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February 5, 2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन: मेटा-व्हाट्सऐप को चेतावनी- यूज़र डेटा विज्ञापन के लिए साझा नही होगा!

The CSR Journal Magazine

 

हलफनामा दाखिल करने का आदेश, नहीं तो याचिका होगी खारिज ! डिजिटल निजता पर सख्त संदेश ! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश- मेटा और व्हाट्सऐप को यूज़र डेटा विज्ञापन के लिए साझा नहीं करने की सख्त चेतावनी !

निजता बनाम बिग टेक: सुप्रीम कोर्ट की मेटा-व्हाट्सऐप को सख्त चेतावनी

भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने मंगलवार को इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म व्हाट्सऐप और उसकी पैरेंट कंपनी मेटा प्लेटफॉर्म्स को कड़ी चेतावनी दी है कि यूज़र डेटा को किसी भी तरह से विज्ञापन उद्देश्यों या वाणिज्यिक लाभ के लिए साझा नहीं किया जा सकता। अदालत ने कंपनियों को स्पष्ट हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने का आदेश दिया है जिसमें वे यह पूरा वचन दें कि भारतीय यूज़र्स का डेटा विज्ञापन के लिए साझा नहीं किया जाएगा। अगर यह हलफनामा समय पर नहीं दिया गया तो उनकी मुख्य याचिका खारिज कर दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक बहुप्रतीक्षित कानूनी लड़ाई का हिस्सा है, जो व्हाट्सऐप की 2021 गोपनीयता नीति और डेटा साझा करने के उसके प्रावधानों के खिलाफ Competition Commission of India (CCI) तथा अन्य वादी पक्षों द्वारा उठाए गए सवालों पर आधारित है।

क्या है मामले की पृष्ठभूमि ?

यह विवाद 2021 में व्हाट्सऐप द्वारा लागू की गई अपनी नई प्राइवेसी पॉलिसी से शुरू हुआ था जिसमें भारत के उपयोगकर्ताओं को यह कहना पड़ा कि यदि वे अपनी कुछ व्यक्तिगत जानकारी मेटा समूह कंपनियों के साथ साझा करने को स्वीकार नहीं करते, तो उन्हें व्हाट्सऐप का उपयोग जारी रखना मुश्किल हो जाएगा। इस “टेक-इट-ऑर-लीव-इट” नीति पर निजता विशेषज्ञों और नियामकों ने सवाल उठाए कि क्या यह वास्तविक स्वीकृति (Consent) है या उपयोगकर्ताओं पर दबाव। केन्द्र प्रतिष्‍ठित प्रतिस्पर्धा नियामक Competition Commission of India (CCI) ने नवंबर 2024 में यह पाया कि व्हाट्सएप की यह नीति प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन कर सकती है और उसने व्हाट्सएप और मेटा पर ₹213.14 करोड़ का जुर्माना लगाया, साथ ही डेटा साझा करने पर रोक लगाई।
व्हाट्सऐप और मेटा ने इस CCI के आदेश को National Company Law Appellate Tribunal  (NCLAT) में चुनौती दी, जहां नवंबर 2025 में कुछ हिस्सों की समीक्षा के बाद डेटा साझा करने के प्रतिबंध को हटाया गया लेकिन जुर्माने को बरकरार रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों वाली बेंच- चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस  विपुल एम. पन्चोली ने मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट कर दिया कि-
• भारत में किसी भी कंपनी को नागरिकों के निजता अधिकार के खिलाफ उपयोगकर्ता डेटा साझा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
• “हम आपके डेटा को एक भी बिट भी साझा नहीं होने देंगे”-CJI ने सख्ती से कहा।
• अदालत ने पूछा कि ऐसे में उपयोगकर्ता के पास वास्तविक विकल्प (Choice) क्या है जब व्हाट्सएप सेवा मुफ्त हो और कंपनी का वर्चस्व व्यापक हो?
साथ ही CJI ने संकेत दिया कि यदि कंपनियां भारतीय संविधान और स्थानीय कानूनों का पालन नहीं कर सकतीं, तो उन्हें भारत से बाहर निकलने पर विचार करना चाहिए।

कोर्ट का आदेश और अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने Meta और WhatsApp को निर्देश दिया है कि वे 9 फ़रवरी 2026 तक अपना हलफनामा (Affidavit) दाखिल करें, जिसमें यह घोषित किया जाए कि वे यूज़र डेटा को विज्ञापन या अन्य व्यावसायिक उपयोग के लिए साझा नहीं करेंगे। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई उसी दिन के लिए निर्धारित की है। यदि कंपनियां समय पर ऐसा हलफनामा नहीं देती हैं, तो उनकी याचिका खारिज की जा सकती है।

निजता अधिकार बनाम व्यापार मॉडल

विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला डिजिटल निजता अधिकार बनाम वैश्विक टेक कंपनी के व्यापार मॉडल के बीच टकराव का उदाहरण है। व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स अपनी सेवाएं मुफ्त में देते हैं और विज्ञापन आधारित राजस्व मॉडल पर आश्रित रहते हैं, जिसमें यूज़र डेटा का एकीकृत उपयोग महत्वपूर्ण होता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों में व्यापारिक हितों के लिए छूट नहीं दी जाएगी।

क्या साधारण उपयोगकर्ता को फर्क पड़ेगा?

अगर सुप्रीम कोर्ट डेटा साझा करने पर प्रतिबंध जारी रखता है और कंपनियों द्वारा विज्ञापन-आधारित डेटा-शेयरिंग नीतियों को रोकता है, तो-
• व्हाट्सऐप और मेटा को अपने विज्ञापन और डेटा-आधारित सेवाओं की रणनीति पुन: परिभाषित करनी पड़ सकती है।
• उपयोगकर्ता डेटा की निजता सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
• कंपनियों को स्पष्ट, स्वतंत्र रूप से दिए गए सहमति विकल्प (Informed Opt-In/Opt-Out) को लागू करना होगा।
नोट: यह खबर 3-4 फ़रवरी 2026 के दौर में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई और दिए गए आदेशों पर आधारित है।

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