लद्दाख और ऊंची हिमालयी चोटियों की बर्फीली वादियों में, जहां तापमान अक्सर शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है और तेज़, शुष्क हवाएं लगातार बहती रहती हैं, वहां एक अद्भुत चमकीली नारंगी बेरी उगती है। स्थानीय लोग इसे प्यार से ‘लेह बेरी’ कहते हैं। वैज्ञानिक दुनिया में इसे Hippophae Rhamnoides के नाम से जाना जाता है, जबकि आम बोलचाल में यह सी-बकथॉर्न (Sea Buckthorn) कहलाती है। यह छोटा-सा फल न केवल कठोर जलवायु में जीवित रहने की क्षमता रखता है, बल्कि अपने पोषण और औषधीय गुणों के कारण आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना चुका है।
लद्दाख की धरती का अनमोल खजाना
लद्दाख, जिसे अक्सर “ठंडा रेगिस्तान” कहा जाता है, भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक उच्च हिमालयी क्षेत्र है। यहां वर्षा बहुत कम होती है, मिट्टी शुष्क होती है और तापमान सर्दियों में -30 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। ऐसे प्रतिकूल वातावरण में जहां सामान्य फसलें उगाना कठिन होता है, वहां सी-बकथॉर्न का पौधा मजबूती से खड़ा रहता है। यह पौधा 2 से 4 मीटर तक ऊंचा हो सकता है और इसकी शाखाएं काटेदार होती हैं। पतली, चांदी सी चमक वाली पत्तियों के बीच छोटे-छोटे नारंगी फल गुच्छों में उगते हैं। जब ये फल पकते हैं तो दूर से ही उनकी चमक दिखाई देती है, मानो बर्फीली वादियों में सूरज की किरणें खिल उठी हों।
नाम और पहचान
• स्थानीय नाम: लेह बेरी,
• हिंदी नाम: सी-बकथॉर्न / लद्दाखी बेर,
• वैज्ञानिक नाम: Hippophae rhamnoides,
• अंग्रेज़ी नाम: Sea Buckthorn!
हालांकि ‘सी’ शब्द से लगता है कि यह समुद्र तट पर उगता होगा, पर वास्तव में यह पौधा समुद्री तटों के साथ-साथ ठंडे पहाड़ी क्षेत्रों में भी उगता है। भारत में इसकी प्रमुख खेती लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में होती है।
कठिन परिस्थितियों में जीवन
सी-बकथॉर्न की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहनशीलता है। यह -40°C से लेकर +40°C तक के तापमान में जीवित रह सकता है। इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं और कटाव को रोकती हैं। यही कारण है कि लद्दाख जैसे क्षेत्रों में इसे पर्यावरण संरक्षण के लिए भी लगाया जाता है। इसके पौधे नाइट्रोजन फिक्सेशन की क्षमता रखते हैं, यानी ये मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर उसे उपजाऊ बनाते हैं। इससे आसपास की वनस्पतियों को भी लाभ मिलता है।
लेह बेरी को “सुपरफूड” कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इसमें विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। प्रमुख पोषक तत्व-
• विटामिन C (संतरे से कई गुना अधिक),
• विटामिन A, E और K,
• ओमेगा-3, 6, 7 और 9 फैटी एसिड,
• आयरन, कैल्शियम और मैग्नीशियम,
• फ्लेवोनॉइड्स और एंटीऑक्सीडेंट!
