अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वेनेज़ुएला को लेकर उठाए गए अभूतपूर्व कदम ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ़्तारी के बाद अब अमेरिका उस देश के पुनर्निर्माण की ज़िम्मेदारी लेने की बात कर रहा है। सवाल है क्या यह रणनीति अमेरिका के लिए राह आसान करेगी या नई चुनौतियों को जन्म देगी?
मादुरो की गिरफ़्तारी और अमेरिका का ‘राष्ट्र-निर्माण’ एजेंडा
मार-ए-लागो में हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐलान किया कि अमेरिकी बलों ने रातों-रात कार्रवाई कर वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ़्तार कर लिया है। इसके साथ ही ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अस्थायी रूप से वेनेज़ुएला को “चलाने” में मदद करेगा, जब तक सत्ता का सुरक्षित हस्तांतरण नहीं हो जाता।
इस प्रक्रिया में विदेश मंत्री मार्को रूबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की अगुवाई में एक अमेरिकी टीम वेनेज़ुएला के लोगों के साथ काम करेगी। हालांकि “देश चलाने” की वास्तविक रूपरेखा क्या होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। ट्रंप का यह रुख़ उस नेता की छवि से उलट है, जिसने चुनावों में हमेशा विदेशी युद्धों और सत्ता परिवर्तन अभियानों का विरोध किया था।

अमेरिका फ़र्स्ट बनाम ज़मीनी हक़ीक़त
ट्रंप ने दावा किया कि वेनेज़ुएला में हस्तक्षेप अमेरिका की क्षेत्रीय सुरक्षा और तेल आपूर्ति को स्थिर करेगा। उन्होंने अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों को वेनेज़ुएला के जर्जर ढांचे के पुनर्निर्माण में शामिल करने और अमेरिकी संसाधनों से इस प्रक्रिया को फंड करने की बात कही।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह कदम “हमेशा चलने वाले युद्धों” की ओर एक और क़दम हो सकता है। स्वयं ट्रंप ने यह स्वीकार किया कि ज़रूरत पड़ी तो अमेरिकी सैनिक ज़मीन पर तैनात किए जा सकते हैं। इराक़ युद्ध के संदर्भ में पूर्व विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल की चेतावनी “अगर आप इसे बिगाड़ते हैं, तो ज़िम्मेदारी आपकी होगी” एक बार फिर चर्चा में है।

डोनरो डॉक्ट्रिन और वैश्विक संदेश
ट्रंप ने उन्नीसवीं सदी की मुनरो डॉक्ट्रिन को नया नाम देते हुए इसे “डोनरो डॉक्ट्रिन” कहा और पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिका का “घरेलू क्षेत्र” बताया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अब इस क्षेत्र में अमेरिकी प्रभुत्व पर कोई सवाल नहीं उठेगा।
लेकिन इस फ़ैसले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। चीन ने इसे एक संप्रभु देश पर लापरवाह हमला बताया, जबकि अमेरिकी सांसदों को डर है कि रूस और चीन इस उदाहरण का इस्तेमाल यूक्रेन या ताइवान जैसे मामलों में अपनी कार्रवाइयों को सही ठहराने के लिए कर सकते हैं।


