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January 20, 2026

मुंबई में बनेगा भव्य ‘बिहार भवन’- 314.20 करोड़ की मंज़ूरी, मनसे ने जताया विरोध ! 

The CSR Journal Magazine

 

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में प्रस्तावित ‘बिहार भवन’ अब केवल एक निर्माण परियोजना नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीतिक टकराव और क्षेत्रीय अस्मिता की बहस का केंद्र बन गई है। बिहार सरकार द्वारा इस परियोजना के लिए 314 करोड़ 20 लाख रुपये की मंजूरी दिए जाने के बाद जहां बिहार के प्रवासी नागरिकों में उम्मीद जगी है, वहीं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के विरोध ने इसे विवादों में ला खड़ा किया है।

314.20 करोड़ की परियोजना, मुंबई में 30 मंजिला बिहार भवन परियोजना को मंज़ूरी

बिहार सरकार ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में एक विशाल और आधुनिक ‘बिहार भवन’ के निर्माण को हरी झंडी दे दी है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए राज्य मंत्रिमंडल द्वारा 314 करोड़ 20 लाख रुपये की प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी प्रदान की गई है। सरकार का कहना है कि यह भवन मुंबई में रहने या काम करने वाले बिहारवासियों के साथ-साथ इलाज, रोजगार और सरकारी कार्यों से आने वाले लोगों के लिए एक मजबूत सहारा बनेगा। यह भवन बिहार की पहचान और प्रशासनिक सुविधा का केंद्र होगा।

एलिफिंस्टन एस्टेट में बनेगा बिहार भवन, 30 मंजिल की होगी इमारत

प्रस्तावित बिहार भवन मुंबई के बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट (MbPT) की जमीन पर स्थित एलिफिंस्टन एस्टेट क्षेत्र में बनाया जाएगा। यह इलाका दक्षिण मुंबई का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और व्यावसायिक क्षेत्र माना जाता है। भवन को करीब 69 मीटर ऊंचा बनाया जाएगा, जिसमें कुल 30 मंजिलें होंगी। इस अत्याधुनिक इमारत का निर्माण भूकंपरोधी तकनीक और आधुनिक शहरी मानकों के अनुसार किया जाएगा, ताकि यह लंबे समय तक सुरक्षित और उपयोगी बनी रहे।

178 कमरों की सुविधा, अधिकारियों और आम लोगों दोनों के लिए व्यवस्था

बिहार भवन में कुल 178 आधुनिक कमरे प्रस्तावित हैं। इनमें से कुछ कमरे सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के लिए आरक्षित होंगे, जबकि शेष कमरे आम नागरिकों के लिए उपलब्ध कराए जाएंगे। भवन में सम्मेलन कक्ष, मीटिंग हॉल, कार्यालय, प्रतीक्षालय और आवश्यक प्रशासनिक सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी, जिससे मुंबई में बिहार सरकार के कार्य सुचारु रूप से संचालित किए जा सकें।

इलाज के लिए आने वाले मरीजों के लिए बड़ी राहत

इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बिहार से इलाज के लिए मुंबई आने वाले मरीजों और उनके परिजनों के लिए विशेष ठहराव व्यवस्था की जा रही है। भवन में करीब 240 बेड की डॉर्मिट्री (छात्रावास/सामूहिक आवास) विकसित की जाएगी, जहां मरीजों के परिजन कम खर्च में सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से ठहर सकेंगे। मुंबई के निजी अस्पतालों में इलाज पहले से ही बेहद महंगा है और ठहरने की व्यवस्था मरीजों के लिए बड़ी समस्या बन जाती है। बिहार भवन इस परेशानी को काफी हद तक कम करेगा।

बिहार सरकार का तर्क- बाहर रहकर भी मिले ‘घर जैसा सहारा’

बिहार सरकार का कहना है कि देश के कई बड़े राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और गुजरात के भवन पहले से ही दिल्ली और अन्य महानगरों में मौजूद हैं। ऐसे में मुंबई जैसे शहर में बिहार भवन का निर्माण कोई असामान्य कदम नहीं है। सरकार का दावा है कि यह भवन प्रवासी बिहारियों के लिए एक ‘सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्र’ के रूप में कार्य करेगा और राज्य की प्रतिष्ठा को भी बढ़ाएगा।

मनसे का विरोध, ‘मुंबई की जमीन पर बिहार भवन क्यों?’

हालांकि इस परियोजना के सामने राजनीतिक विरोध भी खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने मुंबई में बिहार भवन बनाए जाने का कड़ा विरोध किया है। मनसे नेताओं का कहना है कि मुंबई पहले ही अत्यधिक भीड़, आवास संकट और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही है। ऐसे में किसी दूसरे राज्य का भवन बनाना स्थानीय लोगों के हितों के खिलाफ है। मनसे नेता यशवंत किलेदार ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बिहार सरकार को मुंबई में करोड़ों रुपये खर्च करने के बजाय बिहार में ही विश्वस्तरीय अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित करनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि बिहार में बेहतर इलाज उपलब्ध होगा, तो लोगों को इलाज के लिए मुंबई आने की मजबूरी ही नहीं रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि मनसे इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेगी और जरूरत पड़ने पर आंदोलन का रास्ता भी अपनाएगी।

 

मनसे का बिहारी विरोध: मुंबई की राजनीति में बार-बार क्यों लौटता है यह मुद्दा?

