भारतीय प्रवासी दिवस पर प्रवासी भारतीयों को सम्मान इसलिए दिया जाता है क्योंकि वे विदेशों में रहते हुए भी भारत की संस्कृति, पहचान और मूल्यों को दुनिया तक पहुंचाते हैं। वे अपने परिश्रम, प्रतिभा और उपलब्धियों से न सिर्फ अपने मेज़बान देशों का विकास करते हैं, बल्कि निवेश, रेमिटेंस और ज्ञान के माध्यम से भारत की प्रगति में भी योगदान देते हैं।
भारत की आत्मा, विश्व में फैले उसके संस्कार
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता है, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी हैं। इस सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसके नागरिक जहां भी गए, अपने साथ अपनी संस्कृति, भाषा, परंपरा, मूल्यों और श्रमशीलता को भी ले गए। यही कारण है कि आज विश्व के लगभग हर देश में भारतीय मूल के लोग पाए जाते हैं। इन्हीं भारतीय मूल के लोगों को सम्मान देने, उनके योगदान को पहचानने और उनसे भारत के रिश्ते को और मजबूत करने के लिए प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है।
प्रवासी भारतीय दिवस क्या है?
प्रवासी भारतीय दिवस हर वर्ष 9 जनवरी को मनाया जाता है। यह दिन इसलिए चुना गया क्योंकि 9 जनवरी 1915 को महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे। गांधी जी स्वयं एक प्रवासी भारतीय के रूप में विदेश में रह चुके थे और वहीं से उन्होंने सत्याग्रह, अहिंसा और मानवाधिकारों की लड़ाई शुरू की थी। यह दिवस पहली बार 2003 में भारत सरकार द्वारा मनाया गया। इसका उद्देश्य था-
• विदेशों में रह रहे भारतीयों को सम्मान देना,
• उनके योगदान को पहचान देना,
• भारत और प्रवासी भारतीयों के बीच भावनात्मक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध मजबूत करना!
प्रवासी भारतीय कौन होते हैं? प्रवासी भारतीय की परिभाषा
प्रवासी भारतीय वे लोग हैं-
• जिनका मूल भारत में है,
• जो भारत से बाहर किसी अन्य देश में रहते हैं,
• और किसी न किसी रूप में भारत से जुड़े हुए हैं, भावनात्मक, सांस्कृतिक, सामाजिक या आर्थिक रूप से।
NRI और PIO प्रवासी भारतीय
प्रवासी भारतीयों को मुख्यतः दो श्रेणियों में बांटा गया है-
अनिवासी भारतीय (NRI – Non Resident Indian)- जो भारतीय नागरिक हैं लेकिन शिक्षा, नौकरी, व्यापार या अन्य कारणों से विदेश में रह रहे हैं।
भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO – Person of Indian Origin)- जिनके पूर्वज भारतीय थे, लेकिन अब वे किसी अन्य देश की नागरिकता रखते हैं। जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फिजी, सूरीनाम, मॉरीशस आदि!
विश्व में कितने प्रवासी भारतीय हैं?
