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January 2, 2026

घाना के स्वयंभू पैगंबर ने टाली तथाकथित प्रलय: दान के पैसों से ख़रीदी मर्सिडीज़ !

The CSR Journal Magazine

 

मानवता के अंत की भविष्यवाणी, फिर टली ‘प्रलय’! दान के पैसों से ‘आधुनिक नाव’ के बजाय खरीदी गई लग्ज़री कार? क्रिसमस 2025 की चेतावनी, 2026 में नया दावा! घाना के स्वयंभू पैगंबर पर चंदे के दुरुपयोग का आरोप !

डर के सौदागर, आस्था की कीमत, भय की राजनीति

घाना में एक स्वयंभू पैगंबर द्वारा दुनिया के अंत की भविष्यवाणी और फिर उसके टल जाने का मामला इन दिनों अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में है। खुद को पैगंबर बताने वाले एबो नूह (Ebo Noah) ने दावा किया था कि क्रिसमस डे 2025 को पूरी दुनिया एक भयानक बाढ़ से नष्ट हो जाएगी। इस कथित प्रलय से बचने के लिए उन्होंने अपने अनुयायियों से आधुनिक ‘नूह की नाव’ (Ark) बनाने के नाम पर भारी मात्रा में चंदा इकट्ठा किया।

क्रिसमस बीत गया, प्रलय नहीं आई

जब तय तारीख पर न तो बाढ़ आई और न ही दुनिया का अंत हुआ, तो पैगंबर एबो नूह ने नई सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि ईश्वर की कृपा से मानवता को और समय दिया गया है और इसलिए सर्वनाश को टाल दिया गया है। उनका दावा है कि यह अतिरिक्त समय उन्हें अपने ‘आर्क प्रोजेक्ट’ को और विस्तार देने के लिए मिला है। एबो नूह ने यह भी कहा कि अब तक करीब 10 आधुनिक नावें बनाई जा चुकी हैं, जो भविष्य में आने वाली कथित आपदा के समय लोगों की जान बचाने का माध्यम बनेंगी। उन्होंने अपने समर्थकों से अपील की कि वे पहले से भी अधिक दान दें, ताकि बाकी नावों का निर्माण पूरा किया जा सके।

चंदे से मर्सिडीज खरीदने का आरोप

हालांकि, इस पूरे दावे के बीच एक बड़ा विवाद सामने आ गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पैगंबर पर आरोप है कि दान में मिली रकम का इस्तेमाल एक लग्ज़री मर्सिडीज बेंज कार खरीदने में किया गया, जिसकी कीमत करीब 74 हजार पाउंड (लगभग 78 लाख रुपये) बताई जा रही है। इससे उनके अनुयायियों और आम लोगों के बीच नाराज़गी बढ़ गई है। इस मामले के सामने आने के बाद कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या धार्मिक आस्था के नाम पर लोगों को डराकर चंदा इकट्ठा किया गया। स्थानीय स्तर पर इस बात की मांग तेज हो रही है कि दान की रकम के उपयोग की जांच हो और सच्चाई जनता के सामने लाई जाए।

प्रलय नहीं आई, सवाल जरूर खड़े हो गए

घाना के इस कथित पैगंबर का मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि भविष्यवाणियों और आस्था के नाम पर किए गए दावों पर आंख मूंदकर भरोसा करना कितना जोखिम भरा हो सकता है। जब प्रलय की भविष्यवाणी टल जाती है और चंदे से लग्ज़री गाड़ियों की खबरें सामने आती हैं, तो विश्वास के साथ-साथ जवाबदेही का सवाल भी खड़ा होता है।

आस्था, भय और ठगी की खतरनाक तिकड़ी

घाना के स्वयंभू पैगंबर एबो नूह का मामला कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह उस प्रवृत्ति का प्रतीक है, जहां आस्था को भय से जोड़ा जाता है और भय को कमाई का साधन बना लिया जाता है। दुनिया के अंत जैसी भविष्यवाणियां नई नहीं हैं, लेकिन हर बार जब तय तारीख गुजर जाती है और कुछ नहीं होता, तो सवाल भविष्यवाणी करने वालों पर नहीं, बल्कि उन हालात पर उठना चाहिए जो लोगों को ऐसे दावों पर विश्वास करने के लिए मजबूर करते हैं। प्रलय की चेतावनी देकर चंदा जुटाना और फिर उसके टल जाने पर “ईश्वरीय कृपा” का हवाला देना एक पुराना हथकंडा है। इससे भविष्यवाणी करने वाला खुद को गलत साबित होने से बचा लेता है और अनुयायियों से मिलने वाला आर्थिक सहयोग भी जारी रहता है। लेकिन जब यही धन आधुनिक नावों की जगह लग्ज़री कारों पर खर्च होने लगे, तो यह मामला आस्था का नहीं, सीधे-सीधे धोखे और नैतिक पतन का बन जाता है।

अंधविश्वास की नाव पर सवार समाज

इस तरह के प्रकरण समाज के लिए दोहरी चेतावनी हैं। पहली, अंधविश्वास और डर इंसान की विवेक शक्ति को कमजोर कर देते हैं। दूसरी, धार्मिक या आध्यात्मिक चोले में छिपे कुछ लोग इसी कमजोरी का फायदा उठाकर खुद को कानून और नैतिकता से ऊपर समझने लगते हैं। आज ज़रूरत इस बात की है कि लोग चमत्कारों और भविष्यवाणियों से ज़्यादा तर्क, विज्ञान और सवाल पूछने की आदत को महत्व दें। साथ ही, शासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि धार्मिक दान और ट्रस्टों की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए, ताकि आस्था के नाम पर ठगी का यह सिलसिला रोका जा सके। आस्था व्यक्ति को मजबूती देती है, लेकिन जब वही आस्था भय और लालच के साथ जुड़ जाए, तो वह शोषण का हथियार बन जाती है। एबो नूह का मामला इसी सच्चाई की कड़वी याद दिलाता है।
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