मध्य प्रदेश में स्थापित देश का पहला देशज कला-शिल्प गुरुकुल, विलुप्त होती लोक और आदिवासी कलाओं को नया जीवन देने की पहल! भारत की प्राचीन कला-शिल्प गुरुकुल परंपरा को मिला नया मंच! खजुराहो से देशज ज्ञान और लोककलाओं का पुनर्जीवन! गुरुओं के मार्गदर्शन में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण और संरक्षण के साथ आजीविका और सम्मान का प्रयास, संस्कृति को भविष्य से जोड़ने की संगठित पहल !
संरक्षण से साधना तक: भारत की प्राचीन कला-शिल्प गुरुकुल परंपरा की वापसी
मध्य प्रदेश सरकार ने प्रदेश की विलुप्त होती देशज कलाओं, शिल्प और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। संस्कृति विभाग द्वारा खजुराहो में देश का पहला देशज कला-शिल्प गुरुकुल स्थापित किया गया है, जहां पारंपरिक गुरुकुल पद्धति के तहत लोक, जनजातीय और देशज कलाओं का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस गुरुकुल की विधिवत शुरुआत 20 फरवरी से खजुराहो नृत्य समारोह के साथ होगी।संस्कृति विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस गुरुकुल में शास्त्रीय नहीं, बल्कि वे देशज प्रदर्शनकारी कलाएं और पारंपरिक शिल्प सिखाए जाएंगे, जो समय के साथ लुप्त होने की कगार पर हैं। इन कलाओं का प्रशिक्षण सीधे अनुभवी परंपरागत कला गुरुओं द्वारा दिया जाएगा, जिससे ज्ञान की मौलिकता और परंपरा दोनों सुरक्षित रह सकें।
असीमित प्रशिक्षण की व्यवस्था
गुरुकुल में प्रशिक्षण की अवधि तय नहीं होगी। प्रत्येक कला के अनुसार प्रशिक्षण की समय-सीमा संबंधित कला गुरु स्वयं निर्धारित करेंगे। हर बैच में अधिकतम 20 प्रशिक्षार्थियों को प्रवेश दिया जाएगा। इसके लिए संस्कृति विभाग द्वारा विज्ञापन जारी कर आवेदन आमंत्रित किए जाएंगे। यदि किसी कला के लिए 20 से अधिक आवेदन प्राप्त होते हैं, तो साक्षात्कार के माध्यम से चयन किया जाएगा।
निःशुल्क प्रशिक्षण और आवासीय सुविधा
गुरुकुल की एक बड़ी विशेषता यह है कि यहां प्रशिक्षण पूरी तरह निःशुल्क होगा। प्रशिक्षार्थियों से किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा। उनके रहने और खाने की पूरी व्यवस्था गुरुकुल परिसर में ही की गई है। शिल्प प्रशिक्षण के लिए आवश्यक कच्चा माल भी गुरुकुल द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा। प्रशिक्षण के दौरान तैयार किए गए सभी उत्पाद गुरुकुल में ही जमा रहेंगे, जिससे उन्हें भविष्य में प्रदर्शनी, दस्तावेजीकरण और शोध के लिए उपयोग किया जा सके।
देश में अपनी तरह का पहला संस्थान
संस्कृति विभाग का कहना है कि देश में शास्त्रीय नृत्य, संगीत और अन्य प्रदर्शन कलाओं को सिखाने के लिए कई सरकारी और निजी संस्थान मौजूद हैं, लेकिन देशज प्रदर्शनकारी कलाओं और पारंपरिक शिल्प के लिए कोई औपचारिक संस्थान अब तक नहीं था। खजुराहो का यह गुरुकुल इस दिशा में देश का पहला संगठित प्रयास है। गुरुकुल का संचालन लोक कला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा किया जाएगा।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल
खजुराहो स्थित आदिवर्त संग्रहालय परिसर में इस गुरुकुल की स्थापना की घोषणा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्ष 2024 के खजुराहो नृत्य समारोह के दौरान की थी। उसी अवसर पर उन्होंने गुरुकुल का भूमिपूजन भी किया था। घोषणा के बाद महज डेढ़ साल के भीतर गुरुकुल का निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया। हाल ही में खजुराहो में आयोजित कैबिनेट बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने गुरुकुल का औपचारिक उद्घाटन भी किया।