आज भारत दुनिया का वह देश है जिसके सबसे अधिक प्रवासी नागरिक विदेशों में रहते हैं। अनुमान के अनुसार 3.5 करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग 200 से अधिक देशों में फैले हुए हैं। यह संख्या भारत को वैश्विक स्तर पर एक विशेष पहचान देती है।
प्रवासी भारतीयों का ऐतिहासिक सफर– श्रमिक से नेतृत्व तक
ब्रिटिश शासन के दौरान लाखों भारतीयों को गन्ना खेतों, रेल निर्माण, खदानों और कारखानों में काम करने के लिए विदेश भेजा गया। वे अत्यंत कठिन परिस्थितियों में रहे, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और ईमानदारी से अपनी पहचान बनाई। इस सफ़र में इन्हें संघर्ष और सम्मान दोनों भरपूर मिले। फिजी, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में भारतीयों को नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा, लेकिन समय के साथ वे राजनीति, शिक्षा और प्रशासन में शीर्ष पदों तक पहुंचे। आज प्रवासी भारतीय केवल मजदूर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, उद्योगपति, राजनेता और IT विशेषज्ञ के रूप में विश्व भर में नेतृत्व कर रहे हैं।
विदेशों में भारतीय परचम लहराते चेहरे
कई प्रवासी भारतीयों ने विश्व स्तर पर बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। सुंदर पिचाई गूगल (Alphabet) के CEO हैं, जबकि सत्या नडेला माइक्रोसॉफ्ट के CEO बनकर वैश्विक टेक जगत में नेतृत्व कर रहे हैं। राजनीति में ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और कमला हैरिस अमेरिका की उपराष्ट्रपति बनीं। विज्ञान और चिकित्सा में भारतीय मूल के डॉक्टर और वैज्ञानिक विश्व-स्तरीय शोध संस्थानों का नेतृत्व कर रहे हैं। ये उदाहरण दिखाते हैं कि प्रवासी भारतीयों ने विदेशों में अपनी प्रतिभा से न केवल सफलता पाई, बल्कि भारत की पहचान को भी मजबूत किया।
आसमान में भारतीय इतिहास रचते प्रवासी भारतीय
भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला ने नासा के स्पेस मिशनों में भाग लेकर अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की पहचान बनाई। इसी तरह सुनीता विलियम्स ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर लंबे समय तक रहकर कई रिकॉर्ड बनाए। इसके अलावा राजा चारी (Raja Chari) भारतीय मूल के अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री हैं, जिन्होंने नासा के SpaceX Crew-3 मिशन की कमान संभाली और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक उड़ान भरी। सिरिशा बंदला भारतीय मूल की पहली महिला हैं, जो Virgin Galactic के सब-ऑर्बिटल स्पेस मिशन में अंतरिक्ष की सीमा तक पहुंचीं। ये सभी उदाहरण दिखाते हैं कि प्रवासी भारतीयों ने आसमान और अंतरिक्ष तक भारत की प्रतिभा का परचम लहराकर वैश्विक इतिहास में अपना स्थान बनाया है।
भारत प्रवासी भारतीयों का सम्मान क्यों करता है?
भारत प्रवासी दिवस पर विदेशों में बसे भारतीयों का सम्मान इसलिए करता है क्योंकि प्रवासी भारतीयों ने दुनिया भर में भारत की संस्कृति, प्रतिभा और मेहनत का मान बढ़ाया है। वे अपने-अपने देशों में शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, व्यापार, राजनीति और कला जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देकर भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करते हैं। इसके साथ ही प्रवासी भारतीय निवेश, रेमिटेंस, ज्ञान और वैश्विक नेटवर्क के माध्यम से भारत की अर्थव्यवस्था और विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। यह दिवस उन्हें भारत से भावनात्मक रूप से जोड़ने, उनकी उपलब्धियों को मान्यता देने और राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी को सम्मान देने का प्रतीक है।
आर्थिक योगदान– प्रवासी भारतीय हर वर्ष भारत में अरबों डॉलर की रेमिटेंस (विदेशी धन) भेजते हैं। यह धन भारत की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण विकास और परिवारों की आय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत विश्व में सबसे अधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश है।
