मुंबई में ट्रैफिक जाम, बारिश के दौरान जलभराव और कचरा प्रबंधन जैसी लगातार बनी रहने वाली समस्याओं पर सख्त रुख अपनाते हुए Bombay Highcourt ने Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) और अन्य संबंधित प्राधिकरणों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने सवाल किया कि “एशिया की सबसे अमीर नगर निगम” होने के बावजूद क्या उसके अधिकारी नागरिकों के जीवन और सुरक्षा को लेकर सच में गंभीर हैं?
अदालत की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति गिरीश एस कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती ए साठे की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अन्य राज्य और विकसित देश शहरी समस्याओं से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक और प्रभावी प्रणालियों का उपयोग कर रहे हैं, जबकि मुंबई अब भी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है। अदालत ने BMC से पूछा कि क्या उसने कभी यह अध्ययन किया है कि विकसित देश ट्रैफिक प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, कचरा निस्तारण और नागरिक चेतावनी प्रणाली को किस तरह प्रभावी ढंग से संचालित करते हैं?
विशेषज्ञों की टीम भेजने का निर्देश
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि BMC अपने अधिकारियों और विशेषज्ञों की एक टीम गठित करे, जो विकसित देशों की उन्नत नागरिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करे। अदालत ने कहा कि यह टीम तुलनात्मक रिपोर्ट तैयार करे, जिससे यह समझा जा सके कि मुंबई में किन सुधारों की आवश्यकता है और किस प्रकार आधुनिक तकनीक को अपनाया जा सकता है। पीठ ने टिप्पणी की कि यदि अन्य शहर और देश बेहतर व्यवस्था लागू कर सकते हैं, तो मुंबई जैसे वैश्विक महानगर के लिए ऐसा करना असंभव नहीं होना चाहिए।
कांजुरमार्ग डंपिंग ग्राउंड का मुद्दा
यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें कांजुरमार्ग स्थित डंपिंग ग्राउंड में कचरा प्रबंधन की खराब स्थिति और आसपास के इलाकों में फैल रही दुर्गंध को लेकर चिंता जताई गई थी। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि ठोस कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की कमी के कारण स्थानीय निवासियों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। अदालत ने कहा कि कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी जिम्मेदारियों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
ट्रैफिक और बाढ़ पर भी चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मुंबई में हर वर्ष मानसून के दौरान भारी जलभराव और ट्रैफिक अव्यवस्था की स्थिति बन जाती है। समय रहते अलर्ट सिस्टम और प्रभावी योजना के अभाव में आम नागरिकों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। हाई कोर्ट ने पूछा कि क्या शहर में आपदा पूर्व चेतावनी (Early Warning System) और ट्रैफिक मैनेजमेंट के लिए आधुनिक तकनीक का पर्याप्त उपयोग हो रहा है?
‘नागरिकों की जान सर्वोपरि’
पीठ ने स्पष्ट किया कि नगर निगम की प्राथमिक जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुनिश्चित करना है। केवल बजट और संसाधनों का होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका प्रभावी उपयोग भी जरूरी है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि आवश्यक सुधार नहीं किए गए तो वह आगे भी कड़े निर्देश जारी कर सकती है।
आगे की सुनवाई पर नज़र
मामले की अगली सुनवाई में अदालत BMC से विस्तृत जवाब और प्रस्तावित कार्ययोजना की जानकारी मांगेगी। अब यह देखना होगा कि BMC अदालत के निर्देशों के अनुरूप किस प्रकार ठोस कदम उठाती है। मुंबई जैसे अंतरराष्ट्रीय महानगर में बार-बार जलभराव, ट्रैफिक अव्यवस्था और कचरा प्रबंधन की समस्याएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या प्रशासनिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक योजना की कमी ही असली वजह है? हाई कोर्ट की सख्ती के बाद उम्मीद की जा रही है कि नागरिक सुविधाओं में सुधार की दिशा में ठोस पहल देखने को मिलेगी।
अब बहानों से नहीं, बदलाव से होगी पहचान
मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। यहां की नगर निगम BMC को एशिया की सबसे अमीर नगर निगम माना जाता है। लेकिन जब बात नागरिक सुविधाओं, ट्रैफिक प्रबंधन, जलभराव और कचरा निस्तारण की आती है, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती। अदालत की यह टिप्पणी केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर गहरी चोट है।
समस्या केवल संसाधनों की नहीं, सोच की है
हर मानसून में मुंबई डूबती है। सड़कों पर घंटों ट्रैफिक जाम लगता है। जलभराव से आम नागरिकों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। इसके बावजूद हर साल वही स्पष्टीकरण और वही आश्वासन दोहराए जाते हैं। यदि संसाधनों की कमी होती तो स्थिति कुछ हद तक समझी जा सकती थी, लेकिन जब बजट और तकनीकी क्षमता दोनों मौजूद हों, तब बार-बार विफलता प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
कांजुरमार्ग की बदबू, व्यवस्था की सच्चाई
कांजुरमार्ग डंपिंग ग्राउंड को लेकर उठे सवाल केवल एक इलाके की समस्या नहीं हैं। यह पूरे शहर में ठोस कचरा प्रबंधन की चुनौती को उजागर करते हैं। दुर्गंध, प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम- ये सब दर्शाते हैं कि वैज्ञानिक और दीर्घकालिक समाधान की कमी है।
विकसित देशों से सीखने में हर्ज क्या?
हाई कोर्ट ने सुझाव दिया कि BMC विशेषज्ञों को विकसित देशों की उन्नत नागरिक प्रणालियों का अध्ययन करने भेजे और तुलनात्मक रिपोर्ट तैयार करे। यह सुझाव बताता है कि सुधार संभव है, यदि इच्छाशक्ति हो। दुनिया के कई शहर स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम, रियल-टाइम फ्लड मॉनिटरिंग और आधुनिक कचरा प्रबंधन तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। मुंबई भी वैश्विक शहर बनने का दावा करती है, तो उसे वैश्विक मानकों को अपनाना ही होगा।
नागरिकों का भरोसा दांव पर
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आम नागरिक को यह भरोसा है कि प्रशासन उसकी सुरक्षा और सुविधा को प्राथमिकता देता है? अदालत की सख्ती दरअसल उसी जनभावना की प्रतिध्वनि है। नगर निगम को यह समझना होगा कि “सबसे अमीर” होने का तमगा तभी सार्थक है, जब वह “सबसे जवाबदेह” भी बने।
यह समय आत्ममंथन का है
अदालत के निर्देश केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि सुधार का अवसर हैं। यदि BMC इस अवसर को गंभीरता से लेती है, तो मुंबई की पहचान केवल आर्थिक राजधानी की नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित और सुरक्षित महानगर की भी बन सकती है। अन्यथा, “अमीर नगर निगम” और “परेशान नागरिक”, यह विरोधाभास यूं ही बना रहेगा।
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