संरक्षण और रोजगार की नई राह
संस्कृति विभाग का मानना है कि यह गुरुकुल न केवल विलुप्त होती देशज कलाओं के संरक्षण में सहायक होगा, बल्कि इससे नई पीढ़ी को रोजगार और आजीविका के अवसर भी मिलेंगे। पारंपरिक ज्ञान को संस्थागत स्वरूप देकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना इस गुरुकुल का मुख्य उद्देश्य है। खजुराहो का यह देशज कला-शिल्प गुरुकुल मध्य प्रदेश को लोक और जनजातीय कला संरक्षण के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।
भारत की प्राचीन कला-शिल्प की गुरुकुल परंपरा
भारत की सभ्यता केवल ग्रंथों और राजवंशों से नहीं, बल्कि कला-शिल्प, स्थापत्य, नृत्य, संगीत और लोकज्ञान की सतत परंपरा से निर्मित हुई है। इस परंपरा के संरक्षण और हस्तांतरण का सबसे प्रभावी माध्यम रहा है- गुरुकुल प्रणाली, जिसमें कला और जीवन को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक समग्र अनुभव के रूप में सिखाया जाता था।
गुरुकुल : शिक्षा से आगे जीवन-संस्कार
प्राचीन भारत में गुरुकुल केवल अध्ययन का स्थान नहीं था, बल्कि संस्कार, अनुशासन और साधना का केंद्रथा। शिष्य गुरु के सान्निध्य में रहते हुए सेवा, अभ्यास और अनुकरण के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करता था। कला-शिल्प का ज्ञान पुस्तकों से नहीं, बल्कि हाथ, दृष्टि और अनुभूति से सीखा जाता था।मूर्ति-निर्माण, धातु शिल्प, वस्त्र बुनाई, चित्रकला, नृत्य, संगीत, रंगमंच और लोकनाट्य जैसी विधाएं पीढ़ी दर पीढ़ी गुरु-शिष्य परंपरा से आगे बढ़ीं। अजंता-एलोरा की भित्तिचित्र परंपरा, खजुराहो और कोणार्क का स्थापत्य, चोल कांस्य मूर्तियां, ये सभी गुरुकुलीय प्रशिक्षण की सजीव मिसालें हैं।
शिल्पशास्त्र और मौखिक ज्ञान-कला और अध्यात्म का संबंध
प्राचीन भारत में शिल्पशास्त्र, वास्तुशास्त्र, नाट्यशास्त्र और संगीत रत्नाकर जैसे ग्रंथ थे, लेकिन उनका वास्तविक प्रयोग गुरु द्वारा प्रत्यक्ष सिखाया जाता था। कई तकनीकें आज भी लिखित नहीं हैं; वे मौखिक परंपरा के माध्यम से ही सुरक्षित रहीं। भारतीय कला-शिल्प केवल सौंदर्य का विषय नहीं था, बल्कि वह आध्यात्मिक साधना का रूप था। नृत्य में भक्ति, मूर्तिकला में ध्यान और संगीत में योग का भाव निहित था। गुरुकुलों में शिष्य को यह सिखाया जाता था कि कला अहंकार नहीं, साधना है।
समुदाय और आजीविका
गुरुकुल परंपरा ने कलाकारों को समाज में सम्मान और आजीविका दोनों प्रदान कीं। शिल्पकार, नर्तक, गायक और कारीगर समाज की आवश्यक इकाइयां थे। मंदिर, राजदरबार और लोकजीवन, तीनों में उनकी भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण थी। औपनिवेशिक दौर में गुरुकुल व्यवस्था कमजोर पड़ी। अंग्रेजी शिक्षा और औद्योगिक उत्पादन ने हस्तशिल्प और पारंपरिक प्रशिक्षण को हाशिये पर धकेल दिया। परिणामस्वरूप अनेक कलाएं विलुप्त होने लगीं।
आधुनिक भारत में पुनर्जीवन की आवश्यकता
आज आवश्यकता है कि प्राचीन गुरुकुल परंपरा को आधुनिक ढांचे के साथ पुनर्जीवित किया जाए। खजुराहो जैसे देशज कला-शिल्प गुरुकुल इस दिशा में सार्थक प्रयास हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि पारंपरिक ज्ञान आज भी प्रासंगिक है। भारत की प्राचीन कला-शिल्प की गुरुकुल परंपरा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का आधार है। जब तक कला सीखने की प्रक्रिया में गुरु, साधना और जीवन-मूल्य जुड़े रहेंगे, तब तक भारतीय कला जीवित रहेगी। आज आवश्यकता है कि हम गुरुकुल को स्मृति नहीं, बल्कि संस्कृति की पुनर्स्थापना का माध्यम बनाएं।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

