मणिकर्णिका घाट विवाद: एआई वीडियो, भ्रामक दावे और सियासी हलचल के बीच पुलिस का बड़ा एक्शन, दो सांसदों समेत आठ को नोटिस! सोशल मीडिया पोस्ट से पुलिस एक्शन तक- मणिकर्णिका घाट विवाद ने पकड़ा बड़ा रूप! आस्था, फर्जी वीडियो और राजनीति, मणिकर्णिका घाट विवाद बना विस्फोटक मुद्दा!

डिजिटल हमले में पवित्र काशी: मणिकर्णिका घाट गलत सूचना मामला बना राजनीतिक मुद्दा

देश-दुनिया में अपनी प्राचीन परंपरा, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के लिए विख्यात काशी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। लेकिन इस बार वजह श्रद्धा या उत्सव नहीं, बल्कि मणिकर्णिका घाट से जुड़ा एक बड़ा विवाद है, जिसने सोशल मीडिया से निकलकर कानून-व्यवस्था और राजनीति तक को हिला दिया है। काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर स्थित कुंभ महादेव मंदिर के वीडियो को मणिकर्णिका घाट का मंदिरबताकर वायरल किए जाने के मामले में कमिश्नरेट पुलिस ने दो सांसदों सहित कुल आठ लोगों को नोटिसजारी कर दिया है। पुलिस का कहना है कि यह मामला केवल गलत जानकारी का नहीं, बल्कि भ्रामक प्रचार, एआई-जनरेटेड कंटेंट और धार्मिक संवेदनशीलता से सीधे जुड़ा है।

क्या है मणिकर्णिका घाट और क्यों है इतना संवेदनशील?

मणिकर्णिका घाट काशी के सबसे प्राचीन और पवित्र घाटों में से एक है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यहां  अंतिम संस्कार होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह घाट सदियों से श्मशान परंपरा, तांत्रिक साधना और  आध्यात्मिक आस्था का केंद्र रहा है। ऐसे स्थल से जुड़ी किसी भी प्रकार की गलत जानकारी न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकती है, बल्कि सामाजिक तनाव भी पैदा कर सकती है। यही कारण है कि मणिकर्णिका घाट से जुड़ा हर विषय प्रशासन के लिए अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एक वीडियो तेजी से वायरल होने लगा। इस वीडियो में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में स्थित कुंभ महादेव मंदिर, उसके आसपास का क्षेत्र और कुछ कथित दावे दिखाए गए। वीडियो के साथ दावा किया गया कि यह मणिकर्णिका घाट का मंदिर है। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट/वीडियो में यह संकेत दिया गया कि मणिकर्णिका घाट के Redevelopment के नाम पर मूर्तियां हटाई/तोड़ दी गईं और घाट का मूल स्वरूप बदला जा रहा है। इन्हीं दावों ने भ्रम फैलाया। देखते ही देखते यह वीडियो फेसबुक, X (पूर्व ट्विटर), इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप ग्रुप्स पर तेजी से फैल गया।कमिश्नरेट पुलिस ने जब वीडियो की जांच कराई तो स्पष्ट हुआ कि वीडियो में दिखाया गया मंदिर मणिकर्णिका घाट का नहीं है। यह मंदिर काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर स्थित कुंभ महादेव मंदिर है जिसे वीडियो को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। पुलिस के अनुसार, इस तरह की पोस्ट से धार्मिक स्थलों को लेकर भ्रम फैलता है। प्रशासन पर अविश्वास बढ़ता है और असामाजिक तत्वों को माहौल बिगाड़ने का मौका मिलता है।

AI-जनरेटेड एडिटेड वीडियो का एंगल

जांच के दौरान यह आशंका भी सामने आई कि वीडियो या उसके कुछ हिस्से AI Generated हो सकते हैं। विजुअल्स को इस तरह एडिट किया गया कि आम व्यक्ति भ्रमित हो जाए। इसी कारण मामले में साइबर सेल, डिजिटल फॉरेंसिक टीम को भी शामिल किया गया है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि वीडियो किसने बनाया? किस तकनीक का इस्तेमाल हुआ और इसके पीछे मंशा क्या थी?

दो सांसदों सहित आठ लोगों को नोटिस

पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस भ्रामक वीडियो को बिना सत्यापन और जिम्मेदारी के बिना कई प्रभावशाली लोगों ने शेयर किया। इनमें दो वर्तमान सांसद, कुछ राजनीतिक-सामाजिक हस्तियां और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शामिल हैं। पुलिस ने सभी को नोटिस भेजकर पूछा है कि पोस्ट शेयर करने से पहले तथ्य क्यों नहीं जांचे गए? क्या किसी एजेंडे के तहत पोस्ट किया गया? क्या धार्मिक भावनाओं के प्रभाव पर विचार किया गया?

