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January 8, 2026

बॉडी इमेज डिस्ट्रेस: ‘दिखावे’ की झूठी ज़िंदगी का युवा मन पर पड़ता अदृश्य मानसिक बोझ ! 

The CSR Journal Magazine

 

आज का युवा पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वासी, जागरूक और तकनीक-संपन्न माना जाता है, लेकिन इसी के साथ वह एक गहरे मानसिक संकट से भी जूझ रहा है- बॉडी इमेज डिस्ट्रेस। यह वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने शरीर के  आकार, रंग, वजन, बनावट या रूप-रंग को लेकर असंतोष, शर्म, डर या हीनभावना महसूस करता है। यह समस्या केवल शारीरिक नहीं, बल्कि गहराई से मानसिक और भावनात्मक है।

जब आईने से नज़रें चुराने लगे युवा

आज की युवा पीढ़ी बाहरी तौर पर जितनी आत्मविश्वासी दिखाई देती है, भीतर से उतनी ही असुरक्षित भी होती जा रही है। सोशल मीडिया, चमकती स्क्रीन और परफेक्ट दिखने की होड़ के बीच एक गंभीर मानसिक समस्या तेजी से उभर रही है- ‘Body Image Distress’ ! यह केवल सुंदर दिखने की चाह नहीं, बल्कि खुद को स्वीकार न कर पाने की पीड़ा है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, आज बड़ी संख्या में युवा अपने शरीर को लेकर तनाव, शर्म और आत्मग्लानि से गुजर रहे हैं, लेकिन इस पर खुलकर बात नहीं हो पा रही।

बॉडी इमेज डिस्ट्रेस: एक मानसिक स्वास्थ्य मुद्दा

बॉडी इमेज डिस्ट्रेस उस मानसिक स्थिति को कहते हैं, जिसमें व्यक्ति अपने शरीर के आकार, वजन, रंग,  ऊंचाई या बनावट को लेकर लगातार नकारात्मक सोच में डूबा रहता है। यह सोच धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन को कमजोर कर देती है। व्यक्ति अपने शरीर के बारे में लगातार बुरा महसूस करता है, चाहे दूसरों को उसमें कोई कमी न दिखे। यह वज़न, त्वचा, बाल, या शरीर के आकार जैसी चीजों पर केंद्रित हो सकता है।

बॉडी इमेज डिस्ट्रेस के लक्षण

  • अत्यधिक चिंता: अपने रूप-रंग (जैसे मुंहासे, पतले बाल, नाक का आकार) को लेकर बहुत ज़्यादा परेशान रहना।
  • आईने में देखना: बार-बार आईने में देखना, खुद को जांचना, या अपनी कथित खामियों को छिपाने की कोशिश करना।
  • सामाजिक अलगाव: दोस्तों और सामाजिक मेल-जोल से बचना क्योंकि लोग क्या सोचेंगे, इसका डर होता है।
  • दोहराव वाले व्यवहार: बार-बार सज-धज करना, त्वचा को छूना या खुद को तसल्ली देना, जो घंटों तक चल सकता है।
  • आत्म-सम्मान में कमी: आत्मविश्वास की कमी और खराब मानसिक स्वास्थ्य।
यह समस्या अक्सर डिप्रेशन, एंग्जायटी और ईटिंग डिसऑर्डर का रूप ले लेती है।

युवा पीढ़ी सबसे ज़्यादा प्रभावित-डिजिटल दुनिया का मनोवैज्ञानिक दबाव

आज का युवा दिन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर बिताता है। इंस्टाग्राम, रील्स और शॉर्ट वीडियो में दिखने वाली “परफेक्ट बॉडी” एक अवास्तविक मानक स्थापित करती है। फिल्टर और एडिटिंग से बनी तस्वीरें यह भ्रम पैदा करती हैं कि “अगर आप ऐसे नहीं दिखते, तो आप कमतर हैं।” यह सोच मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है।

शारीरिक छवि कैसे बनती है?

नकारात्मक BI या शारीरिक छवि एक निश्चित समयावधि में कई कारकों का परिणाम होता है। इनमें शामिल हो सकते हैं:

 

सोशल मीडिया संस्कृति

सोशल मीडिया के सभी रूपों ने युगों से, कुछ प्रकार के शारीरिक लक्षणों को सफलता या खुशी से जुड़े होने के रूप में बढ़ावा दिया है। ये संदेश अक्सर लोगों द्वारा अनजाने में आत्मसात कर लिए जाते हैं, जिससे अवास्तविक/पूर्ण मानकों पर खरा उतरने का दबाव पैदा होता है। सोशल मीडिया अक्सर सभी महिलाओं को सुडौल, पुरुषों को लंबा या मांसल, एक निश्चित रंग या शरीर के प्रकार को प्राथमिकता देने को बढ़ावा देता है।

