Yogi Sarkar Ke 9 Saal, 9 Kalank: उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के 9 साल पूरे होने पर जहां सरकार अपने मुंह मियां मिट्ठू बनके बड़े-बड़े दावे कर रही है वहीं दूसरी तरफ इन नौ वर्षों का एक दूसरा चेहरा भी है, विवादों, आरोपों और सवालों से भरा हुआ। 9 Years of Yogi Government बार-बार इसी सच्चाई की ओर इशारा करते हैं कि जमीन पर हालात उतने सरल नहीं जितने आंकड़ों में दिखाए जाते हैं। इन 9 सालों में कई ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिन्होंने न सिर्फ प्रदेश की छवि को झटका दिया बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली, संवेदनशीलता और कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। हाथरस से लेकर लखीमपुर खीरी, प्रयागराज से लेकर गोरखपुर तक ऐसे कई मामले रहे, जो सिर्फ खबर नहीं बने बल्कि लंबे समय तक सरकार की जिम्मेदारी और सुशासन पर बहस का केंद्र बने रहे। कहीं महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठे, तो कहीं पुलिस की कार्यशैली पर उंगलियां उठीं। शंकराचार्य विवाद, बुलडोजर पॉलिटिक्स, फर्जी एनकाउंटर, पेपर लीक, कोविड मैनेजमेंट जैसे मुद्दों ने सरकार के दावों को चुनौती दी। ये घटनाएं सिर्फ अलग-अलग केस नहीं हैं, बल्कि एक पैटर्न की ओर इशारा करती हैं जहां सिस्टम की कमियां बार-बार उजागर हुईं और सरकार को जवाब देना पड़ा। जब सरकार खुद की बड़ाई करते नहीं थक रही है तो आईये हम Yogi Adityanath Government की कुछ कमियों को उजागर करते है। योगी सरकार, 9 साल, 9 कलंक उन घटनाओं का संकलन है, जिन्होंने इस पूरे कार्यकाल में बार-बार सरकार को असहज किया और विपक्ष को हमलावर होने का मौका दिया।

सनातन के पक्षधर योगी, लेकिन शंकराचार्य से ले ली दुश्मनी, अविमुक्तेश्वरानंद विवाद से योगी ने कराई फजीहत
उत्तर प्रदेश में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद तब तेज हुआ जब उन्होंने कुछ धार्मिक कार्यक्रमों और सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए। इसके बाद मामला तब और बढ़ गया जब उनके साथ पुलिस की कथित सख्ती की खबरें सामने आईं। आरोप लगे कि पुलिस ने उनके साथ ना सिर्फ दुर्व्यवहार किया और उनके समर्थकों को भी रोका गया, जिससे संत समाज में नाराजगी फैल गई। साल 2026 प्रयागराज में चले माघ मेले में मौनी अमावस्या के स्नान के दिन मेला प्रशासन ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया था। इसके बाद शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हो गई थी। इससे नाराज होकर शंकराचार्य ने धरना शुरू कर दिया। पुलिस ने शंकराचार्य के समर्थकों और बटुकों की चोटियों को खींचकर मारपीट का आरोप लगाया। इस पूरे घटनाक्रम ने सियासी रंग ले लिया और सरकार पर धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के आरोप लगने लगे। वहीं योगी सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ही कार्रवाई की गई थी। कुल मिलाकर यह विवाद शंकराचार्य के आरोप, पुलिस की कार्रवाई और सरकार की सफाई के बीच एक बड़ा राजनीतिक और धार्मिक मुद्दा बन गया है।

Yogi Sarkar Ke 9 Saal, 9 Kalank: हाथरस केस: इंसाफ से ज्यादा सिस्टम पर सवाल
सितंबर 2020 का हाथरस कांड (Hathras Case) इंसाफ से ज्यादा पुलिस-प्रशासनिक सिस्टम की विफलता और संवेदनहीनता के लिए चर्चा में रहा। पुलिस द्वारा रात के अंधेरे में परिजनों की मर्जी के बिना शव का अंतिम संस्कार करना, पीड़िता के बयान में विरोधाभास, और अंत में मुख्य आरोपियों का बरी होना पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पुलिस पर आरोप है कि उसने परिजनों को सूचित किए बिना या उनकी सहमति के बिना, आधी रात को पीड़िता का अंतिम संस्कार कर दिया, जो एक बड़ा प्रशासनिक कृत्य था। फॉरेंसिक रिपोर्ट में रेप की पुष्टि न होने और पुलिस द्वारा इसे “जातिगत संघर्ष भड़काने की साजिश” बताने के बाद भी, जनता का भरोसा पुलिस की जांच पर नहीं बना। घटना के बाद पुलिस ने गांव की घेराबंदी कर दी और मीडिया व विपक्ष के नेताओं को परिवार से मिलने से रोका, जिससे प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल उठे। मार्च 2023 में कोर्ट ने 4 में से 3 आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि एक को केवल गैर-इरादतन हत्या का दोषी पाया, जिससे इंसाफ की प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगा। इस घटना ने दलित महिला सुरक्षा और सिस्टम के कतिपय उच्च जातियों के प्रति झुकाव की बहस को फिर से जिंदा कर दिया।

