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January 2, 2026

पश्चिम बंगाल SIR में बड़ा खुलासा: मतदाता सूची से महिलाओं के नाम असामान्य रूप से हटे !

The CSR Journal Magazine

 

पश्चिम बंगाल SIR: मतदाता सूची से हटाए गए नामों में असामान्य पैटर्न उजागर! महिलाओं के नाम पुरुषोंसे कहीं अधिक हटे, मौत के कारणों में भी दिखी गड़बड़ी ! SIR की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर उठे सवाल !

पश्चिम बंगाल में SIR सूची में भयंकर धांधली

पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision- SIR) के तहत मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध मतदान केंद्र-स्तरीय (Polling Station Level) आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस प्रक्रिया में महिलाओं के नाम पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक संख्या में हटाए गए हैं। इसके साथ ही, नाम हटाने के कारणों, विशेष रूप से “मृत्यु” की श्रेणी में भी कई क्षेत्रों में असामान्य रुझान दिखाई दिए हैं।

महिलाओं के नाम अधिक हटे

आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान कुल करीब 58 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए। इनमें से 56 लाख हटाए गए मतदाताओं का विस्तृत मतदान केंद्र-स्तरीय डेटा उपलब्ध है। इस उपलब्ध डेटा के विश्लेषण से सामने आया कि लगभग 4 लाख अधिक महिलाओं के नाम पुरुषों की तुलना में मतदाता सूची से हटाए गए। यह रुझान केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। इसी तरह का पैटर्न तमिलनाडु और बिहार में भी देखा गया, जहां SIR के दौरान महिलाओं के नाम हटने की संख्या पुरुषों से अधिक रही।

मौत के कारण नाम हटाने पर सवाल

मतदाता सूची से नाम हटाने के कारणों में “मृत्यु” एक प्रमुख वजह बताई गई है। हालांकि, कई इलाकों में इस श्रेणी में असामान्य आंकड़े सामने आए हैं। कुछ मतदान केंद्रों पर महिलाओं की मृत्यु के आधार पर नाम हटाने की संख्या अपेक्षाकृत अधिक दर्ज की गई, जबकि जनसंख्या और आयु संरचना के हिसाब से ऐसा होना अस्वाभाविक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी क्षेत्र में अचानक बड़ी संख्या में मतदाताओं, खासतौर पर महिलाओं के नाम मृत्यु के कारण हटाए जाते हैं, तो इसकी स्वतंत्र जांच जरूरी हो जाती है।

डेटा उपलब्धता और सीमाएं

यह पूरा विश्लेषण केवल उन 56 लाख हटाए गए मतदाताओं पर आधारित है, जिनका मतदान केंद्र-स्तरीय डेटा मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Electoral Officer) की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध था। शेष करीब 2 लाख मतदाताओं के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध न होने के कारण उन्हें विश्लेषण में शामिल नहीं किया जा सका। विश्लेषकों का मानना है कि यदि पूरा डेटा उपलब्ध होता, तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो सकती थी।

राजनीतिक और सामाजिक असर

मतदाता सूची से नाम हटना सीधे तौर पर लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मामला है। महिलाओं के नाम अधिक संख्या में हटने से यह सवाल उठ रहा है कि क्या SIR प्रक्रिया में कहीं न कहीं जमीनी स्तर पर त्रुटियां हुई हैं। विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने मांग की है कि चुनाव आयोग इस पूरे मामले की पारदर्शी समीक्षा करे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी योग्य मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से न हटे।

SIR सूची को लेकर देश के अन्य राज्यों में हुई गड़बड़ियां

देशभर में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision- SIR) के दौरान केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि कई अन्य राज्यों में भी मतदाता सूची को लेकर गड़बड़ियों और असामान्य रुझानों के आरोप सामने आए हैं। अलग-अलग राज्यों के आंकड़ों और जमीनी रिपोर्टों से यह संकेत मिला है कि SIR प्रक्रिया के दौरान कुछ वर्गों के मतदाताओं के नाम अपेक्षा से अधिक संख्या में हटाए गए।

तमिलनाडु: महिलाओं के नाम अधिक कटे

तमिलनाडु में SIR के दौरान यह सामने आया कि मतदाता सूची से हटाए गए नामों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक थी। कई इलाकों में “स्थान परिवर्तन” और “मृत्यु” को नाम हटाने का कारण बताया गया, लेकिन स्थानीय स्तर पर लोगों ने दावा किया कि कई जीवित और वहीं रहने वाली महिला मतदाताओं के नाम भी सूची से गायब पाए गए।

बिहार: प्रवास और मृत्यु कारणों पर विवाद

बिहार में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम “प्रवास” (Migration) के आधार पर हटाए गए। खासतौर पर मजदूर वर्ग और महिलाओं के नाम कटने की शिकायतें सामने आईं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि अस्थायी रूप से बाहर गए लोगों के नाम भी स्थायी रूप से हटा दिए गए, जिससे उनके मतदान अधिकार पर असर पड़ा।

उत्तर प्रदेश: स्थानीय स्तर पर आपत्तियां

उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में SIR के बाद ग्रामीण इलाकों से शिकायतें आईं कि बिना सूचना के मतदाता सूची में बदलाव कर दिए गए। कई परिवारों के एक-दो सदस्यों के नाम बने रहे, जबकि बाकी के नाम कट गए, जिससे प्रक्रिया की एकरूपता पर सवाल उठे।

महाराष्ट्र: शहरी इलाकों में नाम गायब

महाराष्ट्र के बड़े शहरों में SIR के बाद यह पाया गया कि झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों और पुनर्विकास इलाकों में रहने वाले मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में हटे। यहां भी महिलाओं और बुजुर्गों के नाम कटने की शिकायतें ज्यादा रहीं।

चुनाव आयोग और उठते सवाल

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का मकसद फर्जी, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को शुद्ध बनाना है। लेकिन अलग-अलग राज्यों से आ रही शिकायतें यह दर्शाती हैं कि जमीनी स्तर पर सत्यापन में चूक हुई हो सकती है।पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में SIR सूची को लेकर सामने आई गड़बड़ियां यह संकेत देती हैं कि यह केवल एक राज्य तक सीमित समस्या नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन मामलों की पारदर्शी समीक्षा और सुधार नहीं किया गया, तो मतदाता अधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है।

चुनाव आयोग की जिम्मेदारी

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन बनाना है। हालांकि, सामने आए आंकड़ों के बाद यह जरूरी हो गया है कि नाम हटाने के कारणों, खासकर महिलाओं और “मृत्यु” श्रेणी से जुड़े मामलों की गहन जांच की जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर आगामी चुनावों में मतदाता भागीदारी और चुनावी विश्वसनीयता पर पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महिलाओं के नामों की असमान रूप से अधिक कटौती और कारणों में दिख रही असामान्यताएं यह संकेत देती हैं कि इस प्रक्रिया की निष्पक्षता और सटीकता की दोबारा समीक्षा बेहद जरूरी है।
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