करोड़ों के ‘जले नोट’ कांड में जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा, महाभियोग से पहले छोड़ा पद

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जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: महाभियोग के बीच मिले जले हुए नोट

दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और वर्तमान में इलाहाबाद हाई कोर्ट में कार्यरत जस्टिस यशवंत वर्मा ने शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना त्याग पत्र राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेज दिया है। उनके इस्तीफे की वजह एक बहुत बड़ा विवाद बना हुआ है। यह मामला उस समय का है जब 14 मार्च 2025 को उनके आधिकारिक आवास लुटियंस दिल्ली में भारी मात्रा में जले हुए कैश बरामद हुआ। यह इस्तीफा उनके खिलाफ संसद में चल रही महाभियोग (Impeachment) की कार्यवाही और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बीच आया है।

जले हुए कैश की कहानी

विवाद की शुरुआत 14 मार्च 2025 को हुई थी, जब दिल्ली के हुमायूं रोड स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लग गई थी। आग बुझाने पहुँचे दमकल विभाग के कर्मचारियों को वहां एक कमरे में भारी मात्रा में जले और अधजले ₹500 के नोट मिले थे। जांच में यह राशि करीब 15 करोड़ रुपये बताई गई थी। सूत्रों के अनुसार, जले हुए नोट एक स्टोर रूम में पाए गए थे, जो कि सर्वेंट क्वार्टर के पास था। उस समय जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी भोपाल में मौजूद थे। ऐसी जानकारी मिली है कि वहां पर एक बड़ी मात्रा में नकद का होना शक में है। इस खुलासे के बाद जस्टिस वर्मा को महाभियोग प्रक्रिया का सामना करना पड़ा।

क्या है महाभियोग प्रक्रिया?

घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से हटाकर उनके मूल कैडर, इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया था। राज्यसभा के 140 से अधिक सांसदों ने उनके खिलाफ कदाचार के आरोप लगाते हुए महाभियोग का नोटिस दिया था। राज्यसभा सभापति द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा को “गंभीर दुर्व्यवहार” और भ्रष्टाचार का दोषी पाया था। महाभियोग (Impeachment) एक कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत किसी उच्च न्यायालय के जज को आरोपित किया जाता है। इस प्रक्रिया में अगर जज के खिलाफ गंभीर आरोप साबित होते हैं, तो उन्हें पद से हटा दिया जाता है। जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के पीछे ये घटनाक्रम एक बड़ा कारण बन गया था।

जस्टिस वर्मा का करियर

जस्टिस यशवंत वर्मा का करियर काफी शानदार रहा है। वे दिल्ली हाई कोर्ट में जज के रूप में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं। उनके कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई की गई। लेकिन हालिया घटनाओं ने उनके करियर पर एक बड़ा धब्बा लगा दिया है। महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने और पद से हटाए जाने की संभावना को देखते हुए उन्होंने इस्तीफा देना बेहतर समझा। जस्टिस वर्मा ने अपने इस्तीफे में कहा कि वे इन आरोपों से “गहरी पीड़ा” में हैं और उन्होंने अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस्तीफे के बाद अब उनके खिलाफ चल रही संसदीय महाभियोग की कार्यवाही स्वतः समाप्त हो जाएगी।

IT विभाग की कार्रवाई

इस मामले में आगे की कार्रवाई की संभावना बनी हुई है। जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर मिले ₹15 करोड़ के जले हुए नोटों के मामले में आयकर विभाग (Income Tax)  जांच जारी है। आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी केंद्रीय एजेंसियां इस बात की जांच कर रही हैं कि इतने बड़े पैमाने पर नकदी (करीब ₹15 करोड़) का स्रोत क्या था। विभाग यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि क्या यह पैसा घोषित आय का हिस्सा था या यह “बेनामी” संपत्ति थी। मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि बरामद किए गए नोट “अत्यधिक संदिग्ध वस्तुएं” थे और यह इतनी बड़ी राशि थी जिसे जस्टिस वर्मा या उनके परिवार की सहमति के बिना वहां नहीं रखा जा सकता था।

