UGC नियम 2026 पर बहस के बीच सामने आई ज़मीनी सच्चाई- हकीकत बहस से ज़्यादा जटिल
भारत में जाति पर बहस कभी ख़ामोश नहीं होती। जब भी शिक्षा, आरक्षण या समानता से जुड़ा कोई नया नियम सामने आता है, यह मुद्दा फिर से केंद्र में आ जाता है। इन दिनों UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulation 2026 को लेकर अदालतों से लेकर विश्वविद्यालयों तक चर्चाएं तेज़ हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फिलहाल पुराने नियमों को लागू रहने देने के फैसले ने इस बहस को और धार दी है। इसी बीच एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित संस्था Pew Research Centre की रिपोर्ट ने इस बहस को एक नया और ठोस आधार दिया है- आंकड़ों का आधार। लेकिन इस शोरगुल के बीच एक बुनियादी सवाल अक्सर दब जाता है- आज का भारत वास्तव में क्या अनुभव कर रहा है?
आंकड़े, जो बहस को आईना दिखाते हैं
प्यू रिसर्च सेंटर की 2021 की रिपोर्ट “Religion in India: Tolerance and Segregation” इस सवाल का सीधा जवाब देती है। रिपोर्ट किसी विचारधारा की वकालत नहीं करती, बल्कि लोगों के रोज़मर्रा के अनुभवों को दर्ज करती है। सर्वे में जब लोगों से पूछा गया कि क्या उन्होंने पिछले एक साल में जाति के कारण भेदभाव झेला, तो 82 प्रतिशत भारतीयों ने ‘नहीं’ में उत्तर दिया। यहां तक कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के भीतर भी केवल 14 प्रतिशत लोगों ने भेदभाव की बात कही। ये आंकड़े यह दावा नहीं करते कि भेदभाव खत्म हो गया है। लेकिन वे यह ज़रूर बताते हैं कि आज की सामाजिक सच्चाई उस धारणा से अलग है, जिसमें भेदभाव को सर्वव्यापी और निरंतर माना जाता है। यह रिपोर्ट ऐतिहासिक अन्याय को नकारती नहीं है, लेकिन यह धारणा ज़रूर चुनौती देती है कि आज के भारत में हर व्यक्ति रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जाति के कारण प्रताड़ित हो रहा है।
अनुभूति और यथार्थ के बीच का फ़ासला
सर्वे का एक और पहलू ध्यान खींचता है। जब लोगों से पूछा गया कि क्या SC, ST और OBC के खिलाफ व्यापक भेदभाव है, तो केवल 16 से 20 प्रतिशत लोगों ने इसे “बहुत ज़्यादा” बताया। यह अंतर, व्यक्तिगत अनुभव और सामाजिक धारणा के बीच आज की बहस की सबसे बड़ी विडंबना है। हम अक्सर एक ऐसी तस्वीर पर बहस करते हैं, जिसे ज़्यादातर लोगों ने अपनी ज़िंदगी में महसूस ही नहीं किया।
आज का भारत: जातीय संरचना की सच्ची तस्वीर
सर्वे भारत की सामाजिक बनावट को भी साफ़ करता है-
• 30 प्रतिशत लोग जनरल कैटेगरी,
• 35 प्रतिशत OBC या अति पिछड़ा वर्ग,
• 34 प्रतिशत SC या ST,
• केवल 4 प्रतिशत ब्राह्मण,
यानी भारत की बड़ी आबादी तथाकथित “निचली जातियों” से आती है। धार्मिक आधार पर तस्वीर और जटिल हो जाती है-
• 76 प्रतिशत जैन जनरल कैटेगरी में,
• 89 प्रतिशत बौद्ध खुद को दलित बताते हैं,
• मुसलमान और सिख अधिकतर OBC या गैर-ब्राह्मण जनरल कैटेगरी से,
• लगभग 25 प्रतिशत ईसाई अनुसूचित जनजाति से आते हैं।
यह विविधता किसी एक पीड़ित या प्रभुत्वशाली वर्ग की सरल कहानी को खारिज करती है।
समाज बदला है, पर पूरी तरह नहीं