परिवार और मित्र

परिवार के सदस्य और मित्र नकारात्मक या सकारात्मक दोनों तरह से BI के बारे में किसी की धारणा को प्रभावित करते हैं। परिवार के लोग बच्चे के वजन को लेकर चिढ़ाते हैं या उसका मज़ाक उड़ाते हैं, या उसके शारीरिक रूप-रंग पर आकस्मिक टिप्पणी या टिप्पणी करते हैं। वे एक स्वस्थ शरीर की छवि का मॉडल भी बना सकते हैं, अपने शरीर से संतुष्ट हो सकते हैं, स्वस्थ आदतें विकसित कर सकते हैं, और मीडिया द्वारा निर्धारित अवास्तविक अपेक्षाओं को संदर्भ भी दे सकते हैं। किसी भी तरह से, हमारे आस-पास के लोगों की हमारे BI के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

शारीरिक परिवर्तन

बीमारी या गर्भावस्था जैसे कारक भी शरीर के बारे में व्यक्ति की धारणा को बदल सकते हैं। लड़कियों में समय से पहले यौवन आना और लड़कों में देर से यौवन आना किशोरावस्था में शरीर से असंतुष्टि से संबंधित पाया गया है।

बॉडी मास इंडेक्स और आनुवंशिकी

कम या उच्च BMI का संबंध शरीर से असंतुष्टि से पाया गया है। आनुवंशिक कारक भी बीआई के निर्माण में भूमिका निभाते हैं।

लाइक-कमेंट से जुड़ा आत्मसम्मान

आज आत्ममूल्य का पैमाना बन चुका है- कितने लाइक्स मिले? कितनी तारीफ हुई? अगर प्रतिक्रिया कम मिलती है तो युवा इसे अपनी शक्ल या शरीर की कमी मान लेते हैं। धीरे-धीरे आत्मसम्मान दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर हो जाता है। फिल्मों, विज्ञापनों और फैशन इंडस्ट्री में एक खास तरह की बॉडी को ही सफलता और सुंदरता से जोड़ा जाता है। इससे युवा मन में यह धारणा बनती है कि, “अच्छा दिखना ही सब कुछ है।” यह मानसिक दबाव युवाओं को खुद से दूर करता चला जाता है।

घर से शुरू होने वाला मानसिक दबाव

कई बार बॉडी इमेज डिस्ट्रेस की जड़ें परिवार में होती हैं। “वजन बढ़ गया है”, “इतने दुबले क्यों हो”, “रंग थोड़ा और साफ होता तो…” ये बातें मज़ाक में कही जाती हैं, लेकिन युवा मन इन्हें आजीवन याद रखता है।

लड़कियां और बॉडी इमेज डिस्ट्रेस

लड़कियों पर सुंदर दिखने का सामाजिक दबाव कहीं अधिक होता है। पतली कमर, बेदाग त्वचा, परफेक्ट फिगर- इन अपेक्षाओं के चलते कई युवतियां अत्यधिक डाइटिंग, खाना छोड़ने और खुद से नफरत करने जैसी मानसिक स्थितियों में फंस जाती हैं, जो आगे चलकर गंभीर मानसिक बीमारियों में बदल सकती हैं।

लड़कों की अनकही पीड़ा

बॉडी इमेज डिस्ट्रेस केवल लड़कियों की समस्या नहीं है। आज के लड़के भी मसल्स, सिक्स पैक, ऊंचाई को लेकर गहरे मानसिक दबाव में हैं। कई युवा स्टेरॉइड्स और गलत सप्लीमेंट्स का सहारा लेते हैं, जिससे मानसिक और शारीरिक दोनों स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं।

तुलना की संस्कृति और मानसिक थकान

आज तुलना हर पल हो रही है- दोस्तों से, सेलिब्रिटी से, यहां तक कि अजनबियों से भी! यह लगातार तुलना युवा मन को थका देती है और आत्मस्वीकृति की भावना को खत्म कर देती है।

मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में कदम, बॉडी पॉजिटिविटी और आत्मस्वीकृति

हर शरीर अलग है। स्वस्थ होना, खुश रहना और खुद को स्वीकार करना ही असली सुंदरता है। युवाओं को यह समझना जरूरी है कि ऑनलाइन तस्वीरें वास्तविक नहीं होतीं! तुलना से आत्मसम्मान कमजोर होता है। इसमें परिवार और शिक्षा संस्थानों की भूमिका भी अहम होती हैं। बच्चों की तुलना न करें, शरीर पर टिप्पणी से बचें और सबसे ज़रूरी बात- मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत करें! 

मदद लेना कमजोरी नहीं

काउंसलिंग, थेरेपी और बातचीत मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाती है। समय पर मदद लेना जीवन को बेहतर बना सकता है। बॉडी इमेज डिस्ट्रेस आज की युवा पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है। यह समस्या दिखती कम है, लेकिन असर गहरा छोड़ती है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति यह समझना ज़रूरी है कि- परफेक्ट बॉडी नहीं, परफेक्ट सोच ज़रूरी है। क्योंकि जब युवा खुद को स्वीकार करना सीखेंगे, तभी एक स्वस्थ समाज का निर्माण संभव होगा।
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