भारतीय समाज महिलाओं को देवी कहकर पूजता है, लेकिन व्यवहार में वही समाज उनसे सवाल करता है- क्यों गईं, क्यों बोलीं, क्यों चुप नहीं रहीं? यही दोहरा चरित्र महिला सुरक्षा के सवाल को और गहरा करता है। जब पीड़िता आवाज़ उठाती है, तब भी उसे संदेह और आलोचना का सामना करना पड़ता है।
महिला सुरक्षा: मंच, भीड़ और हमारी सामूहिक चुप्पी
हरियाणा के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अभिनेत्री मौनी रॉय के साथ कथित अभद्र व्यवहार की घटना केवल एक सेलिब्रिटी से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक सच्चाई का आईना है, जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। मंच पर खड़ी महिला, कैमरों की रोशनी में चमकती कलाकार- क्या वह सम्मान और मर्यादा की हकदार नहीं होती? यह घटना बताती है कि महिला असुरक्षा आज भी घर की चारदीवारी से निकलकर सार्वजनिक मंचों तक फैल चुकी है। भीड़ के बीच, तालियों और संगीत के शोर में, कुछ लोग अपनी घटिया मानसिकता को खुली छूट समझ लेते हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसे मामलों में आसपास मौजूद लोग, आयोजक और व्यवस्था मौन साधे रहते हैं।
काग़ज़ी क़ानून की विवशता
कानून मौजूद हैं, धाराएं भी हैं, लेकिन जब तक उनका सख्ती से पालन नहीं होगा, वे केवल कागज़ी साबित होंगे। सार्वजनिक कार्यक्रमों में महिला कलाकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आयोजकों और प्रशासन की जिम्मेदारी है। दोषियों को तुरंत हटाना और उनके खिलाफ कार्रवाई करना ही संदेश दे सकता है कि अभद्रता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस पूरे परिदृश्य में समाज की भूमिका सबसे अहम है। जब तक हम दर्शक बने रहेंगे, जब तक गलत को गलत कहने का साहस नहीं दिखाएंगे, तब तक महिलाओं की सुरक्षा केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रहेगी।
सुरक्षा- एहसान नहीं, अधिकार !
आज ज़रूरत है मानसिकता बदलने की! यह समझने की कि सम्मान कोई एहसान नहीं, बल्कि अधिकार है। महिला सुरक्षा का प्रश्न केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी की परीक्षा है। अब वक्त आ गया है कि हम चुप्पी छोड़ें, सवाल उठाएं और यह तय करें कि सार्वजनिक मंच पर कोई भी महिला, चाहे वह कलाकार हो या आम नागरिक, असुरक्षित महसूस न करे।
कानून मौजूद हैं, लेकिन डर क्यों अब भी कायम है?
भारत में महिला सुरक्षा का प्रश्न आज केवल सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि संवैधानिक, कानूनी और नैतिक चुनौती बन चुका है। समय-समय पर सामने आने वाली घटनाएं यह साबित करती हैं कि कानूनों की मौजूदगी के बावजूद महिलाओं का सार्वजनिक जीवन अब भी असुरक्षित है। हाल ही में हरियाणा के एक कार्यक्रम में अभिनेत्री मौनी रॉय के साथ कथित अभद्र व्यवहार का मामला इस सच्चाई को फिर उजागर करता है कि मंच, बाजार, बस, दफ्तर या भीड़, कोई भी स्थान पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता! यह सवाल जरूरी है कि जब देश में महिला सुरक्षा के लिए इतने कानून बने हुए हैं, तो फिर डर, असुरक्षा और चुप्पी क्यों बनी हुई है?
महिला सुरक्षा: संविधान से शुरू होती जिम्मेदारी
भारतीय संविधान महिलाओं को समानता, गरिमा और सुरक्षा का अधिकार देता है।
• अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता,
• अनुच्छेद 15(3): महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान,
• अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार!
इन संवैधानिक अधिकारों का सीधा अर्थ है कि हर महिला को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन जीने का हक है। लेकिन जब यह अधिकार ज़मीनी स्तर पर टूटते हैं, तो सवाल केवल कानून का नहीं, बल्कि कार्यान्वयन और सामाजिक सोच का बन जाता है।
भारतीय दंड संहिता (IPC) में महिला सुरक्षा से जुड़े प्रमुख प्रावधान
धारा 354– महिला की मर्यादा भंग करने के इरादे से हमला या बल प्रयोग। सज़ा: 1 से 5 साल तक की कैद और जुर्माना।
धारा 354A– यौन उत्पीड़न, अनचाही शारीरिक छुअन, अश्लील टिप्पणियां, यौन संबंध की मांग!