विटामिन C की उच्च मात्रा के कारण यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक है। कठोर ठंड में रहने वाले लद्दाखी लोग इसे सर्दी-जुकाम से बचाव के लिए पारंपरिक रूप से इस्तेमाल करते आए हैं।
लेह बेरी के औषधीय गुण
आयुर्वेद और पारंपरिक तिब्बती चिकित्सा पद्धति में सी-बकथॉर्न का विशेष महत्व है। इसके फल, बीज और पत्तियां विभिन्न उपचारों में उपयोग की जाती हैं।1. प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना – उच्च एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
2. त्वचा के लिए लाभकारी – इसके तेल का उपयोग त्वचा की नमी बनाए रखने और घाव भरने में किया जाता है।
3. हृदय स्वास्थ्य – ओमेगा फैटी एसिड हृदय को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।
4. पाचन तंत्र – यह पेट की सूजन और अल्सर जैसी समस्याओं में सहायक माना जाता है।
सी-बकथॉर्न ऑयल आज कॉस्मेटिक और स्किनकेयर उत्पादों में भी इस्तेमाल हो रहा है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान
लद्दाख में सी-बकथॉर्न अब केवल जंगली फल नहीं रहा, बल्कि आजीविका का स्रोत बन चुका है। स्वयं सहायता समूह और स्थानीय किसान इसके फलों से जूस, जैम, स्क्वैश और हर्बल चाय बनाकर बाजार में बेचते हैं। भारत सरकार और रक्षा अनुसंधान संगठनों ने भी इसके व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा दिया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात सैनिकों के लिए पोषक पेय के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। इसके प्रसंस्करण से महिलाओं को रोजगार मिल रहा है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।
पर्यावरणीय महत्व
लद्दाख जैसे नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में सी-बकथॉर्न का पौधा मिट्टी के कटाव को रोकने में अहम भूमिका निभाता है। इसकी जड़ें ढलानों को स्थिर रखती हैं और बाढ़ के खतरे को कम करती हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में, जब ग्लेशियर पिघल रहे हैं और भूमि क्षरण बढ़ रहा है, ऐसे पौधों का महत्व और भी बढ़ जाता है।
खेती और संरक्षण
हालांकि यह पौधा प्राकृतिक रूप से उगता है, लेकिन अब इसकी वैज्ञानिक खेती भी की जा रही है।
• रोपण का समय: वसंत ऋतु,
• कटाई: अगस्त से सितंबर,
• सिंचाई: न्यूनतम आवश्यकता,
• मिट्टी: रेतीली और जल निकास वाली!
सरकारी योजनाओं के तहत किसानों को पौधे और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है।
स्वाद और उपयोग
सी-बकथॉर्न का स्वाद हल्का खट्टा और कसैला होता है। इसे सीधे खाना थोड़ा कठिन लग सकता है, इसलिए इसे विभिन्न रूपों में उपयोग किया जाता है, जैसे जूस, जैम, स्क्वैश, हर्बल चाय, आइसक्रीम फ्लेवर, हेल्थ सप्लीमेंट आदि में ! आज कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी लेह बेरी के उत्पाद उपलब्ध हैं।
वैज्ञानिक शोध और वैश्विक पहचान
दुनिया भर में सी-बकथॉर्न पर शोध हो रहे हैं। रूस, चीन और यूरोप के कई देशों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती होती है। चीन में तो इसे “लिक्विड गोल्ड” कहा जाता है। भारत में भी कृषि वैज्ञानिक इसकी नई किस्में विकसित करने पर काम कर रहे हैं ताकि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बढ़ाई जा सके।
चुनौतियां
हालांकि इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं-
• कठिन भूभाग के कारण संग्रहण में दिक्कत,
• सीमित प्रसंस्करण सुविधाएं,
• बाजार तक पहुंच की समस्या,
फिर भी, सरकारी समर्थन और बढ़ती मांग के कारण इसका भविष्य उज्ज्वल माना जा रहा है।
कठिनतम परिस्थितियों में भी फलता जीवन
लद्दाख की बर्फीली धरती पर उगने वाली यह चमकीली नारंगी बेरी केवल एक फल नहीं, बल्कि प्रकृति की अद्भुत सहनशीलता का प्रतीक है। Hippophae rhamnoides यानी सी-बकथॉर्न ने साबित कर दिया है कि जीवन सबसे कठिन परिस्थितियों में भी फल-फूल सकता है। यह फल पोषण, औषधीय गुण, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था, चारों मोर्चों पर अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। आने वाले समय में यदि इसका संरक्षण और वैज्ञानिक विकास जारी रहा, तो लेह बेरी न केवल लद्दाख बल्कि पूरे भारत के लिए स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक बन सकती है। इस प्रकार, बर्फीली हवाओं के बीच चमकती यह नारंगी बेरी वास्तव में हिमालय का अनमोल उपहार है जो कठोरता में भी जीवन की ऊर्जा और आशा का संदेश देती है।
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