भारत और ईरान (प्राचीन फारस) के रिश्ते केवल राजनीतिक या कूटनीतिक नहीं रहे हैं, बल्कि इनका प्रभाव हमारी रोजमर्रा की जिंदगी, खान-पान, पहनावे और परंपराओं तक गहराई से देखा जा सकता है। इतिहासकारों के अनुसार सिल्क रूट के व्यापार, मध्य एशियाई संपर्क और विशेषकर मुगल काल में दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान अपने चरम पर था। जब मुगल बादशाह हुमायूं शेरशाह सूरी से पराजित होने के बाद कुछ समय के लिए फारस गए, तब उन्हें वहां के शासक से संरक्षण मिला। इसके बाद भारत में मुगल शासन के दौरान फारसी संस्कृति, भाषा, कला और खान-पान का प्रभाव और मजबूत हुआ।
स्वाद में घुला फारसी रंग
उत्तर भारत का लोकप्रिय नाश्ता समोसा दरअसल फारसी शब्द ‘संबोसा’ या ‘संबूसक’ से निकला है। प्रसिद्ध यात्री इब्न बतूता ने दिल्ली सल्तनत के दरबार में परोसे जाने वाले ‘संबूसक’ का जिक्र किया था। फारस में इसे कीमा और सूखे मेवों से भरा जाता था, जबकि भारत में आकर यह आलू और मसालों से भरा शाकाहारी व्यंजन बन गया। आज भी कई शहरों में मटन समोसा अपनी अलग पहचान रखता है।
इसी तरह जलेबी का मूल नाम ‘ज़ुल्बिया’ या ‘जलाबिया’ है, जो आज भी ईरान में रमजान के दौरान खूब खाई जाती है। खाद्य इतिहासकार K.T. Achaya के अनुसार यह मिठाई फारसी व्यापारियों के माध्यम से भारत आई और स्थानीय स्वाद के साथ घुल-मिल गई।
बिरयानी और गुलाबजामुन की कहानी
भारत की शाही डिश मानी जाने वाली बिरयानी का संबंध भी फारस से जोड़ा जाता है। ‘बिरयानी’ शब्द फारसी ‘बिरियां’ से निकला है, जिसका अर्थ है ‘पकाने से पहले तलना’। इतिहासकार Lizzie Collingham के अनुसार मध्य एशिया और फारस से आए शासकों ने चावल और मांस के इस व्यंजन को भारतीय मसालों के साथ नया रूप दिया। हैदराबादी, लखनवी और मालाबार बिरयानी इसी मेल का उदाहरण हैं। ‘गुलाबजामुन’ भी फारसी प्रभाव से जुड़ा माना जाता है। ‘गुलाब’ शब्द फारसी ‘गुल’ (फूल) और ‘आब’ (पानी) से बना है। यह मिठाई मध्य-पूर्व की ‘लुकमत-अल-कादी’ से प्रभावित मानी जाती है, जिसे भारत में इलायची और केसर के साथ नया स्वाद मिला।
फैशन और कारीगरी में फारसी छाप
मुगल काल में फारसी मूल की महारानी नूरजहां ने लखनऊ में चिकनकारी को बढ़ावा दिया। बारीक जाल और फूलों की कढ़ाई वाली यह कला फारसी शैली से प्रेरित मानी जाती है। ‘ज़रदोजी’ शब्द खुद फारसी मूल का है। ‘ज़र’ यानी सोना और ‘दोजी’ यानी कढ़ाई। मुगल दरबार में सोने-चांदी के तारों से की जाने वाली यह कढ़ाई शाही परिधानों की पहचान बनी। सम्राट अकबर ने ईरान से बुनकरों को बुलाकर आगरा और कश्मीर में कालीन उद्योग को बढ़ावा दिया। फारसी कालीनों की जटिल डिजाइन आज भी भारतीय घरों और महलों की शान हैं।
शीशमहल और अत्तर की परंपरा
इत्र यानी अत्तर बनाने की परंपरा और कांच की खूबसूरत शीशियों का चलन भी फारसी संस्कृति से जुड़ा है। महलों में दिखाई देने वाली ‘शीश महल’ शैली दरअसल ईरान की ‘आयेने-कारी’ कला का भारतीय रूप है, जिसमें छोटे-छोटे दर्पणों से दीवारों को सजाया जाता है।
हिंदू परंपराओं में भी फारसी असर
भारत में मेहंदी और कांच की चूड़ियां आज सुहाग और श्रृंगार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। माना जाता है कि मेहंदी का प्रचलन प्राचीन भारत में था, लेकिन जालीदार और फ्लोरल ‘अरबिक-पर्शियन’ डिजाइन मुगल काल में लोकप्रिय हुए। आज भारत में शादी-ब्याह मेहंदी के बिना अधूरा माना जाता है। कांच की चूड़ियों को भारत में लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी नूरजहां को दिया जाता है। धीरे-धीरे यह हिंदू परंपराओं का अभिन्न हिस्सा बन गईं। माता की चौकी हो, करवा चौथ हो या विवाह, कांच की चूड़ियां सुहाग का प्रतीक मानी जाती हैं।
सदियों पुराना सांस्कृतिक संगम
इतिहासकारों का मानना है कि भारत और फारस के बीच यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि सदियों तक चले व्यापार, कला, भाषा और राजनीतिक संबंधों का नतीजा है। आज जब हम समोसा खाते हैं, जलेबी का स्वाद लेते हैं, बिरयानी का लुत्फ उठाते हैं या ज़रदोज़ी का लहंगा पहनते हैं, तो अनजाने में फारसी विरासत का हिस्सा बन जाते हैं। भारत और ईरान का यह सांस्कृतिक रिश्ता समय के साथ और भी गहरा हुआ है, जो आज भी हमारी जिंदगी में जीवंत रूप से मौजूद है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!
The ongoing geopolitical tensions involving Iran and the US-led coalition may have broader implications, according to Ukrainian President Volodymyr Zelenskyy. He has alleged that...
The highly anticipated song ‘Touch Buddy’ from the movie ‘Dacoit’ has officially been released, featuring renowned artists Pawan Singh, Jonita Gandhi, and Adivi Sesh....