Farsa Wale Baba Death: फरसा वाले बाबा की मौत पर फिर योगी की यूपी में बवाल, सीएम का कानून पर कोई कंट्रोल नहीं

The CSR Journal Magazine
मथुरा में ‘फरसा वाले बाबा’ चंद्रशेखर की मौत ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ईद के दिन हुई इस घटना के बाद जिस तरह से हिंसा भड़की, हाईवे जाम हुआ और पुलिस पर हमला हुआ, उसने यह सवाल तेज कर दिया है कि क्या योगी आदित्यनाथ का कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है?

एक मौत और पूरा सिस्टम हिल गया

कोसीकलां इलाके में हुई इस घटना के बाद शुरुआत से ही स्थिति स्पष्ट नहीं रही। पुलिस जहां इसे हादसा बता रही है, वहीं स्थानीय लोग इसे हत्या करार दे रहे हैं। यही विरोधाभास हालात बिगाड़ने की सबसे बड़ी वजह बना। जब प्रशासन शुरुआती स्तर पर ही स्पष्टता नहीं दे पाता, तो अफवाहें और आक्रोश तेजी से फैलते हैं मथुरा में यही हुआ।

सड़क पर भीड़, सिस्टम बेबस

घटना के कुछ ही घंटों में दिल्ली-आगरा हाईवे जाम हो गया। हजारों लोग सड़क पर उतर आए और कई घंटों तक हालात बेकाबू रहे। सबसे बड़ा सवाल यही है क्या प्रशासन को पहले से अंदाजा नहीं था कि यह मामला संवेदनशील है? अगर था, तो फिर भीड़ को रोकने के लिए पहले से कोई ठोस इंतजाम क्यों नहीं किए गए?

पुलिस पर हमला: कानून का डर खत्म?

हालात तब और बिगड़ गए जब आक्रोशित भीड़ ने पुलिस और अधिकारियों पर पथराव शुरू कर दिया। सरकारी गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया गया, और पुलिस को खुद को बचाने के लिए पीछे हटना पड़ा।
यह दृश्य बताता है कि जमीनी स्तर पर कानून का डर कितना कमजोर हो चुका है—जहां भीड़ खुलकर पुलिस को चुनौती देती नजर आती है।

हर बार वही पैटर्न: घटना, बवाल, फिर बयान

योगी आदित्यनाथ ने मामले में सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, लेकिन यह प्रतिक्रिया नई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कई बार यही पैटर्न देखने को मिला है—पहले घटना होती है, फिर हालात बिगड़ते हैं, और उसके बाद सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है। सवाल यह है कि अगर सिस्टम मजबूत है, तो हालात बार-बार नियंत्रण से बाहर क्यों जाते हैं?

खुफिया और पुलिस तंत्र पर सवाल

मथुरा जैसी संवेदनशील जगह पर इस स्तर की हिंसा होना इस बात का संकेत है कि स्थानीय खुफिया तंत्र और पुलिस की तैयारियों में कमी है। अगर प्रशासन समय रहते सक्रिय होता, तो शायद हाईवे जाम, पथराव और हिंसा को रोका जा सकता था।

जमीनी हकीकत बनाम दावे

सरकार लगातार कानून-व्यवस्था में सुधार के दावे करती रही है, लेकिन इस घटना ने उन दावों की पोल खोल दी है। एक तरफ “सख्त प्रशासन” की छवि पेश की जाती है, वहीं दूसरी तरफ भीड़ का इस तरह बेकाबू होना उस छवि के विपरीत तस्वीर पेश करता है।

कंट्रोल का सवाल अब सीधा CM तक

मथुरा की यह घटना सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर शासन की क्षमता पर सवाल उठाती है। जब भीड़ कानून हाथ में लेती है, पुलिस पर हमला होता है और घंटों तक हालात नियंत्रण से बाहर रहते हैं, तो जिम्मेदारी आखिर किसकी बनती है? योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए यह एक और चेतावनी है कि कानून-व्यवस्था पर कंट्रोल सिर्फ दावों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले असर से तय होता है। और मथुरा की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
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