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January 20, 2026

बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन: संघर्षपूर्ण राजनीति के एक युग का अंत !

The CSR Journal Magazine

 

बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख बेगम खालिदा जिया का आज सुबह निधन हो गया। वह 80 वर्ष की थीं और लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। उन्होंने ढाका में अंतिम सांस ली। सूत्रों के अनुसार खालिदा जिया कई महीनों से गंभीर रूप से अस्वस्थ थीं। उन्हें लिवर सिरोसिस, किडनी डैमेज, गंभीर गठिया और अनियंत्रित मधुमेह जैसी जानलेवा बीमारियां थीं। लगातार इलाज के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हो सका।

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन, 80 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। जनवरी 2025 में उनकी यात्रा पाबंदियां हटाई गई थीं, जिसके बाद वे इलाज के लिए लंदन गई थीं। इलाज के बाद वे बांग्लादेश लौटीं, लेकिन स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता चला गया। राजनीतिक उथल-पुथल के बीच ख़ालिदा जिया का निधन हुआ। 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बनी अंतरिम सरकार ने खालिदा जिया की रिहाई का आदेश दिया। उनके जमे हुए बैंक खाते बहाल किए। हालांकि तब तक उनकी सेहत काफी नाज़ुक हो चुकी थी।

देश में शोक की लहर

खालिदा जिया के निधन की खबर फैलते ही BNP समर्थकों में शोक की लहर दौड़ गई। ढाका सहित देशभर में पार्टी कार्यकर्ताओं की भीड़ देखी जा रही है। पार्टी कार्यालयों पर शोक सभाओं की तैयारी शुरू हो गई है। उन्होंने 1991 से 1996 तक और फिर 2001 से 2006 तक देश की प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया।

खालिदा जिया: शहीद नेता की पत्नी, जो बनीं बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री

ख़ालिदा जिया के पति जियाउर रहमान बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे और 1977 में राष्ट्रपति बने थे। उस समय खालिदा जिया को दो बेटों की देखभाल करने वाली एक “संकोची गृहिणी” के रूप में देखा जाता था। लेकिन 1981 में पति की हत्या के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की कमान संभाली और दो बार देश की प्रधानमंत्री बनीं। बांग्लादेश की कठोर और संघर्षपूर्ण राजनीति में उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उन्हें कई साल जेल में बिताने पड़े। हालांकि 2024 में हुए जनउभार के बाद, जिसमें उनकी चिर-प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना सत्ता से बेदखल हो गईं, उनके खिलाफ लगाए गए आरोप हटा लिए गए।

प्रारंभिक जीवन और विवाह

बेगम खालिदा जिया का जन्म 1945 में पश्चिम बंगाल में हुआ था। वह एक चाय व्यापारी की बेटी थीं और भारत के विभाजन के बाद अपने परिवार के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) चली आईं। 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह जियाउर रहमान से हुआ, जो उस समय एक युवा सैन्य अधिकारी थे। 1971 में जियाउर रहमान ने पश्चिमी पाकिस्तानी सेना के खिलाफ विद्रोह में भाग लिया और बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की।

जियाउर रहमान की हत्या

1977 में सत्ता पर सेना के कब्जे के बाद वे सेना प्रमुख बने और बाद में स्वयं को राष्ट्रपति घोषित किया। उन्होंने राजनीतिक दलों और स्वतंत्र मीडिया को फिर से अनुमति दी और जनमत संग्रह के जरिए समर्थन भी प्राप्त किया।हालांकि उन्हें करीब 20 सैन्य विद्रोहों का सामना करना पड़ा, जिन्हें उन्होंने कठोर तरीके से दबाया। सैनिकों के सामूहिक निष्पादन की भी खबरें सामने आईं। 1981 में चटगांव में सेना के कुछ अधिकारियों ने उनकी हत्या कर दी।

