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January 16, 2026

अमेरिका से अटकी वार्ता के बीच भारत यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक व्यापार समझौते के करीब ! 

The CSR Journal Magazine

 

यूरोपीय संघ के साथ लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब पहुंच चुका भारत इस महीने बातचीत पूरी करने की कर रहा उम्मीद! यदि यह समझौता होता है, तो यह भारत का अब  तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होगा। ऐसे समय में जब अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता ठहरी हुई है और वैश्विक स्तर पर संरक्षणवाद बढ़ रहा है, यह डील भारत को नए बाजार उपलब्ध कराने के साथ-साथ यूरोप के साथ आर्थिक, निवेश और रणनीतिक सहयोग को नई मजबूती दे सकती है।

भारत–ईयू व्यापार समझौते के करीब

भारत को उम्मीद है कि यूरोपीय संघ (EU) के साथ लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत इस महीने पूरी हो जाएगी। व्यापार सचिव राजेश अग्रवाल ने गुरुवार को यह जानकारी दी। अगर यह समझौता होता है, तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होगा, ऐसे समय में जब अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता धीमी पड़ी हुई है और अमेरिकी शुल्क दबाव बढ़ रहे हैं। यह समझौता कई वर्षों से चर्चा में है और इसे भारत तथा यूरोपीय संघ, दोनों के लिए आर्थिक संबंध मजबूत करने और चीन व रूस पर निर्भरता कम करने का अवसर माना जा रहा है। वर्ष 2024 में भारत और ईयू के बीच द्विपक्षीय व्यापार 120 अरब यूरो (करीब 140 अरब डॉलर) रहा, जिससे ईयू भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया।

अमेरिका के साथ वार्ता में अब भी देरी

अग्रवाल ने कहा कि दोनों पक्ष समझौते को अंतिम रूप देने के “बहुत करीब” हैं और यह भी देखा जा रहा है कि क्या इसे इस महीने नई दिल्ली में होने वाली शीर्ष नेताओं की बैठक से पहले पूरा किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है और दोनों पक्ष तैयार होने पर ही कोई समझौता होगा। गौरतलब है कि पिछले साल दोनों सरकारों के बीच संवाद में आई रुकावट के कारण  अमेरिका–भारत व्यापार वार्ता टूट गई थी।

भारतीय उपभोक्ता बाज़ार में यूरोपीय पहुंच होगी आसान

भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन 25 से 27 जनवरी के बीच भारत दौरे पर आएंगे और 27 जनवरी को होने वाले भारत–ईयू शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता करेंगे। अगर यह समझौता हो जाता है, तो इससे 1.4 अरब से अधिक आबादी वाले भारत के विशाल और अब तक काफी हद तक संरक्षित उपभोक्ता बाजार में यूरोपीय वस्तुओं की पहुंच बढ़ेगी। इसके साथ ही, वैश्विक व्यापार प्रवाह में भी बड़ा बदलाव आ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब संरक्षणवाद बढ़ रहा है और अमेरिका–भारत समझौता अटका हुआ है।

2022 में शुरू हुई वार्ता पर लगेगी मुहर

दोनों पक्ष 2025 में समझौता पूरा करने के लक्ष्य के साथ एक व्यापक समझौते को अंतिम रूप देने पर जोर दे रहे हैं। वॉन डेर लेयेन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बातचीत को तेज करने पर सहमति जताई थी। 2022 में दोबारा शुरू हुई यह वार्ता उस समय गति में आई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत समेत कई व्यापारिक साझेदारों पर शुल्क बढ़ाए। हाल के महीनों में ब्रसेल्स ने मेक्सिको और इंडोनेशिया के साथ व्यापार समझौते किए हैं और भारत के साथ बातचीत भी तेज की है। वहीं, भारत ने ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार समझौते किए हैं।

कृषि क्षेत्र बातचीत से बाहर

भारत के वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि कुछ संवेदनशील कृषि उत्पादों को इस समझौते की बातचीत से बाहर रखा गया है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि भारत किसी भी व्यापार समझौते में अपने कृषि या डेयरी क्षेत्र को नहीं खोलेगा, क्योंकि इससे करोड़ों छोटे और निर्वाह आधारित किसानों के हित प्रभावित हो सकते हैं।यूरोपीय संघ कारों, चिकित्सा उपकरणों, वाइन, शराब और मांस जैसे उत्पादों पर भारी शुल्क कटौती चाहता है, साथ ही बौद्धिक संपदा नियमों को और सख्त करने की मांग भी कर रहा है। वहीं, भारत श्रम-प्रधान वस्तुओं के लिए शुल्क-मुक्त पहुंच और अपने ऑटोमोबाइल तथा इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों को जल्दी मान्यता देने की मांग कर रहा है।

डिजिटल मार्केटिंग और ग्रीन टेक्नोलॉजी में साझेदारी

वस्तुओं के अलावा, यह समझौता सेवाओं के व्यापार, निवेश, डिजिटल व्यापार, बौद्धिक संपदा और हरित प्रौद्योगिकियों में सहयोग को भी बढ़ाने की उम्मीद है। इससे भारतीय विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में यूरोपीय निवेश को भी बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, नियामकीय तालमेल और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर लेवी (CBAM), जिसके तहत स्टील, सीमेंट और अन्य कार्बन-गहन उत्पादों के आयातकों को उत्सर्जन का हिसाब देना होता है, पहले ही कुछ भारतीय निर्यातों को प्रभावित करने लगा है। निर्यातकों के अनुसार, यह भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
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