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March 4, 2026

जस्टिस नागरत्ना की बयान: जज बनें निडर, अलोकप्रिय फैसलों से मत डरें

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने साफ कहा है कि न्यायाधीशों को अपने फैसले देने में करियर की चिंता नहीं करनी चाहिए। केरल हाई कोर्ट में जस्टिस टीएस कृष्णमूर्ति अय्यर स्मृति व्याख्यान के दौरान उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना है कि अलोकप्रिय निर्णय किसी जज के करियर को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने पद की शपथ और न्यायिक धर्म का पालन करना चाहिए।

असहमति का मूल्य

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि न्यायाधीशों को सहकर्मियों से अलग राय रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। असहमति वाले फैसले न्यायिक बौद्धिक स्वतंत्रता का प्रतीक हैं। उन्होंने यह भी बताया कि न्यायिक राय केवल सहमति का दस्तावेज नहीं होती, बल्कि यह संवैधानिक विश्वास की स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। इस संदर्भ में उन्होंने जस्टिस टीएस कृष्णमूर्ति अय्यर को न्याय और समानता के प्रति समर्पित एक महान न्यायाधीश बताया।

संविधान की सीमाएं और स्वतंत्रता

जस्टिस नागरत्ना के अनुसार, ‘मूल संरचना सिद्धांत’ संविधान की न्यूनतम सीमाएं तय करते हैं, जबकि ‘परिवर्तनकारी संवैधानिकता’ उसे आगे बढ़ाने की दिशा देती है। उनका कहना है कि इन सीमाओं की निगरानी न्यायपालिका द्वारा न्यायिक समीक्षा के जरिए ही की जाती है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामूहिक हित के नाम पर कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

सरकारी संस्थाओं की विफलता पर रोष

जस्टिस नागरत्ना ने सरकारी संस्थाओं की आलोचना करते हुए कहा कि ये ऐसी मुकदमे लड़ रही हैं, जिनमें जीत की कोई संभावना नहीं होती। इस तरह के मामलों से देश के संसाधनों की बर्बादी हो रही है और अदालतों का कीमती समय भी खराब हो रहा है। उन्होंने यह सुझाव दिया कि सरकारी संस्थाओं को बेकार के मुकदमे न लड़कर मध्यस्थता का रास्ता अपनाना चाहिए।

जुड़ाव और भविष्य के लिए प्रेरणा

अपने संबोधन में जस्टिस नागरत्ना ने जस्टिस टीएस कृष्णमूर्ति अय्यर की विनम्रता और संवेदनशीलता को भी सराहा। उनका मानना है कि ये गुण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेंगे। जस्टिस नागरत्ना ने न्याय में प्रतिबद्धता को एक महत्वपूर्ण बात बताते हुए कहा कि यह न केवल न्यायपालिका बल्कि सम्पूर्ण समाज के लिए आवश्यक है।

अंतिम विचार

जस्टिस नागरत्ना का यह कार्यक्रम न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक धर्म के महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक नई रोशनी डालता है। उनके विचार यह स्पष्ट करते हैं कि न्यायाधीशों को अपने पद की जिम्मेदारियों को समझते हुए निडर होकर फैसले लेने चाहिए।
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