सुप्रीम कोर्ट के जज का बयान: ज्यूडिशियरी की सख्ती से कैदियों की हालत चिंताजनक

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने हाल ही में बेंगलुरु में आयोजित सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली नेशनल समिट में ज्यूडिशियरी के सख्त रवैये पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि कुछ हिस्से ‘मोर लॉयल देन द किंग सिंड्रोम’ से ग्रस्त हैं। इसके कारण कई लोग लंबी अवधि के लिए जेलों में सड़ने को मजबूर हैं। जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका की भूमिका पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि न्यायपालिका को राजनीतिक नारों से अलग रहना चाहिए।

कानूनों का मनमाना प्रयोग

जस्टिस भुइयां ने PMLA और UAPA जैसे कानूनों के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर भी अपनी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि जब इन अधिनियमों के तहत आरोपियों की दोषसिद्धि की दर बहुत कम है, तो उन्हें सालों तक जेल में क्यों रखा जाए। उन्होंने उल्लेख किया कि ऐसे कानूनों के अत्यधिक उपयोग से उनके प्रभाव में कमी आ रही है।

सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल

बातचीत के दौरान जस्टिस भुइयां ने सोशल मीडिया से जुड़े विवादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई SIT पर भी नकारात्मक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस तरह की समितियों से केवल समय की बर्बादी होती है और नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन होता है। ऐसे कौन से मुद्दे हैं जिनके लिए अदालतें इस तरह की कार्रवाई कर रही हैं, यह भी एक गंभीर प्रश्न है।

विकसित भारत का नारा और न्यायपालिका

जज ने ‘विकसित भारत’ के राजनीतिक नारे के साथ न्यायपालिका के जोड़ने को खतरनाक बताया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का काम स्वतंत्र होना चाहिए और इसे राजनीतिक लक्ष्यों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। जब हम विकास की बात करते हैं, तो बहस और असहमति का होना भी जरूरी है। असहमति को अपराध नहीं माना जाना चाहिए, यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।

दलितों के प्रति भेदभाव पर कड़ी चेतावनी

जस्टिस भुइयां ने दलितों के खिलाफ भेदभाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यदि समाज में दलितों के प्रति भेदभाव जारी रहा तो विकास का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। माता-पिता को यह नहीं कहने का हक नहीं है कि उनके बच्चे दलितों से दूर रहें। इस तरह के सामाजिक भेदभाव उत्पन्न करने वाली स्थितियों का निर्माण नहीं होना चाहिए।

सम्मान की रक्षा की आवश्यकता

जज ने व्यक्तिगत सम्मान को प्राथमिकता देने की बात की। उन्होंने कहा कि समाज में सभी व्यक्तियों का सम्मान होना चाहिए। यदि हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, तो उस विकास में सभी वर्गों को समानता का अधिकार होना आवश्यक है। किसी एक वर्ग के साथ भेदभाव करना विकास के मूल सिद्धांतों को चुनौती देना है।

समाज में बदलाव की जरूरत

इस पैनल डिस्कशन के दौरान जस्टिस भुइयां की बातें समाज में गहरी छाप छोड़ती हैं। उन्होंने न्यायपालिका को याद दिलाया कि समाज में समानता और सम्मान के बिना विकास अधूरा होगा। उनका यह बयान निश्चित रूप से लोगों के बीच बहस का विषय बनेगा।

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