Transgender Act Amendment: क्या है नया विवादित ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक? जिसका हो रहा है विरोध

The CSR Journal Magazine
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026, जिसमें नई परिभाषा प्रस्तुत की गई है, ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के बीच भारी विवाद का कारण बन रहा है। विधेयक के अनुसार, 2019 के अधिनियम की धारा 4(2) को हटाया गया है, जिसने व्यक्तियों को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं स्थापित करने की स्वतंत्रता प्रदान की थी। अब इस विधेयक का विरोध मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, पुणे जैसे कई शहरों में हो रहा है।

Transgender Act Amendment: विरोध का कारण क्या है?

सरकार का कहना है कि नई परिभाषा को स्पष्ट करने के पीछे उनका उद्देश्य वास्तव में ट्रांसजेंडर लोगों को लाभ पहुंचाना है। लेकिन ट्रांसजेंडर कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इससे उनकी पहचान का अधिकार संकुचित हो रहा है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि लिंग पहचान केवल वे स्वयं तय कर सकते हैं। नए संशोधनों में चिकित्सा बोर्ड की ओर से सत्यापन की प्रक्रिया लागू की गई है, जो उन्हें स्वीकार्य नहीं है।

पुरानी और नई परिभाषा में क्या अंतर है?

पुरानी परिभाषा में ट्रांस-मेन, ट्रांस वुमन, जेंडरक्वीयर, नॉन-बाइनरी और पारंपरिक समुदायों जैसे हिजड़ा और किन्नर शामिल थे। नए विधेयक में इन श्रेणियों में से कुछ हटा दी गई हैं। अब केवल किन्नर, हिजड़ा और अरावानी जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा, जन्म के समय की विशेषताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

शशि थरूर का कड़ा विरोध

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस विधेयक की तीव्र आलोचना की है। उन्होंने इसे पिछड़ा बताते हुए कहा कि यह संवैधानिक सुरक्षाओं को कमजोर करेगा। थरूर ने कहा कि वह घटनाक्रम पर ध्यान रख रहे हैं और इसे चिंताजनक मानते हैं।

NALSA फैसले को कमजोर करने की आशंका

पुणे में क्वीयर समुदाय के लगभग 200 सदस्य इस विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह विधेयक NALSA के ऐतिहासिक फैसले को कमजोर करता है, जिसने किसी भी व्यक्ति को अपनी लिंग पहचान खुद तय करने का अधिकार दिया था। उन लोगों का मानना है कि चिकित्सा जांच की अनिवार्यता उनके शरीर की स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

बदले हुए अधिकारों पर कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया

ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता मनस्वी गोइलकर ने कहा कि लिंग का निर्धारण किसी सरकारी या मेडिकल रिपोर्ट द्वारा नहीं होना चाहिए। उन्होंने साफ कहा, “मेरा शरीर, मेरी पसंद।” पहले हमें अपनी पहचान के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता था, लेकिन अब सरकार हमें साबित करने पर मजबूर कर रही है कि हम कौन हैं। यह हमारे अधिकारों का उल्लंघन है।

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