धारा 354D– पीछा करना (Stalking)—फिजिकल या ऑनलाइन।
धारा 509- महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले शब्द, इशारे या हरकतें।
इन धाराओं का उद्देश्य साफ है- महिला की सहमति के बिना किसी भी तरह का व्यवहार अपराध है। फिर भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में छेड़छाड़ की घटनाएं यह दिखाती हैं कि कानून का डर अपराधियों के मन में कमजोर पड़ चुका है।
POSH Act का मकसद महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल देना है।
इसके तहत-
• हर संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) अनिवार्य,
• शिकायत पर समयबद्ध जांच,
• पीड़िता की पहचान गोपनीय!
लेकिन सवाल यह है- क्या सार्वजनिक कार्यक्रम, स्टेज शो और इवेंट्स को कार्यस्थल की तरह लिया जाता है? अक्सर नहीं। यही कानूनी अस्पष्टता कलाकारों और महिला कर्मियों को असुरक्षित बनाती है।
यह कानून 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों को यौन अपराधों से बचाने के लिए है। हालांकि यह सीधे वयस्क महिलाओं पर लागू नहीं होता, लेकिन यह बताता है कि राज्य की जिम्मेदारी उम्र की परवाह किए बिना सुरक्षा देना है।
आज उत्पीड़न केवल शारीरिक नहीं रहा। बिना अनुमति वीडियो बनाना, लो-एंगल रिकॉर्डिंग, सोशल मीडिया पर वायरल करना! आईटी एक्ट की धाराएं ऐसे मामलों में लागू होती हैं। फिर भी अधिकांश महिलाएं शिकायत करने से डरती हैं क्योंकि ऑनलाइन ट्रोलिंग, चरित्र हनन का डर और मानसिक दबाव उन्हें बोलने नहीं देता!
कानून क्यों बेअसर होते दिखते हैं?
1. शिकायत दर्ज न होना– अधिकांश महिलाएं पुलिस तक पहुंचती ही नहीं। डर, बदनामी और सामाजिक दबाव उन्हें रोक देता है।
2. पुलिस की संवेदनहीनता– कई बार शिकायत को “छोटी बात” कहकर टाल दिया जाता है।
3. समाज की सोच– अब भी सवाल महिला से पूछा जाता है- “कपड़े कैसे थे?” “वहां क्यों गई?”
4. आयोजकों की गैर-जिम्मेदारी– सार्वजनिक कार्यक्रमों में सुरक्षा इंतज़ाम अक्सर केवल औपचारिक होते हैं।
सार्वजनिक कार्यक्रम और आयोजकों की कानूनी जिम्मेदारी
कानूनन आयोजक की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करे। सुरक्षा कर्मी पर्याप्त हों। अभद्रता करने वालों को तुरंत बाहर निकाला जाए। लेकिन व्यवहार में यह जिम्मेदारी निभाई नहीं जाती। मौनी रॉय जैसे मामलों में यही सबसे बड़ा सवाल है- जब उत्पीड़न सामने था, तो किसी ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया?
महिला की चुप्पी: मजबूरी या डर? मीडिया की भूमिका: आईना या हथियार?
महिला की चुप्पी को अक्सर सहमति समझ लिया जाता है, जबकि यह चुप्पी डर की उपज होती है, करियर बचाने की कोशिश होती है, सामाजिक तानों से बचने का तरीका होती है। कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक पीड़िता को बोलने का सुरक्षित माहौल न मिले। मीडिया का काम है सच्चाई सामने लाना, पीड़िता की पहचान और सम्मान की रक्षा करना, अपराधी पर सवाल उठाना! लेकिन टीआरपी की दौड़ में कई बार मीडिया भी संवेदनशीलता खो देता है, जिससे पीड़िता दोबारा शिकार बनती है।
समाधान: कानून + मानसिकता
महिला सुरक्षा का हल केवल नए कानून नहीं हैं, बल्कि कानून का सख्त पालन, त्वरित न्याय, सामाजिक शिक्षा और पुरुषों की जवाबदेही, सब जरूरी हैं। भारत में महिला सुरक्षा के लिए कानूनों की कमी नहीं है। कमी है तो इच्छाशक्ति, संवेदनशीलता और सामाजिक साहस की। जब तक अपराधियों को तुरंत सज़ा नहीं मिलेगी, आयोजक और प्रशासन जिम्मेदारी नहीं लेंगे और समाज पीड़िता के साथ खड़ा नहीं होगा, तब तक किताबों में सिर्फ़ क़ानून ही सुरक्षित रहेंगे, महिलाएं नहीं। अब समय है यह स्वीकार करने का कि महिला सुरक्षा केवल महिला का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र और सभ्यता की कसौटी है।
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