ख़ालिदा जिया का राजनीति में प्रवेश

पति की हत्या तक खालिदा जिया सार्वजनिक जीवन से दूर रहीं। लेकिन इसके बाद उन्होंने BNP की सदस्यता ली और जल्द ही पार्टी की उपाध्यक्ष बनीं।1982 में बांग्लादेश में सैन्य तानाशाही शुरू हुई, जो नौ वर्षों तक चली। इस दौरान खालिदा जिया लोकतंत्र बहाली आंदोलन की प्रमुख नेता बनकर उभरीं। सेना ने नियंत्रित चुनाव कराए, लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी को उनमें भाग लेने की अनुमति नहीं दी। परिणामस्वरूप उन्हें नजरबंद कर दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने जनसभाओं और आंदोलनों का नेतृत्व जारी रखा, जिससे अंततः सेना को सत्ता छोड़नी पड़ी।

पहली महिला प्रधानमंत्री

1991 में हुए चुनावों में BNP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और खालिदा जिया ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली  । राष्ट्रपति पद की अधिकांश शक्तियां प्रधानमंत्री को मिलने के बाद वह बांग्लादेश की पहली महिला नेता बनीं और किसी मुस्लिम देश का नेतृत्व करने वाली दुनिया की दूसरी महिला बनीं। उस समय बांग्लादेश में बच्चों की औसत शिक्षा मात्र दो वर्ष थी। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य बनाया। हालांकि 1996 में वे शेख हसीना की अवामी लीग से चुनाव हार गईं।

दूसरी पारी और महिला सशक्तिकरण

2001 में खालिदा जिया ने इस्लामी दलों के गठबंधन के साथ जोरदार वापसी की और संसद में लगभग दो-तिहाई सीटें जीतीं। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने संविधान संशोधन कर संसद में महिलाओं के लिए 45 सीटें आरक्षित कीं। उन्होंने युवा महिलाओं की शिक्षा पर विशेष जोर दिया, जबकि उस समय देश में 70 प्रतिशत महिलाएं निरक्षर थीं।

राजनीतिक संकट और गिरफ्तारी

अक्टूबर 2006 में उन्होंने आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया। लेकिन दंगों और अशांति के बाद सेना ने हस्तक्षेप किया और चुनाव टाल दिए गए। अंतरिम सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया। 2007 में खालिदा जिया को जबरन वसूली और भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पहले उनकी प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना भी गिरफ्तार हो चुकी थीं। दोनों महिलाएं, जो दो दशकों तक सत्ता और विपक्ष में अदला-बदली करती रहीं, अदालतों के चक्कर में फंस गईं।

जेल, बीमारी और सजा

2011 में भ्रष्टाचार निरोधक आयोग ने उन पर अपने पति के नाम पर बने ट्रस्ट के लिए अवैध आय से जमीन खरीदने का आरोप लगाया। 2018 में उन्हें अनाथालय ट्रस्ट के लिए तय 2.52 लाख डॉलर के गबन का दोषी ठहराते हुए पांच साल की सजा सुनाई गई। इस सजा के कारण वे चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गईं। उन्होंने सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया। बाद में उन्हें गंभीर गठिया, मधुमेह और अन्य बीमारियों के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया और स्वास्थ्य कारणों से रिहा कर दिया गया।

सत्ता परिवर्तन और अंतिम दिन

2024 में शेख हसीना की सरकार जनआक्रोश के चलते गिर गई। सरकारी नौकरियों में आरक्षण के विरोध में हुए आंदोलन के दौरान नागरिकों की हत्या के बाद देशव्यापी विद्रोह हुआ। हसीना भारत भाग गईं और नई अंतरिम सरकार ने खालिदा जिया की रिहाई तथा बैंक खाते खोलने का आदेश दिया। जनवरी 2025 में उन्हें इलाज के लिए लंदन जाने की अनुमति मिली। लेकिन 30 दिसंबर की सुबह, लंबे समय से खराब स्वास्थ्य से जूझने के बाद, ढाका में उनका निधन हो गया। उनके बड़े बेटे तारिक रहमान दिसंबर के अंत में कई वर्षों के निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौटे। उन्हें देश का अगला संभावित नेता माना जा रहा है।

राजनीति में एक युग का अंत

खालिदा जिया ने 1991–1996 और 2001–2006 तक प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। वे बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं में गिनी जाती थीं। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति के एक ऐतिहासिक अध्याय का अंत हो गया है।
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