नवरात्रि 2026: महंगाई की भेंट चढ़ी शिल्पकारों की मेहनत, नोएडा के मूर्ति बाजारों में बढ़ी लागत, घटा मुनाफा

The CSR Journal Magazine

Navratri 2026: नवरात्रि की शुरूआत, मूर्तिकारों की मेहनत और बढ़ती लागत की दिलचस्प कहानी

शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत में अब कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। औद्योगिक नगरी नोएडा और दिल्ली-एनसीआर के तमाम पूजा पंडालों में मां दुर्गा की अगवानी के लिए तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। नोएडा के अलग-अलग सेक्टरों और खुले मैदानों में अस्थायी कार्यशालाएं (Workshops) रात-दिन गुलजार हैं, जहां मूर्तिकार मां दुर्गा, भगवान गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। हालांकि, इस साल त्योहार की यह चमक मूर्तियों के निर्माण से जुड़े कारीगरों के चेहरों पर दिखाई नहीं दे रही है। वैश्विक और घरेलू बाजारों में कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों और महंगाई ने इन शिल्पकारों की कमर तोड़ दी है। मूर्तियों के निर्माण की लागत में भारी बढ़ोतरी होने के कारण उनकी महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत का मुनाफा पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।

पंडालों में बढ़ रही रौनक, कार्यशालाओं में दिन-रात काम

नोएडा के सेक्टर-62, सेक्टर-33 (शिल्प हाट के समीप), सेक्टर-50, और ग्रेटर नोएडा के कई हिस्सों में पश्चिम बंगाल के हुगली, नादिया और कोलकाता के कुम्हारटोली से आए सैकड़ों मूर्तिकार पिछले 4-5 महीनों से डेरा डाले हुए हैं। इस बार भी नोएडा के प्रमुख दुर्गोत्सवों (जैसे सेक्टर-62 की समिति और सेक्टर-26 की पूजा) के लिए 12 फीट से लेकर 15 फीट तक की भव्य प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं। कारीगरों के मुताबिक, नवरात्रि नजदीक आने के साथ अब काम की गति दोगुनी कर दी गई है। मूर्तियों के चेहरे के भाव, आंखों की जीवंत बनावट, पारंपरिक वस्त्रों की सजावट और मुकुट व आभूषणों को सजाने में विशेष सावधानी बरती जा रही है। पूजा समितियों की मांग के अनुसार, इस साल पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) मिट्टी की मूर्तियों की मांग काफी अधिक है।

महंगाई की मार: कच्चे माल की कीमतों में 30 से 40 प्रतिशत का उछाल

नोएडा के सेक्टर-62 के पास अस्थायी शेड में मूर्ति निर्माण कर रहे पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ मूर्तिकार सुबल पाल ने बताया कि इस साल मूर्ति बनाने की लागत पिछले साल की तुलना में 35 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है। उन्होंने विस्तार से बताया कि मूर्ति बनाने में इस्तेमाल होने वाली हर बुनियादी सामग्री महंगी हो चुकी है:
गंगा की विशेष मिट्टी: मूर्तियों के चेहरे और शरीर को फिनिशिंग देने के लिए कोलकाता से गंगा नदी की खास ‘एठेल माटी’ (चिकनी मिट्टी) मंगवाई जाती है। परिवहन और ढुलाई का खर्च बढ़ने से इस मिट्टी की एक ट्रॉली की कीमत में भारी इजाफा हुआ है।
बांस और पुआल (पराली): मूर्ति का बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए बांस और पुआल का इस्तेमाल होता है। पिछले साल की तुलना में बांस की एक गांठ पर 25 से 30 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।
सजावट का सामान और रंग: मूर्तियों को सजाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चमकीली जरी, कृत्रिम आभूषण, मुकुट, और कपड़े (डाकर साज) के दाम लगभग दोगुने हो गए हैं। इसके अलावा, पर्यावरण के अनुकूल प्राकृतिक वाटर-कलर (वाटर बेस्ड रंग) भी महंगे हुए हैं।

