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January 13, 2026

20 साल से अन्न का एक दाना नहीं, 5 साल से खड़े-खड़े तपस्या, माघ मेले में आए साधुओं की कहानी 

The CSR Journal Magazine
प्रयागराज के संगम तट पर आयोजित माघ मेला इस बार सिर्फ कल्पवास और स्नान तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां देखने को मिल रही हैं ऐसी अनोखी साधनाएं, जो लोगों को हैरान भी कर रही हैं और आकर्षित भी। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए साधु-संत और तपस्वी अपनी कठिन साधनाओं के जरिए आस्था, संयम और तप की मिसाल पेश कर रहे हैं। कोई वर्षों से खड़े होकर तप कर रहा है, कोई एक हाथ आसमान की ओर उठाए हुए है, तो कोई पिछले दो दशकों से अन्न का एक दाना भी नहीं खा रहा।

पांच साल से खड़े रहकर तपस्या कर रहे महेशानंद गिरि

माघ मेले में सबसे अधिक चर्चा में हैं संत महेशानंद गिरि महाराज, जो पिछले पांच वर्षों से लगातार खड़े रहकर हठयोग कर रहे हैं। उन्होंने 12 वर्षों तक खड़े रहकर तपस्या करने का संकल्प लिया है, जिसमें से अब तक पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं। महेशानंद गिरि बगलामुखी तपस्या कर रहे हैं और उनका कहना है कि यह कठिन साधना राष्ट्र कल्याण के उद्देश्य से की जा रही है। वे मानते हैं कि तप और त्याग के माध्यम से समाज और देश में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। माघ मेले की व्यवस्थाओं को लेकर भी उन्होंने संतोष जताया है।

एक हाथ उठाकर मोक्ष की साधना

मेले में लोगों का ध्यान खींच रहे हैं उर्दबाहु हठयोग करने वाले संत सोमेश्वर गिरि। वे कई वर्षों से अपना एक हाथ आसमान की ओर उठाए हुए हैं और उसे कभी नीचे नहीं करते। समय के साथ उनका हाथ बेहद पतला हो गया है और नाखून असामान्य रूप से बढ़ चुके हैं, फिर भी उनके संकल्प में कोई कमी नहीं आई। संत सोमेश्वर गिरि का कहना है कि उनकी यह साधना मोक्ष की प्राप्ति के लिए है। उनका विश्वास है कि यदि उन्हें मोक्ष मिलता है, तो इससे दूसरों को भी मुक्ति का मार्ग दिखेगा। वे पहले भी कुंभ मेले में आ चुके हैं और इस बार माघ मेले में फिर से चर्चा का विषय बने हुए हैं।

20 साल से अन्न त्यागने वाले गृहस्थ तपस्वी

माघ मेले में केवल साधु-संत ही नहीं, बल्कि एक गृहस्थ तपस्वी भी लोगों को हैरान कर रहा है। उत्तर प्रदेश के रायबरेली निवासी रंजीत सिंह पिछले करीब 20 वर्षों से अन्न का सेवन नहीं कर रहे हैं। भारतीय सेना से सेवानिवृत्त 60 वर्षीय पूर्व हवलदार रंजीत सिंह आज भी पूरी तरह स्वस्थ और सक्रिय हैं। वे खुद को कल्पवासी मानते हैं और सादगीपूर्ण जीवन जीते हैं।

सेना से संन्यास तक का सफर

रंजीत सिंह बताते हैं कि वे वर्ष 2005 में सेना से रिटायर हुए थे। इसके बाद उनका झुकाव आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ा। 10 जुलाई 2006 को उन्होंने अपने भोजन से अनाज पूरी तरह त्यागने का फैसला लिया। संतों के संपर्क में आने पर एक महात्मा ने उनसे कहा था कि फलाहार संतों का मार्ग है, जिसे गृहस्थ सामान्यतः नहीं अपनाते। उसी क्षण उन्होंने बजरंगबली का स्मरण कर अन्न त्याग का संकल्प लिया और तब से आज तक एक दाना भी नहीं खाया।

फलाहार और अनुशासन से स्वस्थ जीवन

रंजीत सिंह का कहना है कि सेना में मिला अनुशासन ही उन्हें सात्विक और सीमित भोजन की ओर ले गया। शुरुआत में यह उनके लिए एक प्रयोग था, लेकिन धीरे-धीरे यही उनकी जीवनशैली बन गई। वे दावा करते हैं कि उन्हें न कमजोरी महसूस होती है और न ही शुगर या ब्लड प्रेशर जैसी कोई बीमारी है। 60 वर्ष की उम्र में भी वे गृहस्थी और रोजमर्रा के कामकाज सहजता से संभाल रहे हैं।

कैसी है उनकी दिनचर्या?

माघ मेले में भी रंजीत सिंह की दिनचर्या बेहद अनुशासित रहती है। वे ब्रह्म मुहूर्त में उठकर संगम स्नान करते हैं, ध्यान और योग करते हैं। दिन में तय समय पर सेब, केला, पपीता और अमरूद जैसे मौसमी फल खाते हैं। साथ ही नारियल, मूंगफली, किशमिश और बादाम सीमित मात्रा में लेते हैं। उनका मानना है कि हल्का, सरल और सात्विक आहार पाचन को बेहतर बनाता है, लेकिन स्वस्थ जीवन के लिए सबसे जरूरी है नियमित और अनुशासित दिनचर्या।
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