लखीमपुर खीरी कांड: जब किसानों को गाड़ी से कुचलने का आरोप बना राष्ट्रीय मुद्दा
उत्तर प्रदेश के Lakhimpur Kheri में अक्टूबर 2021 में हुआ लखीमपुर खीरी कांड देशभर में सुर्खियों में आया था। इस घटना में किसानों के प्रदर्शन के दौरान एक SUV गाड़ी से लोगों को कुचलने का आरोप लगा, जिसमें कई किसानों समेत कुल 8 लोगों की मौत हो गई। आरोप था कि गाड़ी केंद्रीय मंत्री Ajay Mishra Teni के बेटे Ashish Mishra से जुड़ी थी। किसानों का कहना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान उन्हें निशाना बनाया गया, जबकि दूसरी तरफ आरोपियों की ओर से इसे हादसा बताया गया। इस घटना के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए और कानून-व्यवस्था व किसानों की सुरक्षा को लेकर Yogi Adityanath सरकार पर गंभीर सवाल उठे। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और जांच के बाद कई गिरफ्तारियां भी हुईं। यह कांड किसान आंदोलन के दौरान सबसे विवादित और चर्चित घटनाओं में से एक बन गया।

विकास दुबे एनकाउंटर: न्याय या स्क्रिप्टेड एक्शन?
कानपुर के चर्चित गैंगस्टर Vikas Dubey द्वारा 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद पूरे देश में सनसनी फैल गई थी, लेकिन उससे भी ज्यादा चर्चा उसके एनकाउंटर को लेकर हुई। पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तारी के बाद जब उसे उज्जैन से Kanpur लाया जा रहा था, तब रास्ते में गाड़ी पलट गई और उसने भागने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने उसे गोली मार दी। हालांकि इस पूरी कहानी पर कई सवाल उठे और Fake Encounter UP जैसे मुद्दे सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस का केंद्र बन गए। मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस एनकाउंटर की परिस्थितियों को लेकर संदेह जताया गया और मामला Supreme Court of India तक पहुंचा, जहां इसकी निष्पक्ष जांच की मांग उठी। इस घटना ने योगी सरकार की कार्यशैली, कानून-व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और न्याय प्रक्रिया को लेकर एक बड़ी बहस खड़ी कर दी, जिसमें यह सवाल प्रमुख रहा कि क्या यह न्याय था या एक सुनियोजित कार्रवाई।

उन्नाव रेप केस: सत्ता और संरक्षण के आरोपों से घिरी सियासत
उत्तर प्रदेश के चर्चित Unnao Rape Case ने पूरे देश को झकझोर दिया था और महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। इस मामले में बीजेपी विधायक Kuldeep Singh Sengar पर रेप का आरोप लगा, जिसके बाद पीड़िता और उसके परिवार ने लगातार धमकियों का आरोप लगाया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, न्याय की लड़ाई के दौरान पीड़िता के परिवार पर दबाव बनाया गया और बाद में एक संदिग्ध सड़क हादसे में उसके परिजनों की मौत हो गई, जिससे मामला और भी संवेदनशील बन गया। उन्नाव रेप केस ने कानून-व्यवस्था और सत्ता के प्रभाव को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी, वहीं योगी सरकार पर यह आरोप लगा कि आरोपी को शुरुआती दौर में राजनीतिक संरक्षण मिला। मामला कोर्ट तक पहुंचा और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद आरोपी को सजा भी हुई, लेकिन इस घटना ने महिला सुरक्षा और न्याय व्यवस्था पर गहरे सवाल छोड़ दिए।
गोरखपुर अस्पताल कांड: ऑक्सीजन की कमी या सिस्टम की लापरवाही?
साल 2017 में उत्तर प्रदेश के Gorakhpur स्थित BRD Medical College में हुई दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑक्सीजन की कमी के चलते दर्जनों मासूम बच्चों की मौत हो गई, हालांकि प्रशासन ने शुरुआत में इस दावे से इनकार किया। Gorakhpur Hospital Tragedy के नाम से चर्चित इस मामले ने राज्य के हेल्थ सिस्टम की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया। घटना के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं, फंडिंग और जिम्मेदारी तय करने को लेकर तीखी बहस छिड़ गई। विपक्ष ने इसे सरकारी लापरवाही करार दिया, जबकि योगी सरकार ने जांच के आदेश दिए और सुधार के दावे किए। लेकिन इस त्रासदी ने स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत और प्रशासनिक जवाबदेही पर गहरे सवाल खड़े कर दिए, जिनकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देती रही।
प्रयागराज शूटआउट 2023: पुलिस कस्टडी में अतीक अहमद की हत्या से उठा बड़ा सवाल
साल 2023 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माफिया से नेता बने अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की पुलिस कस्टडी में गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिसने पूरे देश को चौंका दिया। यह वारदात उस वक्त हुई जब दोनों को मेडिकल जांच के लिए ले जाया जा रहा था और हमलावरों ने मीडिया के सामने ही उन्हें निशाना बना दिया। इस घटना के बाद योगी सरकार, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस सुरक्षा के बीच इस तरह की घटना ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बहस छेड़ दी। विपक्ष ने इसे कानून-व्यवस्था की विफलता बताया, वहीं सरकार ने सख्त कार्रवाई और जांच की बात कही, लेकिन इस हत्याकांड ने प्रदेश में अपराध, राजनीति और सुरक्षा को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया।

