भारत को झींगा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से एक्वाकल्चर विशेषज्ञ डॉ. मनोज ने ऐसा समग्र रोडमैप प्रस्तुत किया है, जो निर्यात-केंद्रित सोच से आगे बढ़कर घरेलू बाजार, पोषण सुरक्षा और किसानों की आय पर समान रूप से जोर देता है। इस विजन में झींगा पालन को कृषि नीति के दायरे में लाने, फसल बीमा जैसी सुरक्षा उपलब्ध कराने, झींगे को सुलभ प्रोटीन स्रोत के रूप में बढ़ावा देने तथा पूरे देश के लिए एक समान ‘यूनिफाइड लैंड लीज पॉलिसी’ लागू करने की मांग शामिल है, ताकि तटीय ही नहीं बल्कि अंतर्देशीय राज्यों में भी एक्वाकल्चर का संतुलित और टिकाऊ विकास संभव हो सके और भारत हरित व श्वेत क्रांति की तरह एक ऐतिहासिक ‘नीली क्रांति’ की ओर अग्रसर हो।
निर्यात से आगे घरेलू थाली तक- झींगा पालन को नई दिशा देता डॉ. मनोज का विजन
भारत आज विश्व के प्रमुख झींगा उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। समुद्री खाद्य निर्यात से हर वर्ष देश को हजारों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। इसके बावजूद एक बड़ा सवाल लगातार उठता रहा है- क्या भारत अपने ही देश में झींगा जैसे उच्च पोषणयुक्त खाद्य पदार्थ का समुचित उपयोग कर पा रहा है? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने और देश को झींगा उत्पादन में वास्तविक आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने के लिए एक्वाकल्चर विशेषज्ञ डॉ. मनोज ने एक व्यापक और दूरदर्शी रोडमैप प्रस्तुत किया है, जिसे नीति विशेषज्ञ भारत की संभावित अगली ‘नीली क्रांति’ का आधार मान रहे हैं।
निर्यात आधारित मॉडल की सीमाएं
वर्तमान समय में भारत में उत्पादित झींगे का बड़ा हिस्सा अमेरिका, यूरोप, जापान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को निर्यात किया जाता है। यह मॉडल विदेशी मुद्रा तो लाता है, लेकिन इसके कुछ गंभीर नकारात्मक पहलू भी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग, कीमतों में उतार-चढ़ाव और आयातक देशों की सख्त गुणवत्ता शर्तें- इन सबका सीधा असर भारतीय किसानों पर पड़ता है। डॉ. मनोज का मानना है कि केवल निर्यात पर निर्भरता किसानों को असुरक्षित बनाती है और घरेलू बाजार की उपेक्षा दीर्घकालीन रूप से नुकसानदायक है।
घरेलू बाजार: एक विशाल लेकिन उपेक्षित संभावना
भारत की जनसंख्या, पोषण आवश्यकताएं और बदलती खाद्य आदतें घरेलू झींगा बाजार को अपार संभावनाओं से भरपूर बनाती हैं। शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में प्रोटीन की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन झींगा अब भी आम थाली तक नहीं पहुंच पाया है। डॉ. मनोज का सुझाव है कि झींगे को लक्ज़री फूड से निकालकर सामान्य प्रोटीन स्रोत के रूप में स्थापित किया जाए, ताकि इसकी मांग देश के भीतर भी स्थिर और टिकाऊ बन सके।
झींगा पालन को कृषि नीति में शामिल करने की जरूरत
डॉ. मनोज के रोडमैप का केंद्रीय बिंदु है झींगा पालन को विधिवत कृषि गतिविधि का दर्जा देना ! आज भी कई राज्यों में एक्वाकल्चर को न तो पूर्ण कृषि माना जाता है और न ही उद्योग। इस अस्पष्ट स्थिति के कारण झींगा किसान फसल बीमा से वंचित रहते हैं, प्राकृतिक आपदाओं में भारी नुकसान उठाते हैं, बैंकों से सस्ती दरों पर ऋण नहीं ले पाते! डॉ. मनोज का कहना है कि जब सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है, तो एक्वाकल्चर को कृषि नीति के केंद्र में लाना अपरिहार्य है।
फसल बीमा: झींगा किसानों के लिए सुरक्षा कवच
झींगा पालन में रोग, जल गुणवत्ता, मौसम और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े जोखिम हमेशा बने रहते हैं। इसके बावजूद झींगा किसानों के लिए कोई व्यापक बीमा ढांचा मौजूद नहीं है। डॉ. मनोज फसल बीमा की तर्ज पर झींगा बीमा योजना लागू करने की मांग करते हैं, जिससे-
• किसानों का जोखिम कम हो,
• छोटे किसान भी इस क्षेत्र में निवेश कर सकें,
• उत्पादन में स्थिरता आए!
