UP Magh Mela: माघ मेले के पावन अवसर पर प्रयाग की सनातन परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक पंचकोसी परिक्रमा की विधिवत शुरुआत हो गई है। त्रिवेणी संगम के तट पर गंगा पूजन के साथ सोमवार को इस पांच दिवसीय धार्मिक यात्रा का शुभारंभ हुआ। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और प्रमुख अखाड़ों के संत-महंतों की अगुवाई में शुरू हुई यह परिक्रमा माघ मेले का एक प्रमुख आध्यात्मिक आकर्षण मानी जाती है।
UP Magh Mela: संगम से अक्षयवट तक, आस्था का कारवां
संगम में विधि विधान से पूजन-अर्चन के बाद साधु-संतों का जत्था अक्षयवट और आदि शंकर विमान मंडपम मंदिर पहुंचा। पहले दिन की परिक्रमा का समापन धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हुआ। माघ मेला प्रशासन ने परिक्रमा मार्ग पर यातायात, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। पांच दिनों तक चलने वाली इस पंचकोसी परिक्रमा का समापन अंतिम दिन साधु-संतों के भंडारे के साथ होगा।
क्या है पंचकोसी परिक्रमा का महत्व What is Panchkosi Parikrama
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरि गिरि के अनुसार, पंचकोसी परिक्रमा प्रयागराज की अत्यंत प्राचीन धार्मिक परंपरा है। प्रयाग मंडल का विस्तार पांच योजन और बीस कोस में माना गया है। गंगा, यमुना और सरस्वती के छह तटों से बनी तीन अंतर्वेदियां अंतर्वेदी, मध्यवेदी और बहिर्वेदी इस परिक्रमा का आधार हैं। इन क्षेत्रों में स्थित तीर्थ, उपतीर्थ, आश्रम, मठ और जलकुंडों की परिक्रमा से श्रद्धालुओं को अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
556 साल बाद लौटी परंपरा
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने बताया कि पंचकोसी परिक्रमा माघ मेले का अभिन्न हिस्सा थी, लेकिन करीब 556 वर्ष पहले मुगल शासक अकबर के समय इस परंपरा पर रोक लगा दी गई थी। वर्षों तक साधु-संतों की मांग के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने 2019 में इसे पुनर्जीवित किया। तब से यह परंपरा लगातार चल रही है और हर वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है।
सनातन संस्कृति का जीवंत प्रतीक
आज पंचकोसी परिक्रमा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रयाग की सांस्कृतिक विरासत और सनातन चेतना का जीवंत प्रतीक बन चुकी है। माघ मेला, पंचकोसी परिक्रमा और कल्पवास—तीनों मिलकर प्रयागराज को आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बनाते हैं।
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