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February 5, 2026

बजट सत्र के दौरान संसद परिसर में हंगामा! राहुल गांधी ने बिट्टू को कहा ‘गद्दार’, बिट्टू का पलटवार ‘देश का दुश्मन कांग्रेस’ !

The CSR Journal Magazine

 

संसद के बजट सत्र के दौरान बुधवार को संसद परिसर में राजनीति का सबसे तीखा और कड़वा रूप देखने को मिला। विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन के बीच कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तथा केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू आमने-सामने आ गए। चंद सेकंड की यह नोक-झोंक देखते-देखते बड़ा सियासी तूफान बन गई, जिसने पूरे संसद सत्र की गरिमा और माहौल पर सवाल खड़े कर दिए।

बजट सत्र में राहुल- बिट्टू आमने-सामने, ‘गद्दार’ से ‘देश का दुश्मन’ तक पहुंची बात!

संसद परिसर में आज राजनीति का सबसे कड़वा चेहरा सामने आया। विपक्षी प्रदर्शन के बीच केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के गुजरने पर राहुल गांधी ने उन्हें ‘गद्दार’ कहकर निशाना साधा और हाथ मिलाने की कोशिश करते हुए तंज कसा- “तुम वापस कांग्रेस में ही आओगे।” इस पर बिट्टू भड़क उठे, हाथ मिलाने से इनकार किया और पलटवार में कांग्रेस को ‘सिखों का हत्यारा’ व राहुल गांधी को ‘देश का दुश्मन’ बताया। उन्होंने कहा कि वे ‘गुरु की पगड़ी’ पहनते हैं और किसी के सामने नहीं झुकेंगे। तीन बार कांग्रेस सांसद रह चुके और अब बीजेपी के कद्दावर मंत्री बिट्टू के इस तीखे जवाब ने साफ कर दिया कि दोनों के बीच सियासी सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

कैसे शुरू हुआ विवाद

बजट सत्र के दौरान जब विपक्षी सांसद महंगाई, बेरोजगारी और अन्य मुद्दों को लेकर संसद परिसर में प्रदर्शन कर रहे थे, उसी दौरान केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू वहां से गुजर रहे थे। इसी बीच राहुल गांधी ने बिट्टू की ओर इशारा करते हुए उन पर तीखा हमला बोला और उन्हें ‘गद्दार’ कह दिया। राहुल गांधी ने तंज कसते हुए हाथ मिलाने की कोशिश की और कहा- “तुम वापस कांग्रेस में ही आओगे।”

हाथ मिलाने से इनकार, तीखा पलटवार

राहुल गांधी की इस टिप्पणी से रवनीत सिंह बिट्टू बुरी तरह भड़क गए। उन्होंने न केवल हाथ मिलाने से इनकार किया, बल्कि वहीं खड़े-खड़े जोरदार पलटवार कर दिया। बिट्टू ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा- “कांग्रेस सिखों की हत्यारी है और देश की दुश्मन है।” उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी का व्यवहार “सड़क के गुंडे” जैसा है और वे ऐसे किसी व्यक्ति के सामने सिर नहीं झुकाएंगे। बिट्टू ने भावुक होते हुए कहा कि उनके सिर पर गुरु की पगड़ी है और वे अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करेंगे। उन्होंने दो टूक कहा कि जो लोग देश और समाज के खिलाफ खड़े रहे हैं, उनसे हाथ मिलाने का सवाल ही नहीं उठता।

संसद का माहौल गरमाया, बिट्टू का सियासी सफर बना विवाद की जड़

इस तीखी नोक-झोंक के बाद संसद परिसर में माहौल और तनावपूर्ण हो गया। भाजपा और कांग्रेस सांसदों के बीच जोरदार नारेबाजी हुई। कुछ देर के लिए संसद की कार्यवाही भी बाधित हुई और सुरक्षा कर्मियों को स्थिति संभालने में मशक्कत करनी पड़ी।गौरतलब है कि रवनीत सिंह बिट्टू तीन बार कांग्रेस के सांसद रह चुके हैं, लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। वर्तमान में वे भाजपा सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं। यही वजह है कि राहुल गांधी का हमला सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत कटाक्ष के रूप में भी देखा जा रहा है। घटना के बाद भाजपा ने राहुल गांधी के बयान की कड़ी निंदा की। भाजपा नेताओं ने इसे संसद की गरिमा के खिलाफ बताया और कहा कि राहुल गांधी बार-बार मर्यादा लांघ रहे हैं। पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष से इस मामले में कार्रवाई की मांग भी की।

कांग्रेस की सफाई

वहीं कांग्रेस की ओर से कहा गया कि यह पूरी घटना सत्ता पक्ष की बौखलाहट को दिखाती है। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे विवादों को हवा दे रही है। वहीं विश्लेषकों का कहना है कि यह छोटा-सा इशारा ज्यादा व्यापक राजनीतिक उसूलों को उजागर करता है। एक समय कांग्रेस में रह चुके एक वरिष्ठ नेता का बीजेपी में शामिल होना, और गांधी परिवार द्वारा आलोचना का सीधा जवाब राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को नई ऊँचाइयों पर ले जाने वाला।

कौन हैं रवनीत सिंह बिट्टू ?