मेहनत के अनुपात में नहीं मिल रहे दाम, कम हो रहे ऑर्डर

अमेठी और उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों से आकर नोएडा में काम कर रहे मूर्तिकार प्रदीप और नीरज बताते हैं कि मार्च-अप्रैल के महीने से ही वे इन मूर्तियों के सांचे तैयार करने में जुट जाते हैं। 6 महीनों की कड़ी धूप और उमस भरी गर्मी में पूरा परिवार दिन-रात एक करता है। लेकिन जब बिक्री का समय आता है, तो बाजार से लागत के अनुपात में मुनाफा नहीं मिल पाता। कारीगरों का कहना है कि जब वे बढ़ी हुई लागत को देखते हुए पूजा समितियों या व्यक्तिगत खरीदारों से प्रतिमा की कीमत बढ़ाने को कहते हैं, तो ग्राहक बजट का हवाला देकर मोलभाव करने लगते हैं। कई छोटी पूजा समितियों ने इस बार अपने बजट में कटौती कर दी है, जिससे बड़े आकार की मूर्तियों के ऑर्डर पिछले सालों की तुलना में कम मिले हैं। मूर्तिकारों के अनुसार, “अगर हम ज्यादा दाम मांगते हैं, तो ग्राहक मूर्ति छोड़ देते हैं। ऐसे में हमें अपनी मेहनत का मूल्य कम करके बहुत ही मामूली मुनाफे पर मूर्तियां बेचनी पड़ रही हैं।”

बंगाल से आई विशेष टीमें, लॉजिस्टिक्स का बढ़ा खर्च

नोएडा में दुर्गा पूजा और शारदीय नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक बड़े उत्सव का रूप ले चुके हैं। भव्य पंडाल बनाने के लिए केवल मूर्तिकार ही नहीं, बल्कि पंडाल के लिए बांस की लकड़ियों का विशाल ढांचा तैयार करने वाली 15 से 20 सदस्यीय विशेष टीमें भी बंगाल और उड़ीसा से बुलाई जाती हैं। नोएडा के एक बड़े आयोजन पर पूजा समितियां करीब 40 से 45 लाख रुपये तक खर्च कर रही हैं। इन टीमों के नोएडा आने-जाने का किराया, उनके ठहरने की व्यवस्था और दैनिक मजदूरी में भी बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर मूर्ति बनाने वाले मुख्य ठेकेदारों के मुनाफे पर पड़ रहा है।

सरकारी मदद और स्थायी शेड की मांग

नोएडा के शिल्पकारों और मूर्तिकारों का कहना है कि वे हर साल शहर की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने के लिए यहां आते हैं, लेकिन उन्हें स्थानीय स्तर पर बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं। खुले या तिरपाल के नीचे काम करने के कारण अचानक होने वाली बारिश से तैयार मूर्तियां खराब होने का डर हमेशा बना रहता है। कारीगरों ने मांग की है कि प्रशासन को उनके लिए त्योहारों के दौरान एक निश्चित और सुरक्षित स्थान (जैसे स्थायी शेड) रियायती दरों पर उपलब्ध कराना चाहिए, ताकि उनकी मेहनत बारिश या मौसम की मार से सुरक्षित रह सके।

उम्मीद की आखिरी किरण

तमाम आर्थिक चुनौतियों, बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बावजूद, कारीगरों के हौसले पस्त नहीं हुए हैं। कार्यशालाओं में ढोल-ताशों और शंख की आवाजों के बीच मूर्तियों को अंतिम रंग दिया जा रहा है। कारीगरों को उम्मीद है कि नवरात्रि के शुरू होने वाले दिनों में छोटी चौकियों और सोसायटियों से मिलने वाले फुटकर ऑर्डरों से उनकी लागत की भरपाई हो जाएगी और वे त्योहार के बाद खाली हाथ अपने घरों को नहीं लौटेंगे।

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540 

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos