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February 6, 2026

कभी ‘हर हर महादेव’ से गूंजता कैलाश यात्रा मार्ग अब वीरान, 500 धर्मशालाएं बन गईं खंडहर

The CSR Journal Magazine

कभी कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जिस 400 किलोमीटर लंबे रास्ते पर हजारों श्रद्धालु पैदल चलते थे, अब वह मार्ग दिन-ब-दिन सिमटता जा रहा है। कई जगहों पर यह रास्ता नई सड़कों में समा चुका है, तो कई हिस्से जंगलों में खो गए हैं। कैलाश मानसरोवर तिब्बत (चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र) में स्थित है।

सदियों पुरानी धर्मशालाएं बदल गईं खंडहरों में

कभी इन रास्तों पर करीब 500 धर्मशालाएं बनी थीं, जहां भक्त और व्यापारी विश्राम करते थे। आज इनमें से ज्यादातर इमारतें या तो जर्जर हो चुकी हैं या पूरी तरह टूट चुकी हैं। कुछ जगहों पर ही इनकी मौजूदगी नजर आती है।

पैदल यात्रा का था ये एकमात्र रास्ता

एक समय था जब कुमाऊं क्षेत्र में सड़कें नहीं थीं और यात्रियों को हल्द्वानी से होते हुए पिथौरागढ़ तक पैदल जाना पड़ता था। वहां से अस्कोट, धारचूला, गुंजी होते हुए लिपुलेख दर्रे से तिब्बत में प्रवेश होता था। यह मार्ग धार्मिक के साथ-साथ सांस्कृतिक महत्व भी रखता था।

सड़कें बनीं, पुराना रास्ता गुम होता गया

1960 में पहली सड़क पिथौरागढ़ तक बनी और फिर 1970 में टनकपुर से तवाघाट तक राष्ट्रीय राजमार्ग तैयार हुआ। इन सड़कों से लोग धारचूला तक वाहन से पहुंचने लगे और पैदल यात्रा छोटी होती गई। बाद में नजंग तक भी सड़क बन गई, जिससे परंपरागत रास्ता और सिमट गया।

2020 के बाद तो इतिहास बन गया पैदल मार्ग

2020 में सड़क को सीधे लिपुलेख दर्रे तक जोड़ दिया गया। अब दिल्ली से सीधा वाहन वहां तक पहुंच सकता है। नतीजा यह हुआ कि पूरा पुराना पैदल मार्ग लगभग बंद हो गया। कई हिस्सों में अब सिर्फ निशान ही बचे हैं।

यात्रियों के लिए बनी धर्मशालाओं की कहानी

दारमा घाटी के दातू गांव की जसुली देवी ने इस मार्ग पर धर्मशालाएं बनवाई थीं। अपने पति की मृत्यु के बाद उन्होंने सारी संपत्ति यात्रियों की सेवा में लगा दी। काठगोदाम से पिथौरागढ़ और नेपाल तक उन्होंने ठहरने की व्यवस्था कराई थी।

अब गिने-चुने ही बचे उनके निशान

करीब 1900 के आसपास बनीं ये धर्मशालाएं अब उपयोग नहीं होने के कारण खंडहर बनने लगी हैं। हालांकि कनालीछीना के सतगढ़ गांव की धर्मशाला आज भी अच्छी हालत में है। पिथौरागढ़-चंडाक मार्ग की एक धर्मशाला का हाल ही में पुनर्निर्माण हुआ है।

धार्मिक नहीं, ये है सांस्कृतिक धरोहर भी

विशेषज्ञों का कहना है कि यह मार्ग केवल यात्रा का रास्ता नहीं बल्कि एक विरासत है। यह रास्ता सदियों से हजारों लोगों की आस्था और संस्कृति को जोड़ता रहा है और इसे संरक्षित करना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इसे जान सकें।

पांच पड़ावों में पूरी होती थी यात्रा

आधार शिविर धारचूला से वाहन के जरिए यात्री नजंग पहुंचते थे, वहां से मालपा, बूंदी, छियालेख, गर्ब्यांग और फिर गुंजी तक यात्रा करते थे। अंतिम पड़ाव नाविढांग से यात्री लिपुलेख पार कर तिब्बत पहुंचते थे।

कभी बिना रुकावट होती थी यात्रा

1962 से पहले कैलाश मानसरोवर की यात्रा बिना किसी बाधा के होती थी। व्यापारी भी तिब्बत स्थित तकलाकोट से भारत की गुंजी मंडियों में सामान लाते ले जाते थे। युद्ध के बाद यात्रा और व्यापार दोनों बंद हो गए, लेकिन फिर 1981 में यात्रा और 1992 में व्यापार बहाल हुआ।

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