काशी जोन में अलर्ट, दो टीमें तैनात

मामले की गंभीरता को देखते हुए काशी जोन की दो विशेष पुलिस टीमें बनाई गई हैं। सोशल मीडिया पर 24×7 निगरानी की जा रही है। पुराने पोस्ट और वीडियो भी खंगाले जा रहे हैं। पुलिस का कहना है कि, “जो भी व्यक्ति आगे भ्रामक या झूठी सामग्री साझा करता पाया जाएगा, उस पर सख्त कार्रवाई होगी।”

मणिकर्णिका घाट मामले पर राजनीतिक संग्राम तेज: आमने-सामने आए दल, सियासत गरमाई

मणिकर्णिका घाट से जुड़े भ्रामक वीडियो और कुंभ महादेव मंदिर को गलत तरीके से मणिकर्णिका से जोड़ने के मामले ने अब राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। कमिश्नरेट पुलिस द्वारा दो सांसदों सहित आठ लोगों को नोटिस जारी किए जाने के बाद यह प्रकरण केवल प्रशासनिक या कानूनी विषय न रहकर सीधा राजनीतिक विवाद बन गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है, जबकि प्रशासन बार-बार स्पष्ट कर रहा है कि कार्रवाई का उद्देश्य केवल भ्रामक सूचना पर रोक लगाना है।

नोटिस के बाद भड़का राजनीतिक विवाद

जैसे ही दो सांसदों को नोटिस दिए जाने की सूचना सामने आई, राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई।  विपक्षी दलों ने इसे चयनित कार्रवाई करार दिया। कुछ नेताओं ने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट को आधार बनाकर जनप्रतिनिधियों को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं, सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि, “अगर कानून सबके लिए समान है, तो जनप्रतिनिधि इसके अपवाद नहीं हो सकते।”

विपक्ष का आरोप: ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला’

विपक्षी दलों ने इस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला और राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि संबंधित सांसदों ने केवल सोशल मीडिया पर सामने आई सामग्री साझा की। उनका उद्देश्य किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं था। कुछ नेताओं ने यहां तक कहा कि, “अगर प्रशासन ही यह तय करेगा कि कौन-सी पोस्ट सही और कौन-सी गलत, तो लोकतंत्र खतरे में पड़  जाएगा।”

सत्ता पक्ष का पलटवार: ‘अफवाह फैलाने की छूट नहीं’

सत्ता पक्ष के नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह मामला राजनीति का नहीं, जिम्मेदारी का है। मणिकर्णिका घाट जैसे संवेदनशील स्थल से जुड़ी गलत जानकारी गंभीर परिणाम ला सकती है। सत्ता पक्ष का कहना है कि, “सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स ज्यादा होने का मतलब यह नहीं कि कोई भी बिना सत्यापन कुछ भी पोस्ट कर दे। सांसद हों या आम नागरिक, नियम सभी पर लागू होते हैं।”

धार्मिक संगठनों की भी प्रतिक्रिया

मामले में धार्मिक संगठनों की भी एंट्री हो गई है। कुछ संत-महंतों ने भ्रामक वीडियो को काशी की परंपरा को ठेस पहुंचाने वाला बताया। वहीं कुछ ने पुलिस कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा कि इससे भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगेगी। हालांकि कुछ धार्मिक नेताओं ने यह भी मांग की कि राजनीतिक बयानबाजी से इस मामले को दूर रखा जाए

सोशल मीडिया पर लोगों के दो धड़े

राजनीतिक विवाद के साथ-साथ सोशल मीडिया भी दो खेमों में बंट गया है। एक वर्ग पुलिस की कार्रवाई को सही ठहरा रहा है। दूसरा वर्ग इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रहा है। हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं और दोनों ओर से वीडियो, पोस्ट और बयान सामने आ रहे हैं। वाराणसी पुलिस और जिला प्रशासन ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि नोटिस किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि भ्रामक और गलत सूचना साझा करने के आधार पर दिए गए हैं।प्रशासन का कहना है कि, “यह मामला राजनीतिक नहीं, कानूनी है। काशी की धार्मिक और सामाजिक शांति सर्वोपरि है।” राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यदि सांसदों की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला, या भ्रामक पोस्ट हटाई नहीं गई, तो मामला FIR या और सख्त कार्रवाई की ओर बढ़ सकता है, जिससे सियासी तापमान और बढ़ेगा।

आस्था बनाम राजनीतिक मुद्दा

मणिकर्णिका घाट विवाद अब धार्मिक आस्था बनाम डिजिटल जिम्मेदारी के साथ-साथ राजनीतिक शक्ति परीक्षण का रूप लेता जा रहा है। जहां एक ओर प्रशासन कानून के पालन पर जोर दे रहा है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल इसे अपने-अपने तरीके से भुनाने में जुट गए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह विवाद कानूनी दायरे में सिमटता है या राजनीतिक मंचों पर और गरमाता है।

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