श्रवण सिंह को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार (Pradhan Mantri Rashtriya Bal Puraskar) 26 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा नई दिल्ली के विज्ञान भवन में एक समारोह के दौरान प्रदान किया गया। यह सम्मान वीर बाल दिवस के अवसर पर दिया गया, जब 20 बहादुर और असाधारण बच्चों को उनके साहस, सेवा और समर्पण के लिए राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया।
भारत का नन्हा वीर सिपाही श्रवण सिंह
देश की सेवा उम्र नहीं देखती, इस कथन को सच कर दिखाया है नन्हे वीर श्रवण सिंह ने। राष्ट्रपति द्वारा बाल पुरस्कार से सम्मानित किए गए श्रवण सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जो साहस और समर्पण दिखाया, वह पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गया है। सीमावर्ती और कठिन हालातों में भी वह बिना डरे रोज़ जवानों तक दूध, चाय, छाछ और बर्फ़ पहुंचाता रहा। गोलाबारी, ठंड और जोखिम के बीच उसका एक ही संकल्प था, मोर्चे पर डटे सैनिकों का हौसला बनाए रखना।
कठिन हालात, मजबूत इरादा
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इलाके में सुरक्षा चुनौतियां चरम पर थीं। तापमान गिरा हुआ था, रास्ते दुर्गम थे और हर पल खतरे की आशंका बनी रहती थी। ऐसे में श्रवण सिंह ने अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी। वह रोज़ तय समय पर रसद लेकर निकलता! कभी कच्चे रास्तों से, कभी बर्फ़ीली हवाओं के बीच, और जवानों तक जरूरी सामान पहुंचाता। सैनिकों के अनुसार, श्रवण का मुस्कुराता चेहरा और उसका निडर व्यवहार कई बार थकान और तनाव को पल भर में कम कर देता था।
नन्हे वीर श्रवण सिंह की वीरता की गाथा-साहस, सेवा और संकल्प की कहानी
कम उम्र में जब बच्चे अपने सपनों और खेल-कूद की दुनिया में रहते हैं, उसी उम्र में श्रवण सिंह ने देशसेवा को अपना कर्तव्य बना लिया। उनकी वीरता की गाथा सिर्फ़ साहस की कहानी नहीं है, बल्कि यह संवेदना, मानवता और निस्वार्थ सेवा का जीवंत उदाहरण भी है। जब देश की सुरक्षा के लिए ऑपरेशन सिंदूर चलाया जा रहा था, तब हालात बेहद कठिन थे। सीमावर्ती इलाकों में कड़ाके की ठंड, दुर्गम रास्ते और हर समय खतरे की आशंका बनी रहती थी। ऐसे वातावरण में भी श्रवण सिंह ने पीछे हटने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता चुना। श्रवण रोज़ाना जवानों तक दूध, चाय, छाछ और बर्फ़ पहुंचाता था। यह सामान सिर्फ़ जरूरत भर नहीं था, बल्कि मोर्चे पर डटे सैनिकों के लिए ऊर्जा, राहत और भावनात्मक सहारा भी था। कई बार उसे लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती, तो कभी बर्फ़ीली हवाओं और जोखिम भरे रास्तों से गुजरना पड़ता, लेकिन उसके कदम कभी डगमगाए नहीं।
निडरता जो उम्र से बड़ी थी
श्रवण की सबसे बड़ी पहचान उसकी निडरता थी। जहां बड़े भी जाने से हिचकिचाते, वहां वह मुस्कान के साथ पहुंच जाता। जवान बताते हैं कि खतरे के बीच जब श्रवण उन्हें गरम चाय या ठंडी छाछ देता, तो लगता मानो घर से कोई अपना आया हो। उसका साहस सैनिकों का मनोबल कई गुना बढ़ा देता। श्रवण ने कभी अपनी सेवा को प्रसिद्धि या पुरस्कार से नहीं जोड़ा। उसके लिए जवानों की थकान कम करना और उनका हौसला बनाए रखना ही सबसे बड़ा पुरस्कार था। उसकी सोच साफ़ थी- “अगर मैं थोड़ा-सा भी कर सकता हूं तो देश के लिए क्यों न करूं!”
ग्रामीण परिवेश से निकली असाधारण कहानी
श्रवण सिंह का संबंध एक साधारण ग्रामीण परिवार से है। उनका गांव सीमावर्ती/ग्रामीण इलाके की उस जीवन-शैली को दर्शाता है, जहां संसाधन सीमित होते हैं, लेकिन संस्कार, मेहनत और देशप्रेम भरपूर मिलता है। गांव का माहौल सामूहिकता, परस्पर सहयोग और अनुशासन से भरा है। यही कारण है कि छोटी उम्र में ही श्रवण के भीतर जिम्मेदारी का भाव मजबूत हुआ।
परिवार: संस्कार और साहस की पाठशाला
श्रवण का परिवार मेहनतकश है और अपने बच्चों को बचपन से सेवा, संवेदना और राष्ट्रप्रेम के मूल्य सिखाता आया है। माता-पिता ने उसे कभी जोखिम की ओर नहीं उकसाया, बल्कि सही और सुरक्षित तरीके से मदद करने की सीख दी। परिवार का विश्वास था कि देश के जवानों के लिए किया गया छोटा-सा योगदान भी बड़ा अर्थ रखता है। श्रवण की सेवा में गांव का नैतिक समर्थन भी शामिल रहा। पड़ोसियों और ग्रामीणों ने उसके हौसले की सराहना की और जरूरत पड़ने पर मार्गदर्शन व सहयोग दिया। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि श्रवण ने पूरे गांव का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।
प्रेरणा बनता एक नाम-श्रवण सिंह
श्रवण सिंह आज महज़ एक नाम नहीं, बल्कि लाखों- करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा बन चुका है। श्रवण की गाथा बताती है कि देशसेवा के लिए उम्र नहीं, जज़्बा चाहिए! नन्हे कंधों पर देशसेवा का जो बोझ उसने उठाया, वह आनेवाली पीढ़ियों को साहस, कर्तव्य और देशप्रेम की प्रेरणा देता रहेगा! श्रवण सिंह की बहादुरी सिर्फ़ व्यक्तिगत साहस नहीं, बल्कि परिवार के संस्कार और गांव की संस्कृति का प्रतिबिंब है। एक छोटे से गांव से निकली यह कहानी बताती है कि बड़े काम करने के लिए बड़े संसाधन नहीं, बड़ा दिल चाहिए।
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