app-store-logo
play-store-logo
February 25, 2026

एमपी भोजशाला में मिले 800 साल पुरानी सांस्कृतिक धरोहर के सबूत, सर्वे पर मुस्लिम समाज ने उठाई आपत्ति

The CSR Journal Magazine

हाईकोर्ट में सुनवाई: 16 मार्च अगला माईलस्टोन

मध्य प्रदेश की धार स्थित भोजशाला मामले में सोमवार को हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में सुनवाई हुई। कोर्ट ने सभी याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादियों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट पर दो हफ्ते के भीतर अपनी आपत्तियां और सुझाव देने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई 16 मार्च को होगी, जहां दाखिल जवाबों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। ASI ने हाईकोर्ट के आदेश पर 22 मार्च 2024 से करीब 100 दिन तक परिसर और उससे 50 मीटर की परिधि में जांच, सर्वे और सीमित उत्खनन किया। टीम में पुरातत्त्वविद्, अभिलेखविद्, रसायनविद् और अन्य विशेषज्ञ शामिल थे। रिपोर्ट में शिक्षण केंद्र की संभावना जताने वाले कई महत्वपूर्ण शिलालेख मिले हैं।

खजाने की तरह शिलालेख: 12वीं से 20वीं सदी तक का सफर

रिपोर्ट में 12वीं से 20वीं सदी तक के शिलालेखों के प्रमाण मिले हैं। इनमें संस्कृत-प्राकृत के साथ नागरी लिपि के लेख और अरबी-फारसी में लिखे हुए शिलालेख शामिल हैं। कुछ शिलालेख धार्मिक गतिविधियों का संकेत देते हैं तो कुछ शिक्षण केंद्र होने की संभावना जताते हैं। भोजशाला परिसर में 56 अरबी-फारसी शिलालेख मिले, जिनमें दुआएं, नाम और धार्मिक वाक्य हैं। यह संकेत करता है कि इस स्थल का उपयोग विभिन्न काल में धार्मिक और शैक्षिक गतिविधियों के लिए किया जाता था।

ऐतिहासिक धरोहर का महत्व: पारिजातमंजरी नाटिका का जिक्र

शिलालेखों में पारिजातमंजरी नाटिका, अवनिकर्मसातम और नागबंध जैसे लेख मिले हैं। इनका जिक्र एएसआई की पुस्तकों में भी किया गया है। पारिजातमंजरी नाटिका धार के परमार वंश के राजा अर्जुनवर्मन के गुरु मदन द्वारा लिखी गई थी। इस नाटक का पहला मंचन देवी सरस्वती के मंदिर में हुआ था। यह साहित्यिक संस्कृति और शैक्षिक महत्व को दर्शाता है।

स्थल पर प्राकृत भाषा के काव्य: शिक्षण का केंद्र

एक शिलालेख में प्राकृत भाषा के दो काव्य मिले हैं। पहले काव्य का नाम अवनिकर्मसातम है, जिसे महाराजाधिराज भोजदेव ने रचा बताया जाता है। ये शिलालेख पढ़ाई और व्याकरण के नजरिए से महत्वपूर्ण हैं, जिससे ये बात स्पष्ट होती है कि यह स्थान कभी शिक्षण केंद्र रहा होगा।

आधुनिक दौर में संरक्षण की आवश्यकता

रिपोर्ट बताती है कि ब्रिटिश काल में 1902-03 में सबसे पहले इसके संरक्षण की योजना बनी थी। 1951 में इसे ‘राष्ट्रीय महत्व का स्मारक’ घोषित किया गया। इसके बावजूद, वर्षों से इसके संरक्षण में कई बाधाएं आई हैं, जिन्हें अब दूर करने की आवश्यकता है।

बातचीत की ताजा स्थिति: दोनों पक्षों के मत

भोज उत्सव समिति के संयोजक गोपाल शर्मा ने रिपोर्ट के आधार पर कहा कि भोजशाला सनातन आस्था का प्रमुख केंद्र रही है। वहीं, मुस्लिम समाज के सदर अब्दुल समद ने कहा कि वे पहले से ही सर्वे पर आपत्ति उठा रहे हैं। अब वे कोर्ट में अपनी आपत्तियां दर्ज कराएंगे। अब तक के घटनाक्रम ने इस क्षेत्र में सांस्कृतिक विविधता और संरक्षण की पुष्टि की है।

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540 

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos