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