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आओ सीएसआर से निकाले पॉल्युशन का सलूशन

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2 दिसंबर यानि आज राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस है और जिस तरह से पिछले एक महीने में दिल्ली, यूपी सहित देश के अन्य राज्यों में प्रदूषण का स्तर रहा है वो हमारे लिए चिंता का विषय है । देश के सामने पॉल्युशन एक समस्या बन रहा है जिसका सलूशन अगर देश की सरकारों के साथ साथ आम नागरिक भी निकाले तो हमारी आने वाली पीढ़ी स्वच्छ हवा में सांस जरूर ले पाएगी। इस कड़ी में सीएसआर भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कॉरपोरेट कंपनियां सीएसआर के तहत जन सामान्य को साथ लेकर अगर पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर काम करें और जागरूकता लाये तो प्रदूषण के रोकथाम मामले में हम कहीं आगे निकल जाएंगे।

राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस मनाने के पीछे उद्देश्य औद्योगिक आपदा के प्रबंधन और नियंत्रण के प्रति लोगों के बीच जागरूकता फैलाना, साथ ही हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित होने से बचाना और उनमें होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिए अलग-अलग तरह से समाज में जागरूकता फैलाना है। लेकिन क्या आप जानते हैं इस दिन का कनेक्शन भोपाल गैस त्रासदी से भी जुड़ा हुआ है। दरअसल, देश में हर साल 2 दिसंबर को नेशनल पलूशन कंट्रोल डे उन लोगों की याद में मनाया जाता है, जो 2-3 दिसंबर, 1984 भोपाल गैस त्रासदी के शिकार हो गए थे। इस दिन मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव की वजह से तकरीबन 3787 लोग मारे गए थे। इतना ही नहीं, लाखों लोग बुरी तरह से प्रभावित भी हुए थे। आज भी वहां के लोगों पर इस हादसे का असर साफ देखा जा सकता है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को प्रदूषण नियंत्रण के प्रति जागरूक करना है।

पर्यावरण और प्रदूषण की चिंता और भी अधिक हो जाती है जब विश्व के सर्वाधिक 20 प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं। प्रदूषण का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिससे सीएसआर और कॉरपोरेट की मदद से कम किया जा सकता है। कहते है कि प्रीवेंशन इज बेटर दैन क्योर, प्रदूषण को कम कर दीजिए, खत्म कर दीजिए, अपने आप ये दिक्कत खत्म हो जाएगी, अब सवाल उठता है कि प्रदूषण का रोकथाम संभव कैसे होगा। पहले तो खुद से शुरुआत करनी पड़ेगी, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना पड़ेगा, पेड़ लगाना पड़ेगा, गो ग्रीन के कांसेप्ट पर आगे बढ़ना होगा।

कॉरपोरेट कंपनियों को भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी, प्रदूषण के रोकथाम के लिए नागरिकों को प्रोत्साहित करना पड़ेगा, जागरूकता अभियान भी बड़े पैमाने पर चलाने की जरूरत है, फैक्ट्रियों से निकलने वाले वेस्ट को ट्रीट करके ही उसे नदियों में बहाया जाना चाहिए, कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए कॉरपोरेट कंपनियों को ग्रीन ट्रांसपोर्टेशन पर भी विकल्प देखना चाहिए, सीएसआर के करोड़ों रुपये के फंड इसी तरह से पड़े रह जाते है लेकिन इस्तेमाल नही हो पाता, कंपनियों को योजनाबद्ध तरीके से पर्यावरण पर काम करने की जरूरत है।