हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द! अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर नाबालिग पीड़िता की सुरक्षा को लेकर अदालत की गंभीर चिंता ! सुप्रीम कोर्ट ने किया जमानत आदेश में प्रासंगिक तथ्यों की अनदेखी पर सवाल! आरोपी की रिहाई से गवाहों को प्रभावित करने की जताई आशंका ! POCSO मामलों में कठोर जमानत मानकों की आवश्यकता पर न्यायालय की टिप्पणी!
‘जमानत यांत्रिक नहीं हो सकती’-शीर्ष अदालत की दो टूक
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में जमानत को लेकर एक बार फिर सख़्त और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा एक POCSO (Protection Of Children From Sexual Offences) अधिनियम के मामले में आरोपी को दी गई जमानत को रद्द करते हुए कहा कि जमानत न तो औपचारिकता में रोकी जानी चाहिए और न ही ऐसे आधारों पर दी जानी चाहिए जो मामले से असंगत हों। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवनकी पीठ ने पीड़िता/शिकायतकर्ता की अपील स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने जमानत देते समय अपराध की गंभीरता, पीड़िता की सुरक्षा और उपलब्ध साक्ष्यों जैसे अहम पहलुओं की अनदेखी की, जिससे न्याय की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
मामले की पृष्ठभूमि: क्या है पूरा मामला
अभियोजन के अनुसार, आरोपी पीड़िता को पहले से जानता था। आरोप है कि उसने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर छह महीने तक एक नाबालिग लड़की के साथ बार-बार दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न किया।इतना ही नहीं, यह सब कथित तौर पर देशी कट्टे (अवैध पिस्तौल) की धमकी देकर किया गया और यौन कृत्यों का मोबाइल फोन से वीडियो रिकॉर्डिंग कर उसे ब्लैकमेल किया गया। पीड़िता की शिकायत पर 2 दिसंबर 2024 को FIR दर्ज हुई, हालांकि शुरुआती स्तर पर पुलिस की ओर से कथित हिचकिचाहट भी सामने आई। ट्रायल कोर्ट (सेशंस कोर्ट) ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बावजूद, अप्रैल 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी। इसके बाद पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और यह भी आरोप लगाया कि जमानत पर छूटने के बाद आरोपी गांव में उसे डराने-धमकाने लगा, जिससे उसकी मानसिक स्थिति और बिगड़ गई।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को “विकृत (Perverse), अविवेकपूर्ण और प्रासंगिक सामग्री की अनदेखी पर आधारित” बताया। अदालत ने कहा, “यह स्थापित कानून है कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाने से जमानत पर विचार करना अपने आप बंद नहीं हो जाता। लेकिन जमानत पर निर्णय लेते समय अदालत का कर्तव्य है कि वह अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता और जांच में एकत्र सामग्री पर समुचित ध्यान दे।” पीठ ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि यह मामला नाबालिग के साथ बार-बार किए गए गंभीर यौन अपराधों से जुड़ा है, जो न केवल पीड़िता के जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित करता है बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा को भी झकझोर देता है।
State of Bihar v. Rajballav Prasad (2017)
अदालत ने इस तथ्य को बेहद महत्वपूर्ण माना कि आरोपी और पीड़िता एक ही इलाके में रहते हैं। बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) की काउंसलिंग रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़िता गहरे डर और मानसिक तनाव में है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “आरोपी की रिहाई के बाद उसकी मौजूदगी से पीड़िता को वास्तविक और आसन्न खतरे की आशंका है। ऐसे मामलों में गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना एक गंभीर चिंता का विषय होती है। पीड़िता की सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई की पवित्रता सर्वोपरि है।” इस संदर्भ में अदालत ने State of Bihar v. Rajballav Prasad (2017) के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें यौन अपराधों में पीड़ित की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी।
जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का संतुलित सिद्धांत
अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराया, “जमानत को यांत्रिक तरीके से अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन उसे अप्रासंगिक कारणों या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी करके भी नहीं दिया जा सकता।” यदि कोई जमानत आदेश तथ्यों की गलत व्याख्या पर आधारित हो, महत्वपूर्ण पहलुओं को नज़रअंदाज़ करता हो या न्याय के साथ अन्याय करता हो, तो सुप्रीम कोर्ट को उसमें हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है।
उदाहरण से समझिए अदालत की मंशा
मान लीजिए किसी साधारण चोरी के मामले में आरोपी पहली बार अपराध करता है, साक्ष्य कमजोर हैं और गवाहों पर असर डालने की संभावना नहीं है। ऐसे में जमानत उचित हो सकती है। लेकिन नाबालिग के साथ यौन शोषण, वह भी हथियार की धमकी और ब्लैकमेलिंग के साथ, न केवल गंभीर अपराध है बल्कि इसमें पीड़िता की सुरक्षा सीधे तौर पर दांव पर होती है। ऐसे मामलों में सिर्फ यह कहना कि “चार्जशीट दाखिल हो चुकी है” या “आरोपी लंबे समय से जेल में है”, पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए आदेश दिया कि आरोपी दो सप्ताह के भीतर संबंधित न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करे।
POCSO मामलों में जमानत की शर्तें कठोर होनी चाहिए
POCSO मामलों में जमानत की शर्तें सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में कहीं अधिक कठोर होनी चाहिए, क्योंकि इन अपराधों का सीधा संबंध बच्चों की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा से होता है। बच्चों के साथ यौन अपराध केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं होते, बल्कि वे पूरे समाज की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी को चुनौती देते हैं। ऐसे मामलों में यदि आरोपी को जमानत दी जाती है और उस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रहता, तो यह पीड़ित बच्चे के लिए दोबारा डर, दबाव और मानसिक आघात का कारण बन सकता है, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका रहती है।
दोषी को तड़ीपार करने का प्रावधान होना ज़रूरी
अधिकांश POCSO मामलों में आरोपी पीड़ित का परिचित, रिश्तेदार, पड़ोसी या शिक्षक होता है, जिससे जमानत के बाद पीड़ित को डराने-धमकाने, समझौते का दबाव बनाने या गवाही बदलवाने का वास्तविक खतरा बना रहता है। इसलिए जमानत की शर्तों में यह अनिवार्य होना चाहिए कि आरोपी पीड़ित से शारीरिक, सामाजिक और डिजिटल, तीनों स्तरों पर पूरी तरह दूर रहे। पीड़ित के निवास क्षेत्र में प्रवेश पर रोक, किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क पर प्रतिबंध और उल्लंघन की स्थिति में तत्काल जमानत निरस्तीकरण जैसी शर्तें बच्चों की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका
कठोर जमानत शर्तें साक्ष्यों और गवाहों की रक्षा के लिए भी जरूरी हैं। POCSO मामलों में डिजिटल साक्ष्य, जैसे मोबाइल फोन, वीडियो या चैट, अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं और आरोपी के बाहर रहने पर इनके साथ छेड़छाड़ का जोखिम बढ़ जाता है। नियमित पुलिस निगरानी, थाने में हाजिरी, पासपोर्ट जमा कराना और बिना अनुमति क्षेत्र छोड़ने पर रोक जैसी शर्तें यह सुनिश्चित करती हैं कि आरोपी न्यायिक प्रक्रिया से भाग न सके और साक्ष्य सुरक्षित रहें।
POCSO मामलों में पीड़िता की सुरक्षा सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि POCSO जैसे गंभीर मामलों में जमानत देते समय अदालतों को पीड़ित की सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। जमानत यांत्रिक तरीके से न दी जाए और न ही ऐसी शर्तों पर दी जाए जो केवल औपचारिक हों। कठोर और प्रभावी शर्तें ही यह संतुलन बना सकती हैं कि एक ओर आरोपी के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहें और दूसरी ओर बच्चे को भयमुक्त वातावरण में न्याय मिल सके। इसलिए यह कहना उचित होगा कि POCSO मामलों में जमानत यदि दी जाए, तो वह सख़्त, स्पष्ट और पीड़ित-केंद्रित शर्तों के साथ ही दी जानी चाहिए।
पीड़ित की सुरक्षा और निष्पक्ष ट्रायल सर्वोपरि
यह फैसला न केवल POCSO मामलों में बल्कि समग्र रूप से जमानत कानून के लिए एक मजबूत संदेश है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि न्याय का संतुलन आरोपी के अधिकारों और पीड़िता की सुरक्षा- दोनों के बीच होना चाहिए। खासकर बच्चों से जुड़े यौन अपराधों में अदालतों से अपेक्षा की जाती है कि वे संवेदनशीलता, सतर्कता और कानून की मंशा के अनुरूप निर्णय लें, ताकि पीड़ित को दोबारा मानसिक आघात न झेलना पड़े और न्याय प्रक्रिया पर समाज का विश्वास बना रहे।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