बुलडोजर एक्शन: न्याय या टारगेटेड कार्रवाई?
उत्तर प्रदेश में Yogi Adityanath सरकार के दौरान Bulldozer Politics एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनकर उभरा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दंगों या आपराधिक आरोपों के बाद कई मामलों में प्रशासन ने बिना कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार किए आरोपियों के घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाया। कानपुर, प्रयागराज जैसे मामलों में यह कार्रवाई सुर्खियों में रही, जहां प्रशासन ने इसे अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई बताया। वहीं विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों ने इसे Selective Justice करार देते हुए आरोप लगाया कि यह कार्रवाई एक खास वर्ग को निशाना बनाकर की जा रही है। कई मामलों में अदालतों ने भी हस्तक्षेप करते हुए प्रक्रिया और समय को लेकर सवाल उठाए। इस पूरे विवाद ने कानून के राज, न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर देशभर में तीखी बहस छेड़ दी।
यूपी में सांप्रदायिक तनाव: कासगंज से कानपुर-वाराणसी तक हिंसा की घटनाएं
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाएं बार-बार सुर्खियों में रही हैं। साल 2018 में Kasganj में तिरंगा यात्रा के दौरान हिंसा भड़क गई थी, जिसमें एक युवक की मौत हो गई और पूरे इलाके में तनाव फैल गया। इसके बाद Kanpur में 2022 में एक धार्मिक जुलूस के दौरान पत्थरबाजी और झड़प की घटनाएं सामने आईं, जिससे कई इलाकों में कर्फ्यू जैसी स्थिति बन गई। वहीं Varanasi में भी समय-समय पर धार्मिक आयोजनों के दौरान तनाव की खबरें आती रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में Communal Violence UP लगातार चर्चा का विषय बना रहा, जहां छोटी घटनाएं भी बड़े विवाद में बदलती नजर आईं। इन घटनाओं ने कानून-व्यवस्था, खुफिया तंत्र और प्रशासन की तैयारियों पर सवाल खड़े किए, जबकि सरकार ने हर बार सख्त कार्रवाई और शांति बनाए रखने के दावे किए, लेकिन बार-बार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने सामाजिक सौहार्द और सुरक्षा को लेकर बहस को और गहरा कर दिया।

पेपर लीक कांड: युवाओं का भरोसा टूटा, योगी की सिस्टम पर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश में भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने लाखों युवाओं के भविष्य पर बड़ा असर डाला और सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। UP Paper Leak Scandal उस वक्त चर्चा में आया जब UPTET 2021 का पेपर परीक्षा से पहले ही लीक हो गया, जिसके चलते पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी और लाखों अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। इसके अलावा UP Police Constable Recruitment Exam और अन्य भर्तियों में भी इसी तरह की अनियमितताओं के आरोप लगे, जिससे छात्रों में भारी नाराजगी देखी गई। कई जगहों पर अभ्यर्थियों ने प्रदर्शन किया और पारदर्शिता की मांग उठाई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन घटनाओं ने भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर किया और यह सवाल खड़ा किया कि आखिर बार-बार ऐसी चूक कैसे हो रही है। सरकार ने जांच और सख्त कार्रवाई की बात कही, लेकिन बार-बार हो रहे पेपर लीक मामलों ने युवाओं के भरोसे को गहरा झटका दिया।