ED कर रही मनी लॉन्ड्रिंग की जांच

जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से जली हुई नकदी (करीब ₹15 करोड़) की बरामदगी के मामले में प्रवर्तन निदेशालय ED धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जांच कर रही है। एजेंसी का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या यह भारी नकदी किसी “अपराध की कमाई” का हिस्सा थी। जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि इतनी बड़ी राशि (जो कथित तौर पर 1.5 फीट ऊंचे ढेर के रूप में थी) कहां से आई। सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस वर्मा इस नकदी के स्रोत का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके थे। ED इस मामले में सीबीआई (CBI) और आयकर विभाग द्वारा जुटाए गए तथ्यों और दर्ज की गई शिकायतों के आधार पर अपनी जांच को आगे बढ़ा रही है। इस्तीफा देने के बाद जस्टिस वर्मा अब एक आम नागरिक की श्रेणी में आ गए हैं। इसका अर्थ यह है कि ED अब उन पर बिना किसी न्यायिक सुरक्षा के सीधी कार्रवाई कर सकती है, जिसमें पूछताछ, संपत्ति की कुर्की और गिरफ्तारी जैसे कड़े कदम शामिल हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जस्टिस वर्मा ने खुद पहले एक फैसले में कहा था कि ED केवल मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर सकती है और उसे अन्य अपराधों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। अब उनके खुद के मामले में ED के क्षेत्राधिकार और शक्तियों का महत्वपूर्ण परीक्षण होने की संभावना है।

जस्टिस वर्मा ने आरोपों को सिरे से खारिज किया

आयकर विभाग की जांच में जस्टिस वर्मा के घरेलू स्टाफ और निजी सचिव की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप है कि आग बुझने के बाद आधी रात को स्टाफ ने बचे हुए कैश को वहां से हटाने की कोशिश की थी। जस्टिस वर्मा ने आयकर चोरी या बेनामी संपत्ति के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उनके पास मौजूद नकदी का पूरा रिकॉर्ड है और वे हमेशा डिजिटल भुगतान (UPI) या बैंकिंग चैनलों का उपयोग करते हैं। कानूनी जानकारों के मुताबिक, जज के पद से इस्तीफे के बाद अब आयकर विभाग और अन्य जांच एजेंसियां एक सामान्य नागरिक की तरह उनसे पूछताछ कर सकती हैं और संपत्ति की जब्ती जैसी कार्रवाई भी संभव है। जस्टिस वर्मा की पद से विदाई के बाद अब ये तय होगा कि किस प्रकार की जांच की जाएगी।

सामाजिक प्रतिक्रिया

इस घटना के बाद से समाज में काफी हलचल मची हुई है। लोगों का मानना है कि उच्च न्यायपालिका में इस प्रकार की घटनाएँ चिंता का विषय हैं। न्यायपालिका की स्वच्छता बनाए रखने के लिए इसे गंभीरता से लिया जाएगा। साल के शुरुआत में हुई कुछ घटनाओं ने न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास भी कमजोर किया है। जस्टिस वर्मा के इस्तीफे पर कई प्रमुख व्यक्तियों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। वहीं, कुछ का मानना है कि यह एक बड़ा सुधार का समय है।

क्या यह मामला टल जाएगा?

उनके इस्तीफे के बाद जांच एजेंसियों की सक्रियता बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि अब उनके खिलाफ चल रही संसदीय महाभियोग की प्रक्रिया समाप्त हो गई है, जिससे आपराधिक जांच का रास्ता साफ हो गया है। जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बाद अब यह देखना है कि क्या यह मामला केवल यहीं पर खत्म होगा या फिर इसका दायरा और बढ़ेगा। अगर जांच होती है, तो इससे न्यायपालिका की छवि पर भी असर पड़ेगा।

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