महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए बनाई गई सरकारी नीतियों से महिलाओं की राजनीति और प्रशासन में भागीदारी जरूर बढ़ी है, लेकिन इन नीतियों का सही और समान रूप से क्रियान्वयन अभी भी नहीं हो पा रहा है। खासकर कामकाजी और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं तक इनका पूरा लाभ नहीं पहुंच रहा है। यह बात गुरुवार को नवी मुंबई में आयोजित एक सेमिनार में वक्ताओं ने कही।
नवी मुंबई में हुए सेमिनार में महिला नीतियों पर चर्चा
“धोरण कुठेवर आला ग बाई!” (नीति कहां तक पहुंची) विषय पर यह चर्चा नवी मुंबई के साहित्य मंदिर हॉल में आयोजित की गई। यह कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राज्यभर में चल रही सेमिनार श्रृंखला का हिस्सा था। इसका आयोजन यशवंतराव चव्हाण केंद्र के महिला प्रकोष्ठ द्वारा किया गया था, जिसमें राज्य की चार महिला नीतियों की प्रगति की समीक्षा की गई।
समाज में बढ़ी महिला भागीदारी
रिसोर्स एंड सपोर्ट सेंटर के निदेशक भीम रास्कर ने कहा कि इन नीतियों के कारण स्थानीय प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। आज महिला प्रतिनिधि, आशा कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता स्थानीय शासन में अहम जिम्मेदारियां निभा रही हैं। उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले चुनावों में महिला उम्मीदवार ढूंढना मुश्किल होता था, लेकिन अब राजनीति में महिलाओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कई बार महिला प्रतिनिधि महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने रुख से पीछे हट जाती हैं और बजट प्रक्रिया में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी अभी भी नहीं है।
कामकाजी और अल्पसंख्यक महिलाएं अधिकारों से वंचित
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हसीना खान ने कहा कि ये नीतियां सभी महिलाओं के लिए बनाई गई हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन में मुस्लिम महिलाओं को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाएं आज भी शिक्षा और रोजगार के मुख्य अवसरों से वंचित हैं। स्त्री मुक्ति संघटना की ट्रस्टी वृशाली मगदुम ने बताया कि राज्य में पहली महिला नीति लागू हुए 32 साल से अधिक समय हो चुका है, फिर भी बड़ी संख्या में कामकाजी महिलाओं तक इसके फायदे नहीं पहुंच पाए हैं। उन्होंने कहा कि 2005 में घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून लागू होने के बावजूद 2026 में भी घरेलू हिंसा और दहेज से जुड़ी मौतों के मामले सामने आ रहे हैं।
साझा प्रयास ज़रूरी
उन्होंने कहा कि इन नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों को भी मिलकर प्रयास करना होगा। जब तक समाज में व्यापक बदलाव नहीं होगा, तब तक इन नीतियों का पूरा लाभ मिलना मुश्किल रहेगा। इस कार्यक्रम का आयोजन यशवंतराव चव्हाण केंद्र के नवी मुंबई जिला केंद्र, नवी मुंबई मराठी साहित्य, संस्कृति और कला मंडल तथा नवी मुंबई स्वयंसेवी संस्थाओं की समन्वय समिति ने संयुक्त रूप से किया था। इस अवसर पर 100 से अधिक सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी मौजूद रहे।
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