रिपोर्ट यह भी बताती है कि सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ी है। अधिकांश भारतीय आज दलित पड़ोसियों को स्वीकार करने में सहज हैं। शिक्षा और शहरीकरण ने इस सोच को मज़बूत किया है। लेकिन यह बदलाव सतही नहीं, सीमित है। दोस्ती और रिश्तों में जाति अब भी एक अदृश्य रेखा बनी हुई है। और विवाह के मामले में यह रेखा आज भी लगभग अडिग है। करीब 80 प्रतिशत भारतीय अब भी अंतर-जातीय विवाह के पक्ष में नहीं हैं। यानी भारत में जाति व्यवस्था हिंसा से नहीं, परंपरा और आदत से जीवित है।
शादी: जहां जाति आज भी सबसे मज़बूत
अगर कहीं जातिगत कठोरता अब भी कायम है, तो वह है विवाह। लगभग 80 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि जाति से बाहर शादी को रोका जाना चाहिए। ग्रामीण और मध्य भारत में विरोध ज़्यादा है, दक्षिण भारत और शहरों में अपेक्षाकृत कम! उम्र, शिक्षा और धार्मिक सोच यहां अहम भूमिका निभाते हैं। प्यू की यह रिपोर्ट यह नहीं कहती कि जातिगत भेदभाव खत्म हो चुका है। यह कहती है कि भारत एक संक्रमणकाल में है, जहां संरचनात्मक असमानताएं मौजूद हैं, लेकिन लोगों के रोज़मर्रा के अनुभव बदल रहे हैं। यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं से सवाल करती है कि क्या नियम आज की ज़मीनी हकीकत पर आधारित हैं या पुरानी धारणाओं पर।
नीतियों के लिए एक असहज सवाल
यहां से नीति-निर्माताओं के लिए सवाल खड़ा होता है। क्या आज की नीतियां आज की ज़मीनी हकीकत पर आधारित हैं, या वे अब भी अतीत की धारणाओं से संचालित हैं? जब हर समस्या को एक जैसी मानकर नियम बनाए जाते हैं, तो वे कई बार उन लोगों के अनुभवों को अनदेखा कर देते हैं, जिनकी ज़िंदगी सचमुच बदल चुकी है। समानता का मतलब केवल संरक्षण नहीं, बल्कि समय के साथ बदलती सामाजिक सच्चाई को समझना भी है।
न्याय, लेकिन आंकड़ों के साथ
प्यू सर्वे यह नहीं कहता कि जातिगत असमानता खत्म हो चुकी है। यह केवल यह चेतावनी देता है कि आक्रोश के आधार पर बनी नीतियां, अक्सर वास्तविक समाधान नहीं दे पातीं। अगर भारत को सचमुच एक समावेशी समाज बनाना है, तो बहसों को भावना से निकालकर आंकड़ों और अनुभवों की ज़मीन पर लाना होगा।
आज के भारत को समझने की ज़रूरत
आज भारत न पूरी तरह अतीत में है, न पूरी तरह भविष्य में। यह एक ऐसा समाज है जो बदल रहा है- धीरे, असमान रूप से, लेकिन साफ़ तौर पर। UGC नियमों पर विचार करते समय शायद हमें यह सवाल खुद से पूछना चाहिए- ‘क्या हम आज के भारत की बात कर रहे हैं, या कल के डर से फैसले ले रहे हैं?’आज असली सवाल यह नहीं है कि भेदभाव है या नहीं, वह है। असली सवाल यह है कि, ‘क्या हमारी नीतियां भारत की जटिल सच्चाई को समझती हैं, या समाज को जमे हुए खांचों में बांध देती हैं?’ UGC नियमों पर फैसला लेते समय शायद देश को यह सोचने की ज़रूरत है कि हम आज के भारत की बात कर रहे हैं या बीते डर दोहरा रहे हैं। कई बार सबसे असहज सच यही होता है- हकीकत, गुस्से से कहीं ज़्यादा जटिल होती है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे ज़रूरी बहस वही होती है, जो शोर नहीं, सच से जन्म ले।