डेनमार्क में रिन्यूएबल एनर्जी का नया मॉडल: हाईवे बनेंगे बिजली के पावरहाउस ! हाईवे किनारे लगे विंड टर्बाइन से बिजली उत्पादन, ऊर्जा खपत में कमी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को नई रफ्तार !
विंड पॉवर + ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर = मोबिलिटी
डेनमार्क एक बार फिर दुनिया के सामने रिन्यूएबल एनर्जी में नेतृत्व का उदाहरण पेश कर रहा है। पहले समुद्री और ऑनशोर विंड फार्म के लिए मशहूर रहा यह देश अब विंड पावर को ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। डेनमार्क में हाईवे और एक्सप्रेसवे के आसपास लगाए जा रहे पवन टर्बाइन अब सिर्फ बिजली उत्पादन का जरिया नहीं रह गए हैं, बल्कि रोड + पावर + मोबिलिटी को जोड़ने वाला एक एकीकृत सिस्टम बनते जा रहे हैं।
हाईवे के साथ पवन ऊर्जा का प्रयोग
डेनमार्क सरकार और ऊर्जा कंपनियों ने मिलकर एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें हाईवे के किनारे लगे विंड टर्बाइन सीधे ट्रांसपोर्ट नेटवर्क से जुड़े होते हैं। इन टर्बाइनों से बनने वाली बिजली का इस्तेमाल सड़क की लाइटिंग, ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम, टनल वेंटिलेशन और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) चार्जिंग स्टेशनों में किया जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हाईवे के आसपास हवा की गति अपेक्षाकृत स्थिर और तेज़ होती है, क्योंकि खुले इलाकों में पेड़ या इमारतों की बाधा कम होती है। इससे टर्बाइनों की एफिशिएंसी बढ़ती है और ऊर्जा उत्पादन में नुकसान (Energy Loss) कम होता है।
ऊर्जा नुकसान कम करने का तरीका
अब तक विंड फार्म से पैदा होने वाली बिजली को दूर स्थित ग्रिड तक ले जाना पड़ता था, जिससे ट्रांसमिशन लॉस होता था। लेकिन हाईवे के साथ लगे टर्बाइन उसी इलाके में बिजली का उपयोग संभव बनाते हैं।
डेनमार्क के इस मॉडल में-
• बिजली उत्पादन और खपत की दूरी कम होती है,
• ग्रिड पर दबाव घटता है,
• ऊर्जा भंडारण (Battery Storage) को भी सड़क किनारे विकसित किया जा रहा है! इससे न सिर्फ लागत घटती है, बल्कि सिस्टम ज्यादा भरोसेमंद भी बनता है।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को मिल रहा बढ़ावा
डेनमार्क में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में हाईवे पर Green Energy से चलने वाले EV चार्जिंग स्टेशन भविष्य की जरूरत बन चुके हैं। पवन ऊर्जा से चार्ज होने वाले ये स्टेशन कार्बन उत्सर्जन को लगभग शून्य तक लाने में मदद कर रहे हैं। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि आने वाले वर्षों में ट्रकों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को भी इसी ग्रीन एनर्जी नेटवर्क से जोड़ा जाएगा, जिससे सड़क परिवहन पूरी तरह टिकाऊ (Sustainable) बन सके।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को फायदा
इस योजना से डेनमार्क को दोहरा लाभ मिल रहा है। एक ओर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आ रही है, वहीं दूसरी ओर ऊर्जा आयात पर निर्भरता घट रही है। स्थानीय स्तर पर बिजली उत्पादन से रोजगार भी पैदा हो रहे हैं और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा मिल रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि डेनमार्क का यह प्रयोग दुनिया के कई देशों के लिए मिसाल बन सकता है, खासकर उन देशों के लिए जहां सड़क नेटवर्क तेजी से फैल रहा है। अगर भारत जैसे देश इस मॉडल को अपनाते हैं, तो हाईवे सिर्फ यातायात के रास्ते नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा के गलियारे बन सकते हैं।
दुनिया के लिए Sustainability का मॉडल
डेनमार्क का यह नया प्रयोग साफ दिखाता है कि भविष्य की योजना में अलग-अलग सेक्टरों को अलग नहीं, बल्कि एक इंटीग्रेटेड सिस्टम के रूप में देखना होगा। रोड, पावर और मोबिलिटी का यह संगम न केवल ऊर्जा संकट का समाधान है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने का भी एक मजबूत हथियार बनता जा रहा है।
आज के समय में यह मॉडल क्यों ज़रूरी है?
आज दुनिया एक साथ तीन बड़ी चुनौतियों से जूझ रही है। ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन और बढ़ता परिवहन दबाव! ऐसे समय में डेनमार्क का Road + Power + Mobility मॉडल बेहद प्रासंगिक बन जाता है।
ऊर्जा की बढ़ती मांग
इलेक्ट्रिक वाहनों, स्मार्ट सिटी और डिजिटल ट्रैफिक सिस्टम के कारण बिजली की जरूरत लगातार बढ़ रही है। अगर यह बिजली पारंपरिक कोयला या तेल से बनेगी, तो प्रदूषण और खर्च दोनों बढ़ेंगे। हाईवे से जुड़ी पवन ऊर्जा सीधे उसी जगह बिजली उपलब्ध कराती है, जहां उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
कार्बन उत्सर्जन में कटौती
परिवहन क्षेत्र दुनिया में कार्बन उत्सर्जन का बड़ा स्रोत है। जब सड़क की लाइटिंग, ट्रैफिक सिस्टम और EV चार्जिंग पवन ऊर्जा से चलते हैं, तो डीज़ल-पेट्रोल पर निर्भरता घटती है और जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना आसान होता है।
ऊर्जा नुकसान (Transmission Loss) में कमी
दूर-दराज के पावर प्लांट से बिजली लाने में बड़ा नुकसान होता है। हाईवे के आसपास लगे टर्बाइन Local Generation–Local Use का मॉडल अपनाते हैं, जिससे सिस्टम ज्यादा कुशल और सस्ता बनता है।
भविष्य की तैयारी
आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक कार, बस और ट्रक आम होंगे। उनके लिए ग्रीन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है। यह मॉडल पहले से ही उस भविष्य की नींव रखता है।अंत में, यह मॉडल सतत विकास और आर्थिक मजबूती दोनों को जोड़ता है। इससे आयातित ईंधन पर निर्भरता घटती है, स्थानीय रोजगार बढ़ते हैं और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है। यही कारण है कि आज के समय में यह मॉडल केवल एक प्रयोग नहीं, बल्कि भविष्य की अनिवार्यता बन चुका है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