भारत की वैश्विक छवि निर्माण– जहां भी प्रवासी भारतीय रहते हैं, वे भारत की संस्कृति के अनौपचारिक राजदूत बन जाते हैं। योग, आयुर्वेद, भारतीय भोजन, त्योहारों और परंपराओं को विश्व तक पहुंचाते हैं
विज्ञान, तकनीक और ज्ञान का आदान-प्रदान– सिलिकॉन वैली में भारतीय वैज्ञानिक अंतरिक्ष एजेंसियों में भारतीय मूल के विशेषज्ञ, वैश्विक कंपनियों के सीईओ, भारत के लिए ज्ञान सेतु का काम करते हैं।
कूटनीतिक और रणनीतिक लाभ– प्रवासी भारतीय भारत के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठाते हैं। नीतिगत समर्थन और जनमत निर्माण में मदद करते हैं
संकट के समय भारत के साथ खड़ा होना- चाहे प्राकृतिक आपदा, महामारी, आर्थिक संकट, कोई भी मुसीबत हो, प्रवासी भारतीयों ने हमेशा भारत की मदद की है, दान, संसाधन और विशेषज्ञता के रूप में।
प्रवासी भारतीय दिवस का महत्व
1. सम्मान और पहचान– यह दिवस प्रवासी भारतीयों को यह संदेश देता है कि, “आप भले ही दूर हों, लेकिन भारत आपके योगदान को नहीं भूलता।”
2. नीति निर्माण में सहभागिता– इस मंच पर प्रवासी भारतीय अपनी समस्याएं और सुझाव रखते हैं। सरकार उनसे सीधे संवाद करती है।
3. सांस्कृतिक एकता– यह आयोजन भारत की विविधता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय एकता को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करता है।
नई पीढ़ी और प्रवासी भारतीय
आज की युवा पीढ़ी विदेशों में जन्मी हुई हो सकती है, लेकिन भारत से जुड़ाव बनाए रखना चाहती है। प्रवासी भारतीय दिवस उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ता है, भारतीय पहचान को सशक्त करता है।
डिजिटल भारत और प्रवासी भारतीय
डिजिटल युग में ऑनलाइन निवेश, स्टार्टअप सहयोग, शिक्षा और नवाचार के माध्यम से प्रवासी भारतीय भारत के विकास में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
चुनौतियां भी कम नहीं हैं
प्रवासी भारतीयों के सामने दोहरी पहचान, नागरिकता से जुड़े मुद्दे और सांस्कृतिक दूरी जैसी जटिल समस्याएं होती हैं। एक ओर वे अपने मूल देश भारत की भाषा, परंपरा और संस्कारों से जुड़े रहना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर मेज़बान देश की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में खुद को ढालने का दबाव रहता है। कई देशों में नागरिकता, वीज़ा, कार्य-अधिकार और सामाजिक स्वीकार्यता को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, जिससे सुरक्षा और स्थायित्व की भावना प्रभावित होती है। समय के साथ नई पीढ़ी में भाषा और सांस्कृतिक जुड़ाव कमजोर पड़ने लगता है, जिससे पहचान का संकट गहराता है और प्रवासी समुदाय अपनेपन और स्वीकार्यता के बीच संतुलन खोजने के लिए संघर्ष करता है। लेकिन संवाद और नीति सुधार से इन चुनौतियों का समाधान संभव है।
Racism के बाद भी अपने कर्मों पर अडिग प्रवासी भारतीय
प्रवासी भारतीयों को कई देशों में अलग-अलग रूपों में नस्लभेद (Racism) का सामना करना पड़ता है। उन्हें उनकी त्वचा के रंग, उच्चारण, पहनावे या खान-पान के आधार पर भेदभाव झेलना पड़ता है। कार्यस्थलों पर वेतन में असमानता, पदोन्नति में अनदेखी और पेशेवर योग्यता पर संदेह किया जाता है। सार्वजनिक स्थानों पर नस्लीय टिप्पणियां, अपमानजनक व्यवहार और कभी-कभी हिंसा तक की घटनाएं देखने को मिलती हैं। स्कूलों और कॉलेजों में प्रवासी भारतीय बच्चों को ताने, बुलींग और अलगाव का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
भारत देता है मुश्किल में संबल-सहारा
