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January 22, 2026

सरकारी प्रोत्साहन भी बेअसर चीन में जनसंख्या संकट गहराया, चौथे साल भी घटे लोग

The CSR Journal Magazine
चीन में आबादी लगातार चौथे साल घट गई है, जिससे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर सामाजिक और आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ खत्म करने, नकद प्रोत्साहन और सुविधाओं के बावजूद लोग शादी और बच्चे पैदा करने से दूर हो रहे हैं। इसके पीछे सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली और सोच भी बड़ी वजह बन रही है।

ऐतिहासिक गिरावट जन्म दर सबसे निचले स्तर पर

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025 के अंत तक चीन की आबादी घटकर करीब 140 करोड़ रह गई, यानी एक साल में लगभग 33.9 लाख की कमी। यह गिरावट पिछले वर्ष की तुलना में भी ज्यादा है। जन्म दर घटकर प्रति 1,000 लोगों पर सिर्फ 5.63 रह गई है, जो 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद सबसे कम है।
वहीं मृत्यु दर बढ़कर 8.04 प्रति 1,000 हो गई है, जो 1968 के बाद सबसे अधिक मानी जा रही है। जन्म और मृत्यु दर के इस अंतर ने चीन को तेज़ी से बुज़ुर्ग होती आबादी वाले देश में बदल दिया है।

सरकार के प्रयास नीतियां बदलीं, नतीजे नहीं

चीन सरकार ने जन्म दर बढ़ाने के लिए बीते एक दशक में कई बड़े फैसले लिए। 2016 में ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ खत्म कर दो बच्चों की अनुमति दी गई, लेकिन इससे भी कोई खास सुधार नहीं हुआ। इसके बाद 2021 में तीन बच्चे पैदा करने की इजाजत दी गई।
हाल ही में सरकार ने तीन साल से कम उम्र के हर बच्चे के माता-पिता को 3,600 युआन (करीब 47 हजार रुपये) देने की घोषणा की। कई प्रांतों में अतिरिक्त आर्थिक सहायता और लंबी मैटरनिटी लीव भी दी जा रही है।
हालांकि, कुछ फैसले विवादों में भी रहे। गर्भनिरोधक साधनों पर 13% टैक्स लगाए जाने से विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि इससे अनचाहे गर्भ और यौन रोगों के मामले बढ़ सकते हैं। कुल मिलाकर, सरकारी कोशिशें ज़मीन पर असर दिखाने में नाकाम रही हैं।

बच्चे क्यों नहीं चाहते युवा?

विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन में बच्चे पैदा न करने की वजह सिर्फ आर्थिक बोझ नहीं है। बीजिंग यंग पॉपुलेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि चीन उन देशों में शामिल है, जहां बच्चे पालना सबसे महंगा है।
लेकिन इसके साथ ही जीवनशैली और सोच में बदलाव भी बड़ा कारण है। कई युवा बिना ज़िम्मेदारी के आज़ादी भरी ज़िंदगी जीना चाहते हैं।
बीजिंग के एक निवासी ने कहा, “मेरे ज्यादातर दोस्तों के बच्चे नहीं हैं। जिनके हैं, वे सबसे अच्छे स्कूल, दाई और भविष्य की चिंता में डूबे रहते हैं। यह सब देखकर ही थकान हो जाती है।”
दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और ताइवान जैसे देशों में भी यही ट्रेंड दिख रहा है, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और करियर को परिवार से ऊपर रखा जा रहा है।

घटती आबादी के दूरगामी असर

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर यही रुझान जारी रहा, तो 2100 तक चीन की आबादी आधी से भी कम रह सकती है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है—कामकाजी उम्र के लोग कम हो रहे हैं और उपभोक्ता मांग कमजोर पड़ रही है।
इसके अलावा, बुज़ुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है। कई युवा नौकरी के कारण माता-पिता से दूर रहते हैं, जिससे बुज़ुर्ग अकेलेपन और आर्थिक निर्भरता का सामना कर रहे हैं।
चाइनीज़ अकादमी ऑफ सोशल साइंस की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि बुज़ुर्गों के लिए पेंशन फंड भविष्य में खत्म होने की कगार पर पहुंच सकता है। यह स्थिति सरकार के लिए एक बड़ी सामाजिक चुनौती बनती जा रही है।
चीन का जनसंख्या संकट केवल आंकड़ों का मसला नहीं, बल्कि देश की सामाजिक संरचना और आर्थिक भविष्य से जुड़ा सवाल है। जब तक युवाओं की जीवनशैली, काम के दबाव और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर ठोस समाधान नहीं निकलता, तब तक सरकारी प्रोत्साहन भी शायद इस गिरावट को रोकने में नाकाम ही रहेंगे।

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