कुपोषण के खिलाफ झींगा: एक प्रभावी समाधान
भारत आज भी कुपोषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है, खासकर बच्चों और महिलाओं में प्रोटीन की कमी व्यापक है। झींगा पोषण के लिहाज से अत्यंत समृद्ध है। यह उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, आयरन और कैल्शियम का उत्कृष्ट स्रोत है। डॉ. मनोज का प्रस्ताव है कि झींगे को मिड-डे मील, आंगनवाड़ी और सार्वजनिक वितरण और पोषण योजनाओं से जोड़ा जाए। उनका मानना है कि इससे कुपोषण उन्मूलन के प्रयासों को नई ताकत मिलेगी।
यूनिफाइड लैंड लीज पॉलिसी: विकास की कुंजी
एक्वाकल्चर के विस्तार में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है- भूमि पट्टे की असमान नीतियां। हर राज्य के अलग नियम होने से न निवेश स्थिर रहता है, न किसान निश्चिंत हो पाते हैं। डॉ. मनोज पूरे देश के लिए एक ‘यूनिफाइड लैंड लीज पॉलिसी’ की मांग करते हैं, जिससे-
• दीर्घकालीन निवेश संभव हो,
• निजी और सहकारी मॉडल विकसित हों,
• अंतर्देशीय राज्यों में भी एक्वाकल्चर को बढ़ावा मिले!
इनलैंड एक्वाकल्चर से बदलेगा ग्रामीण भारत
डॉ. मनोज का विजन केवल तटीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। उनका जोर इनलैंड एक्वाकल्चर पर है, जिससे बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ग्रामीण युवाओं को स्थानीय रोजगार मिल सके और किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर मिल सकते हैं। इससे ग्रामीण पलायन भी कम होगा। वे मानते हैं कि यदि यह रोडमैप लागू होता है, तो यह हरित क्रांति (अनाज उत्पादन) और श्वेत क्रांति (दुग्ध क्षेत्र) की तरह ही नीली क्रांति को जन्म देगा। यह क्रांति केवल उत्पादन नहीं, बल्कि पोषण, रोजगार और आत्मनिर्भरता का प्रतीक होगी।
नीति निर्धारकों के लिए स्पष्ट संदेश
डॉ. मनोज का रोडमैप सरकार के लिए एक अवसर है। एक ऐसा अवसर, जिससे भारत झींगा उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकता है। किसानों के लिए सुरक्षित और नागरिकों के लिए पोषण-संपन्न बन सकता है। अब यह नीति निर्माताओं पर निर्भर है कि वे इस विजन को कागज़ से ज़मीन तक कैसे उतारते हैं। डॉ. मनोज का यह दृष्टिकोण केवल एक्वाकल्चर सुधार का सुझाव नहीं, बल्कि भारत के खाद्य भविष्य की रूपरेखा है। यदि इसे गंभीरता से अपनाया गया, तो आने वाले वर्षों में झींगा भारत की थाली, किसान की आय और देश की अर्थव्यवस्था- तीनों को मजबूत करेगा।
कृषि नीति, पोषण सुरक्षा और झींगा पालन- भारत में नीली क्रांति की दस्तक
भारत विश्व के अग्रणी झींगा निर्यातक देशों में शामिल है, लेकिन देश के भीतर झींगे का उपभोग सीमित रहना एक विरोधाभास है। कुपोषण और प्रोटीन की कमी से जूझते देश के लिए यह आवश्यक है कि झींगे को केवल निर्यात की वस्तु नहीं, बल्कि सुलभ पोषण स्रोत के रूप में देखा जाए। इस संदर्भ में एक्वाकल्चर विशेषज्ञ डॉ. मनोज द्वारा प्रस्तुत रोडमैप समय की मांग को दर्शाता है। झींगा पालन को कृषि नीति के दायरे में लाने, किसानों को फसल बीमा जैसी सुरक्षा देने और घरेलू बाजार को मजबूत करने की उनकी मांग तार्किक और दूरदर्शी है। इसके साथ ही पूरे देश के लिए एक समान यूनिफाइड लैंड लीज पॉलिसी की आवश्यकता, तटीय ही नहीं बल्कि अंतर्देशीय राज्यों में भी एक्वाकल्चर के विस्तार का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
यदि नीति-निर्माता इस विजन को गंभीरता से अपनाते हैं, तो झींगा उत्पादन न केवल किसानों की आय बढ़ाएगा, बल्कि पोषण सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार को भी मजबूती देगा। यही वह आधार है, जिस पर भारत की अगली ऐतिहासिक नीली क्रांति खड़ी हो सकती है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!
The Directorate General of Civil Aviation (DGCA) has announced new safety protocols in response to a pronounced rise in aviation incidents across the country....
The Election Commission (EC) of India and the State Election Commissions (SECs) have reached a consensus to align the legislative frameworks governing panchayat and...