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January 28, 2026

उत्तराखंड की रूपकुंड झील में मिले सैकड़ों मानव कंकाल आज भी एक रहस्य, जानें इनके पीछे की लोककथाएं, वैज्ञानिक शोध और अनसुलझे सवाल

The CSR Journal Magazine
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित रूपकुंड झील में पाए गए 600-800 मानव कंकालों के पीछे छिपा है सैकड़ों सालों पुराना रहस्य, जिसे वैज्ञानिक और शोधकर्ता अब तक पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में समुद्र तल से लगभग 5,029 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड झील अपने किनारे बिखरे मानव कंकालों के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। 1942 में वन अधिकारी एच.के. मधुवाल ने पहली बार झील में बर्फ के बीच पड़े मानव अवशेषों को देखा था। इसके बाद वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं ने सदियों से इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश की।

कंकालों के पीछे की कहानियां

लोककथाओं में कहा जाता है कि ये अवशेष कन्नौज के राजा यशोधवल, उनकी गर्भवती रानी बलम्पा और उनके सेवकों के हैं, जो नंदा देवी की तीर्थयात्रा के दौरान देवी के क्रोध का शिकार हुए थे। स्थानीय गीत और शिलालेख इस घटना का जिक्र करते हैं। इसके अलावा, कुछ कंकाल भारतीय सैनिकों या महामारी के शिकार लोगों से जुड़े होने के भी अनुमान हैं।

वैज्ञानिक अध्ययन ने खोली नई सच्चाई

2019 में हुए पांच वर्षीय अध्ययन में यह पाया गया कि झील में मिले कंकाल आनुवंशिक रूप से विभिन्न समूहों के थे। उनकी मौतों के बीच लगभग 1,000 वर्षों का अंतर था। कुछ अवशेष 800 ईस्वी के आसपास के हैं, जबकि अन्य 1800 ईस्वी तक पुराने हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि सभी मौतें किसी एक ही आपदा का परिणाम नहीं थीं।

कंकालों की मौत का रहस्य

अध्ययन में अधिकांश कंकालों के सिर पर क्रिकेट-बॉल के आकार के चोट के निशान पाए गए। शरीर के बाकी हिस्सों पर चोटें नहीं थीं, जिससे यह अनुमान लगाया गया कि इनकी मौत भयंकर ओलावृष्टि या भारी बर्फ के टुकड़ों से हुई होगी। इन अवशेषों में पुरुष, महिलाएं और वृद्ध शामिल हैं, लेकिन बच्चों के कंकाल नहीं मिले।

जेनेटिक विविधता और विदेशी मूल

कुछ कंकाल दक्षिण एशियाई लोगों के हैं, जबकि अन्य के जेनेटिक्स यूरोप के पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र, जैसे क्रीट, से मिलते-जुलते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इनमें से कुछ तीर्थयात्रियों के अवशेष हो सकते हैं। यह सवाल अब भी अनसुलझा है कि यूरोप और दक्षिण एशिया के लोग इतनी ऊंचाई पर स्थित झील तक कैसे पहुंचे।

ट्रेकिंग और पर्यटन

रूपकुंड झील अली और बेदनी बुग्याल के रास्ते से होकर गुजरने वाले ट्रेकर्स के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थल है। मई से अक्टूबर तक यात्रा करने का सबसे अच्छा समय माना जाता है। इस दौरान झील की बर्फ पिघलने पर कंकाल दिखाई देने लगते हैं। ट्रेकर्स को प्लास्टिक का उपयोग न करने और स्थानीय नियमों का पालन करने की सलाह दी जाती है।

प्राकृतिक और ऐतिहासिक महत्व

रूपकुंड झील न केवल प्राकृतिक सुंदरता का उदाहरण है, बल्कि यह मानव इतिहास, विज्ञान और लोककथाओं का संगम भी है। झील में बिखरे कंकाल पुराने जलवायु घटनाओं और हिमस्खलन के पैटर्न की जानकारी भी प्रदान करते हैं।
रूपकुंड झील केवल एक हिमनदी झील नहीं, बल्कि सदियों पुराने रहस्यों और पहाड़ों में छिपी त्रासदियों का प्रतीक है। चाहे आप ट्रेकिंग प्रेमी हों या इतिहास और रहस्य के शोधकर्ता, रूपकुंड झील की कहानी हर किसी को रोमांच और विस्मय में डाल देती है।
आज रूपकुंड झील पहले जैसी बर्फ से ढकी नहीं दिखती। जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर पिघलने से झील का जलस्तर घट गया है। गर्मियों में बर्फ हटते ही झील के आसपास पत्थर, मलबा और कुछ मानव अवशेष नजर आते हैं। प्रशासन ने क्षेत्र को संवेदनशील घोषित कर ट्रेकिंग पर सख्त नियम लगाए हैं। झील अब भी रहस्यमयी बनी हुई है।
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