ऐसे समय में भारत अपने प्रवासी नागरिकों के साथ खड़ा रहता है। भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास नस्लभेद, हिंसा या भेदभाव की घटनाओं में कानूनी सहायता, परामर्श और सुरक्षा मुहैया कराते हैं। सरकार प्रवासी भारतीय संगठनों के माध्यम से उनकी समस्याएं सुनती है और ज़रूरत पड़ने पर मेज़बान देशों से कूटनीतिक स्तर पर हस्तक्षेप भी करती है। यह सहयोग प्रवासी भारतीयों को यह भरोसा दिलाता है कि वे भले ही विदेश में हों, भारत उनके साथ है।
दूर रहकर भी सबसे पास
प्रवासी भारतीय दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत और विश्व में बसे भारतीयों के बीच भावनात्मक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सेतु है। प्रवासी भारतीय भारत की वह शक्ति हैं जो सीमाओं से परे जाकर भारत की प्रतिष्ठा को ऊंचा उठाती है। भारत उन्हें सम्मान देता है क्योंकि वे जहां भी जाते हैं, भारत को अपने कर्म, संस्कार और योगदान से जीवित रखते हैं। प्रवासी भारतीय दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक भारतीय चेतना का प्रतीक है, जो सीमाओं से परे जाकर भी भारत की आत्मा से जुड़ी रहती है। दुनिया के कोने-कोने में बसे करोड़ों भारतीय मूल के लोग आज जिस तरह भारत की पहचान, प्रतिष्ठा और प्रगति के वाहक बने हैं, वह देश के लिए गर्व का विषय है। ऐसे में प्रवासी भारतीयों को सम्मान देना केवल कृतज्ञता नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आवश्यकता भी है।
प्रवासी भारतीय बने दूसरे देशों में श्रम की मिसाल
इतिहास गवाह है कि भारतीय जहां भी गए, उन्होंने केवल रोज़गार ही नहीं खोजा, बल्कि अपने श्रम, ईमानदारी और संस्कारों से उस समाज में अपनी जगह बनाई। कभी गिरमिटिया मजदूर बनकर विदेशी धरती पर पहुंचे भारतीय आज उन्हीं देशों में शासन, विज्ञान, चिकित्सा, तकनीक और उद्योग के शीर्ष पदों पर हैं। यह परिवर्तन केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक क्षमता का प्रमाण है। आज प्रवासी भारतीय भारत के लिए आर्थिक शक्ति का एक मजबूत स्तंभ हैं। हर वर्ष भेजी जाने वाली रेमिटेंस न केवल लाखों परिवारों का सहारा बनती है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देती है। इसके साथ ही प्रवासी भारतीय भारत के लिए ज्ञान, तकनीक और वैश्विक अनुभव का सेतु भी हैं। स्टार्टअप संस्कृति, डिजिटल इंडिया, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में उनकी भागीदारी भारत के विकास को नई दिशा दे रही है।
भारत की परंपरा और संस्कृति के दूत
लेकिन प्रवासी भारतीयों का योगदान केवल धन या ज्ञान तक सीमित नहीं है। वे भारत की संस्कृति के जीवित दूत हैं। योग, आयुर्वेद, भारतीय भोजन, भाषा और त्योहारों को उन्होंने वैश्विक पहचान दिलाई है। विदेशों में जब भारतीय संस्कृति सम्मान पाती है, तो वह पूरे देश का सम्मान होता है। इसी कारण प्रवासी भारतीय भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का सबसे सशक्त माध्यम बन चुके हैं। प्रवासी भारतीय दिवस का महत्व इसी संदर्भ में और बढ़ जाता है। यह दिवस सरकार और प्रवासी समुदाय के बीच संवाद का मंच प्रदान करता है। यह याद दिलाता है कि विकास की यात्रा में देश अपने उन नागरिकों को नहीं भूल सकता, जो भौगोलिक रूप से भले ही दूर हों, लेकिन भावनात्मक रूप से आज भी भारत के सबसे निकट हैं।
सीमाओं से परे, भारतीय संस्कृति की जड़ें
हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। नई पीढ़ी में सांस्कृतिक जुड़ाव बनाए रखना, नीतिगत अड़चनों को दूर करना और प्रवासी भारतीयों की अपेक्षाओं को समझना समय की मांग है। इसके लिए निरंतर संवाद, संवेदनशील नीति और विश्वास की जरूरत है।
अंततः, प्रवासी भारतीय दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि भारत की शक्ति उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं है। भारत वहां भी है, जहां कोई भारतीय अपने कर्म से देश का नाम रोशन कर रहा है। प्रवासी भारतीयों का सम्मान दरअसल भारत के वैश्विक भविष्य में विश्वास का प्रतीक है- एक ऐसा भविष्य, जिसमें भारत विश्व से जुड़कर भी अपनी पहचान बनाए रखता है!
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