रवनीत सिंह बिट्टू तीन बार कांग्रेस से सांसद रहे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गये थे। अब वे रेल मंत्रालय में राज्य मंत्री के पद पर कार्यरत हैं। यह इतिहास दोनों के बीच व्यक्तिगत राजनीति और सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप को और जटिल बनाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव सिर्फ एक क्षणिक विवाद नहीं है, बल्कि आने वाले समय में कांग्रेस और भाजपा के बीच और तीखी राजनीतिक जंग का संकेत है। राहुल गांधी और रवनीत सिंह बिट्टू के बीच हुई यह नोक-झोंक यह साफ कर गई है कि दोनों के बीच अब किसी भी तरह की सुलह या नरमी की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

संसद परिसर में गिरती राजनीतिक भाषा और लोकतांत्रिक मर्यादा

4 फरवरी 2026 को संसद परिसर में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ दो नेताओं के बीच की तीखी बहस नहीं थी, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की मौजूदा राजनीतिक संस्कृति का आईना भी था। बजट सत्र जैसे गंभीर और नीतिगत विमर्श के मंच पर ‘गद्दार’, ‘देश का दुश्मन’ और ‘सड़क का गुंडा’ जैसे शब्दों का प्रयोग इस बात का संकेत है कि राजनीति में संवाद की जगह अब टकराव और अपमान लेता जा रहा है। राहुल गांधी द्वारा केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को ‘गद्दार’ कहे जाने और इसके जवाब में बिट्टू का कांग्रेस को ‘सिखों का हत्यारा’ व राहुल गांधी को ‘देश का दुश्मन’ बताना, दोनों ही पक्षों की भाषा लोकतांत्रिक गरिमा के अनुरूप नहीं कही जा सकती। यह घटना दिखाती है कि व्यक्तिगत राजनीतिक इतिहास और दल-बदल की कड़वाहट किस तरह सार्वजनिक संस्थानों की मर्यादा पर हावी हो रही है।

व्यक्तिगत कटुता बनाम सार्वजनिक जिम्मेदारी

रवनीत सिंह बिट्टू का कांग्रेस से भाजपा तक का राजनीतिक सफर, और राहुल गांधी के साथ उनका पुराना संबंध इस टकराव की पृष्ठभूमि जरूर समझाता है, लेकिन उसे सही नहीं ठहराता। संसद परिसर किसी व्यक्तिगत हिसाब-किताब का अखाड़ा नहीं है। यहां कही गई हर बात सिर्फ कैमरों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि देश के लोकतांत्रिक चरित्र को भी प्रभावित करती है। बिट्टू द्वारा ‘गुरु की पगड़ी’ का उल्लेख भावनात्मक अपील जरूर है, लेकिन जब धार्मिक पहचान को राजनीतिक टकराव के बीच लाया जाता है, तो वह विवाद को और गहरा कर देता है। वहीं, कांग्रेस पर ‘सिखों का हत्यारा’ जैसे आरोप दशकों पुराने जख्मों को फिर से कुरेदने का काम करते हैं। यह राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक विभाजन का जोखिम है।

विपक्ष और सत्ता- दोनों की परीक्षा

इस घटना में न तो विपक्ष पूरी तरह निर्दोष दिखता है और न ही सत्ता पक्ष। राहुल गांधी का सार्वजनिक रूप से ‘गद्दार’ कहना एक गैर-जिम्मेदाराना राजनीतिक हमला था, वहीं भाजपा नेताओं द्वारा तुरंत ‘देशद्रोह’ और ‘राष्ट्रीय दुश्मन’ की भाषा अपनाना भी उसी स्तर की अतिशयोक्ति है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन उसे देशभक्ति और राष्ट्रद्रोह के तराजू पर तौलना खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है।

बड़ा सवाल: संसद किस दिशा में जा रही है?

यह टकराव एक बड़े प्रश्न को जन्म देता है- क्या संसद अब नीति, बहस और समाधान का मंच रह गई है, या वह सिर्फ सियासी टकराव और सुर्खियों की लड़ाई बनती जा रही है? जब बजट जैसे अहम मुद्दे हाशिये पर चले जाएं और व्यक्तिगत आरोप केंद्र में आ जाएं, तो नुकसान सिर्फ राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का होता है। 4 फरवरी की यह घटना चेतावनी है। चेतावनी इस बात की कि अगर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने अपनी भाषा और व्यवहार पर संयम नहीं रखा, तो लोकतंत्र की गरिमा धीरे-धीरे खोखली होती  जाएगी। संसद को फिर से संवाद, तर्क और मर्यादा का मंच बनाना होगा, वरना ‘गद्दार’ और ‘देश का दुश्मन’ जैसे शब्द बहस का नहीं, बल्कि राजनीति के पतन का स्थायी प्रतीक बन जाएंगे।
संसद का यह सियासी संग्राम आने वाले दिनों में और कितना उग्र होगा, इस पर अब पूरे देश की नजर टिकी हुई है।

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