रील्स का शोर, बनारस की गलियां और बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की धुन- धरोहर और संस्कृति की जिंदा पहचान

The CSR Journal Magazine

शहनाई की गूंज में काशी की अद्भुत यात्रा

काशी, जिसे अब रीलबाजों के शहर के रूप में देखा जा रहा है, एक समय ऐसा भी था जब यह कला और संगीत की महक से भरी रहती थी। सड़कें कभी सुनसान और शांति से भरी थीं, लेकिन अब भीड़ और शोर ने इसकी पहचान बदल दी है। आज हम आपको एक ऐसी जगह की यात्रा पर ले चलते हैं, जहां एक पुरानी शहनाई बिस्मिल्लाह खां की छवि को जीवित रखती है। यह वही धुन है जिसने न केवल काशी, बल्कि पूरे भारत को अपनी कला से मंत्रमुग्ध कर दिया था।

धरोहर की तोड़-फोड़

काशी की गलियों में चलते हुए अक्सर ऐसी जगहों का सामना होता है जहां धरोहर टूट रही है। दीवारों पर दरारें और पुरानी इमारतें इस शहर की कला और संस्कृति की कहानी बयां करती हैं। लेकिन क्या आज की पीढ़ी इस धरोहर को बचा पाएगी? यहाँ एक दीवार पर लिखा हुआ संदेश ‘भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां’ हमें उस समय की याद दिलाता है जब इस शहनाई की गूंज दुनियाभर में सुनाई दे रही थी। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और बनारस एक-दूसरे के पर्याय थे, जहाँ उनकी शहनाई की धुन काशी विश्वनाथ मंदिर और गंगा घाटों की जीवंत संस्कृति में रची-बसी थी। उन्होंने अपनी सादगी और गंगा-जमुनी तहजीब के साथ संगीत साधना की, और विदेशी प्रस्तावों को ठुकराकर जीवन भर बनारस में ही अपनी कला समर्पित की।

बिस्मिल्लाह खान और बनारस का अनूठा संबंध

बिस्मिल्लाह खान ने हमेशा बनारस (काशी) को अपना घर माना और गंगा किनारे अपनी साधना जारी रखी। उन्होंने यह कहकर विदेश जाने से इनकार कर दिया था कि “विदेश में मेरी गंगा कहाँ से लाओगे?” वे भोर में बालाजी घाट पर मां गंगा का पूजन करते और काशी विश्वनाथ मंदिर में मंगला आरती से पहले अपनी शहनाई की धुन से बाबा विश्वनाथ को जगाया करते थे। शिया मुसलमान होने के बावजूद, वे हिंदू संस्कृति से गहराई से जुड़े थे, जो बनारस की सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करता है। भले ही वे भारत रत्न से सम्मानित थे, वे बनारस की गलियों में एक साधारण जीवन जीते थे। वे मुहर्रम के दौरान ताजिया के आगे शहनाई बजाकर शोक भी व्यक्त करते थे।
 शहनाई का जादू और काशी का रंग
बिस्मिल्लाह खां की शहनाई ने न केवल भारतीय संगीत को अपनाया, बल्कि इसे एक नया आयाम भी दिया। काशी के घाटों पर खड़ी एक पुरानी सी शहनाई अब भी अपने धुनों के कारण लोगों को खींचती है। यह वह शहनाई है जो हर किसी के दिल में बसी हुई है। जब भी यह धुन सुनाई देती है, काशी की गलियां उस अद्भुत संगीत में खो जाती हैं।उनकी विरासत आज भी बनारस की तंग गलियों और संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित है।

संगीत और सामाजिक परिवर्तनों का संगम

आज भी, बनारस की गलियों में संगीत का अहसास है, लेकिन क्या वह पहले जैसा है? रील्स के चलते लोग भले ही उस संगीत को भूल जाएं, लेकिन बिस्मिल्लाह खां की शहनाई के सुर अब भी इन दीवारों के प्राचीर में गूंजते हैं। यह संगीत केवल आनंद ही नहीं देता, बल्कि एक पहचान भी बनाता है। क्या हम इस धरोहर को बचा पाएंगे? यह एक गंभीर सवाल है।

काशी की सांस्कृतिक महत्ता

बनारस न केवल धार्मिक महत्त्व रखता है, बल्कि इसकी कला और संस्कृति भी इसे अद्वितीय बनाती है। यहां का संगीत, खासकर बिस्मिल्लाह खां की शहनाई, दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह संगीत केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि एक अनुभव के लिए है। जब कोई भी व्यक्ति इस संगीत को सुनता है, वह अपने अंदर के भारतीय स्व को ढूंढ लेता है।

नयी पीढ़ी की जिम्मेदारी

आज की युवा पीढ़ी के पास एक बड़ी जिम्मेदारी है। क्या वे इस अद्भुत विरासत को जिंदा रख पाएंगे? रील्स के बीच फंसे इस अद्भुत शहर में अब भी वो स्थान है जहां बिस्मिल्लाह खां की शहनाई सुनाई देती है। पुराने समय की यादें, जो हर गली में बसी हुई हैं, हमें प्रेरित करती हैं कि हम अपनी संस्कृति और धरोहर को संजोए रखें।

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