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February 5, 2026

भारत ने मांगा अपना कोहिनूर! सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी की कोशिशें तेज, इतिहास गौरव-न्याय पर छिड़ी बहस!

The CSR Journal Magazine

 

कोहिनूर हीरे की वापसी फिर चर्चा में है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ब्रिटिश शासन के दौरान ले जाए गए ऐतिहासिक कलाकृतियों और धरोहरों को वापस लाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर प्रयास तेज कर रहा है। यह पहल औपनिवेशिक इतिहास, राष्ट्रीय गौरव और ऐतिहासिक न्याय से जुड़ी भावनाओं को नए सिरे से सामने ला रही है।

ब्रिटेन से सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी की मांग तेज करता भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत एक बार फिर ब्रिटेन से अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी की मांग को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठा रहा है। इस अभियान के केंद्र में दुनिया के सबसे चर्चित और विवादित हीरों में से एक कोहिनूर (Kohinoor Diamond) है। इसके साथ ही भारत ब्रिटिश शासन के दौरान ले जाए गए हजारों पुरावशेषों, मूर्तियों, पांडुलिपियों और कलाकृतियों की वापसी भी चाहता है। यह पहल केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि इतिहास, राष्ट्रीय गौरव और औपनिवेशिक अन्याय से जुड़ी भावनाओं को भी सामने ला रही है।

कोहिनूर: 800 साल का सफर और विवाद

कोहिनूर हीरे का इतिहास लगभग 800 वर्षों में फैला हुआ माना जाता है। इसकी उत्पत्ति दक्षिण भारत की गोलकुंडा खदानों से मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार यह हीरा पहले काकतीय राजवंश के पास था, फिर दिल्ली सल्तनत, मुग़ल साम्राज्य, फारसी शासक नादिर शाह और अफगान शासकों के हाथों से गुजरता हुआ अंततः पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह तक पहुंचा। 1849 में अंग्रेजों द्वारा पंजाब के विलय के बाद, किशोर महाराजा दिलीप सिंह से कोहिनूर हीरा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने कब्जे में ले लिया।

भारत का कोहिनूर लंदन पहुंचा

1851 में इसे ब्रिटेन भेजा गया और बाद में इसे ब्रिटिश राजमुकुट का हिस्सा बना दिया गया। आज यह हीरा ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स में शामिल है और लंदन के टॉवर ऑफ लंदन में प्रदर्शित किया जाता है। भारत का तर्क है कि कोहिनूर को औपनिवेशिक दबाव और असमान संधि के तहत ले जाया गया, इसलिए इसकी वापसी ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न है।

कोहिनूर हीरा: इतिहास, रहस्य और विवाद

कोहिनूर हीरा दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक हीरों में से एक है। इसका नाम फ़ारसी शब्द “कोह-ए-नूर” से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है- “रोशनी का पर्वत”। यह हीरा न सिर्फ अपनी चमक के लिए जाना जाता है, बल्कि इसके साथ जुड़ा इतिहास, सत्ता संघर्ष और विवाद भी इसे खास बनाते हैं। मुगल बादशाह बाबर ने अपने संस्मरण बाबरनामा में इस हीरे का उल्लेख किया है। शाहजहाँ के प्रसिद्ध मयूर सिंहासन में भी कोहिनूर जड़ा हुआ था। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद यह हीरा फारस के शासक नादिर शाह के हाथ लगा, जिसने इसे “कोहिनूर” नाम दिया।

ब्रिटिश शासन और इंग्लैंड तक का सफर

1849 में पंजाब पर ब्रिटिश कब्ज़े के बाद, कोहिनूर हीरा ईस्ट इंडिया कंपनी के पास चला गया। इसे महाराजा दिलीप सिंह से लेकर 1850 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया। बाद में इसे दोबारा काटकर छोटा किया गया ताकि इसकी चमक बढ़ाई जा सके। आज कोहिनूर हीरा ब्रिटेन के शाही मुकुट में जड़ा हुआ है और लंदन के टॉवर ऑफ लंदन में प्रदर्शित किया जाता है। यह हीरा अब लगभग 105.6 कैरेट का है।

कोहिनूर के बारे में रोचक तथ्य

कहा जाता है कि कोहिनूर हीरा पुरुष शासकों के लिए अशुभ और महिलाओं के लिए शुभ माना जाता है। इसी कारण इसे ब्रिटिश शाही परिवार में केवल रानियों के मुकुट में ही लगाया गया। कोहिनूर हीरा सिर्फ एक कीमती रत्न नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, सत्ता और उपनिवेशवाद की एक जीवंत कहानी है। इसकी वापसी को लेकर विवाद आज भी जारी है और यह हीरा भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

प्रधानमंत्री मोदी के पिछले प्रयास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत ने सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी को विदेश नीति का अहम हिस्सा बनाया है।
• ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा और यूरोप से सैकड़ों प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां भारत वापस लाई गईं।
• तस्करी कर अमेरिका ले जाई गईं नटराज और अन्य चोलकालीन मूर्तियां भारत को सौंपी गईं।
• ब्रिटेन से भी कई प्राचीन वस्तुएं और पांडुलिपियां राजनयिक स्तर पर वापस लाई गईं।
• संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों पर प्रधानमंत्री ने बार-बार औपनिवेशिक लूट की विरासत पर सवाल उठाए हैं। सरकार का रुख स्पष्ट रहा है कि यह केवल वस्तुओं की वापसी नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत पहचान  की पुनर्स्थापना है।
ब्रिटेन का रुख और वैश्विक बहस
ब्रिटेन अब तक कोहिनूर की वापसी पर औपचारिक सहमति नहीं देता रहा है। उसका तर्क है कि हीरा उस समय के कानूनों और संधियों के तहत प्राप्त हुआ था। हालांकि दुनिया भर में अब यह बहस तेज हो रही है कि औपनिवेशिक दौर में संग्रहालयों और शाही खजानों में पहुंची वस्तुएं नैतिक रूप से किसकी हैं। ग्रीस द्वारा एल्गिन मार्बल्स, अफ्रीकी देशों द्वारा बेनिन ब्रॉन्ज़ और भारत द्वारा कोहिनूर की मांग- ये सभी उदाहरण इस वैश्विक आंदोलन को मजबूत करते हैं।

इतिहास, गौरव और न्याय का सवाल

भारत में कोहिनूर केवल एक हीरा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शोषण का प्रतीक माना जाता है। इसकी वापसी को लेकर जनभावनाएं लगातार प्रबल होती जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही कोहिनूर की वापसी आसान न हो, लेकिन भारत का यह निरंतर दबाव वैश्विक विमर्श को बदल रहा है।प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत का संदेश स्पष्ट है- “जो विरासत हमारी है, उसे वापस पाना हमारा अधिकार है।” यह लड़ाई केवल अतीत की नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए इतिहास को सही संदर्भ में वापस लाने की कोशिश भी है।

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