आजादी की लड़ाई पर फिर छिड़ी बहस! अजीत डोभाल के बयान से इतिहास और राजनीति आमने-सामने! आजादी की राह पर बहस में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ बनाम INA, राजनीति भी हुई मुखर !
आजादी की विरासत पर टकराव: डोभाल के बयान के बाद राजनीति में उबाल
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अज़ीत डोभाल के एक हालिया बयान ने भारत की आज़ादी के इतिहास पर नई बहस को गति दे दी है। डोभाल के कथित बयान में कहा गया कि 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में जितना महत्वपूर्ण समझा जाता है, वह अकेले स्वतंत्रता की दिशा तय करने वाला कारण नहीं था और स्वतंत्रता में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फ़ौज (INA) जैसे तत्वों की भूमिका पर भी गंभीर विचार होना चाहिए। इस टिप्पणी के बाद इतिहासकारों, राजनेताओं और जनता के बीच तीखी चर्चा शुरू हो गई है। डोभाल के बयान को उद्धृत करते हुए समर्थकों का कहना है कि दूसरे विश्व युद्ध, आजाद हिंद फ़ौज की सक्रियता और ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर असंतोष ने ब्रिटिश सत्ता पर गंभीर दबाव डाला था, जिससे उनकी औपनिवेशिक नीति कमजोर पड़ी। इस दृष्टिकोण के अनुसार आईएनए की गतिविधियां और उससे जुड़े लालकिले के मुक़दमे ने साम्राज्य की मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डाला और भारत की आज़ादी की प्रक्रिया को तेज़ किया।
भारत की आज़ादी किसी एक व्यक्ति, संगठन या आंदोलन की देन नहीं
दूसरी ओर, आलोचक इस तरह के दावे को इतिहास को एक पक्षीय दृष्टिकोण में बदलने का प्रयास मानते हैं। उनका तर्क है कि भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ समाज के सभी वर्गों को एकजुट किया तथा व्यापक असहयोग और नागरिक अवज्ञा ने शासन-व्यवस्था को अस्थिर कर दिया था। यह आंदोलन देश के कई हिस्सों में प्रशासनहीनता और विरोध की लहर के रूप में उभरा, जिसने ब्रिटिश सरकार को लंबे समयतक शासन करना कठिन बना दिया। इतिहासकार भी यह स्वीकार करते हैं कि भारत की आज़ादी किसी एक व्यक्ति, संगठन या आंदोलन की देन नहीं है। इसके पीछे एक लंबा संघर्ष रहा जिसमें 1919 के असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियां और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वैश्विक स्थितियों का मिश्रित प्रभाव रहा है। यही विविध धारणाएं अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत की आज़ादी के निर्णय तक पहुंचीं।
डोभाल के बयान से राजनीतिक हलचल
राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर जारी इस बहस का एक पक्ष यह भी कहता है कि इतिहास को सिर्फ़ एक कहानी में संकुचित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उस समय के सामाजिक, राजनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को समग्र रूप से समझना ज़रूरी है। आलोचकों का यह भी कहना है कि दावे अक्सर ओरल ट्रेंडिंग पोस्ट या सोशल मीडिया पर देखते ही ऐतिहासिक तथ्य मान लिए जाते हैं, जबकि वास्तविक इतिहास मान्य ऐतिहासिक शोध और दस्तावेज़ों पर आधारित होता है।
याद रखें हज़ारों शहीदों की शहादत
अंत में यह बहस इस बात पर भी प्रकाश डालती है कि स्वतंत्रता-संग्राम की कहानियों को याद करते समय सभी योगदानों को सम्मान दिया जाए, चाहे वह गांधी- नेतृत्व वाला सविनय अवज्ञा आंदोलन हो, नेताजी का सशस्त्र संघर्ष हो, या देश भर में हजारों अनाम सपूतों का बलिदान। प्रत्येक धार भारतीय आज़ादी की बड़ी तस्वीर का हिस्सा हैं और यही विविध संघर्ष मिलकर भारत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में मददगार रहे।
आजादी की विरासत पर बयान से सियासी हलचल; अलग-अलग दलों की तीखी और मिश्रित प्रतिक्रियाएं
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के बयान के बाद भारत की आज़ादी के इतिहास को लेकर छिड़ी बहस अब पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुकी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने इस मुद्दे पर अपने-अपने दृष्टिकोण रखे हैं, जिससे स्वतंत्रता संग्राम की विरासत एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गई है।कांग्रेस और विपक्षी दलों ने बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे महात्मा गांधी और भारत छोड़ोआंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका को कम करके दिखाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी और यह स्वतंत्रता की दिशा में निर्णायक मोड़ साबित हुआ। विपक्ष का आरोप है कि आज़ादी के इतिहास को “चुनिंदा नज़रिए से दोबारा लिखने” का प्रयास किया जा रहा है, जो देश की साझा विरासत के लिए खतरनाक है।
अजित डोभाल के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा- सत्ता पक्ष
सत्ता पक्ष और उससे जुड़े विचारधारा समर्थक नेताओं का कहना है कि अजित डोभाल के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। उनका तर्क है कि यह बयान किसी एक आंदोलन को नकारने के लिए नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज के योगदान को उचित सम्मान देने की बात करता है। उनके अनुसार लंबे समय तक सशस्त्र संघर्ष और सैन्य विद्रोहों की भूमिका को इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिला।
वामपंथी और क्षेत्रीय दलों का मत
वामपंथी दलों ने इस बहस पर संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि स्वतंत्रता संग्राम को “एक आंदोलन बनाम दूसरे आंदोलन” के रूप में देखना ऐतिहासिक भूल होगी। उनका कहना है कि मजदूर आंदोलनों, किसान संघर्षों और जन-आंदोलनों ने भी ब्रिटिश शासन पर निरंतर दबाव बनाया, जिसे किसी एक धारा तक सीमित नहीं किया जा सकता। क्षेत्रीय दलों ने भी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। कुछ नेताओं ने कहा कि आज़ादी की लड़ाई में देश के हर क्षेत्र और समाज का योगदान रहा है, इसलिए इतिहास को व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए संकीर्ण बहस में बदला जाना चाहिए।
भारत की आज़ादी को लेकर बनी साझा सहमति पर फिर उठे प्रश्न !
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान राजनीति और वैचारिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार आज़ादी की कहानी को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं नई नहीं हैं, लेकिन चुनावी दौर में ऐसे बयान अक्सर अधिक संवेदनशील और विवादास्पद हो जाते हैं। कुल मिलाकर, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट है कि भारत की आज़ादी को लेकर बनी साझा सहमति पर फिर से प्रश्न उठ रहे हैं। हालांकि अधिकांश दल इस बात पर सहमत दिखते हैं कि स्वतंत्रता किसी एक नेता या आंदोलन की देन नहीं, बल्कि बहुस्तरीय संघर्षों और बलिदानों का परिणाम थी और इसी संतुलित समझ को बनाए रखना समय की ज़रूरत है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!
Veteran actress and politician Hema Malini has responded to recent speculation regarding a possible conflict within her family. The 77-year-old actress refuted claims suggesting...
The 8th Central Pay Commission has officially commenced its work, generating optimism among central government employees and pensioners regarding potential salary and pension adjustments....
UP CM Yogi Japan Visit: जापान दौरे पर पहुंचे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक को लेकर Yamanashi Prefecture के साथ...