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) द्वारा समय-समय पर किया जाने वाला बिहारी विरोध कोई नया राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। इसकी जड़ें मुंबई और महाराष्ट्र की क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति में गहराई से जुड़ी हुई हैं। वर्ष 2006 में मनसे की स्थापना के बाद से ही पार्टी का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा रहा है- “मराठी मानुष को प्राथमिकता”। इसी विचारधारा के तहत उत्तर भारत, विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश से आने वाले प्रवासियों को लेकर मनसे अक्सर आक्रामक रुख अपनाती रही है।

रोज़गार और संसाधनों को लेकर उपजा असंतोष

मनसे का मुख्य तर्क यह रहा है कि मुंबई में बढ़ती प्रवासी आबादी के कारण स्थानीय मराठी युवाओं के रोजगार के अवसर घट रहे हैं। पार्टी का दावा है कि रेलवे, टैक्सी, निर्माण क्षेत्र, छोटे व्यापार और निजी नौकरियों में बड़ी संख्या में बिहार और यूपी से आए लोग काम कर रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों में असंतोष पैदा होता है। इसी सामाजिक-आर्थिक असंतुलन को मनसे बार-बार राजनीतिक मुद्दा बनाती रही है।

रेलवे भर्ती और परीक्षा विवादों से भड़का विरोध

मनसे का बिहारी विरोध खासतौर पर रेलवे भर्तियों के दौरान उग्र रूप लेता रहा है। अतीत में कई बार मुंबई में रेलवे परीक्षाओं के दौरान उत्तर भारतीय अभ्यर्थियों के खिलाफ हिंसा और विरोध प्रदर्शन सामने आए। मनसे नेताओं का आरोप रहा है कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण महाराष्ट्र के युवाओं के साथ अन्याय हो रहा है। हालांकि इन घटनाओं की देशभर में आलोचना भी हुई और इसे क्षेत्रीय भेदभाव के रूप में देखा गया।

भाषा और सांस्कृतिक पहचान का सवाल

मनसे की राजनीति का एक बड़ा आधार मराठी भाषा है। पार्टी लगातार मांग करती रही है कि महाराष्ट्र में रहने और काम करने वालों को मराठी सीखनी चाहिए। बिहारी प्रवासियों पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे स्थानीय भाषा और संस्कृति को अपनाने में रुचि नहीं दिखाते। इसी आधार पर मनसे इसे सांस्कृतिक असंतुलन का मुद्दा बनाती है और राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश करती है।

बिहार भवन विवाद से फिर उभरा विरोध

हाल ही में मुंबई में 314.20 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले ‘बिहार भवन’ के ऐलान के बाद मनसे का पुराना विरोध एक बार फिर सामने आ गया। मनसे नेताओं का कहना है कि मुंबई पहले से ही भीड़, आवास संकट और बुनियादी ढांचे के दबाव से जूझ रही है। ऐसे में किसी अन्य राज्य का भव्य भवन बनाना स्थानीय नागरिकों के साथ अन्याय है। इस विरोध को मनसे ने सीधे तौर पर बिहार सरकार और बिहारी प्रवासियों से जोड़ दिया।

राजनीतिक रणनीति या जनभावनाओं का प्रतिबिंब?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मनसे का बिहारी विरोध अक्सर चुनावी मौसम या संगठन को सक्रिय रखने के उद्देश्य से तेज किया जाता है। जब भी पार्टी को राजनीतिक प्रासंगिकता की आवश्यकता महसूस होती है, तब क्षेत्रीय अस्मिता और बाहरी-भीतरी का मुद्दा फिर से उछाला जाता है। हालांकि, इससे सामाजिक तनाव भी बढ़ता है और मुंबई की बहुसांस्कृतिक पहचान पर सवाल खड़े होते हैं।

बिहारी समाज की प्रतिक्रिया

मुंबई में रहने वाला बड़ा बिहारी समाज इस तरह के विरोध को भेदभावपूर्ण और विभाजनकारी मानता है। समाज के लोगों का कहना है कि वे वर्षों से मुंबई की अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं। निर्माण, परिवहन, सेवा क्षेत्र और उद्योगों में उनकी अहम भूमिका है। ऐसे में उन्हें बार-बार निशाना बनाना न सिर्फ अन्यायपूर्ण है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी खतरनाक है। मनसे का बिहारी विरोध केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि यह मुंबई की बदलती सामाजिक संरचना, रोजगार संकट और क्षेत्रीय राजनीति का प्रतीक बन चुका है। बिहार भवन विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि विकास, प्रवास और पहचान के सवाल पर देश के महानगरों में संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। सवाल यह है कि क्या राजनीति समाधान की ओर बढ़ेगी, या फिर यह मुद्दा भविष्य में भी इसी तरह टकराव का कारण बना रहेगा?
राजनीतिक टकराव बढ़ने के संकेत
इस परियोजना को लेकर महाराष्ट्र और बिहार की राजनीति में टकराव के संकेत दिखाई देने लगे हैं। जहां एक ओर बिहार सरकार इसे जनहित और प्रवासी नागरिकों की जरूरत से जोड़कर देख रही है, वहीं दूसरी ओर मनसे इसे ‘बाहरी राज्यों को बढ़ावा देने वाली नीति’ बता रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
मुंबई में प्रस्तावित बिहार भवन जहां एक ओर लाखों बिहारवासियों के लिए राहत और सुविधा का केंद्र बन सकता है, वहीं दूसरी ओर यह परियोजना क्षेत्रीय राजनीति और स्थानीय असंतोष का कारण भी बनती नजर आ रही है। अब यह देखना अहम होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें इस विरोध को किस तरह संभालती हैं और यह महत्वाकांक्षी परियोजना जमीन पर कब और कैसे उतरती है।

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