सबरीमाला मामले में केंद्र का बड़ा हलफनामा: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “अदालतें धार्मिक आस्था तय नहीं कर सकतीं”

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सबरीमाला मामले में केंद्र का हलफनामा, कहा- आस्था पर नहीं कर सकतीं अदालतें फैसला

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर विवाद गरमा गया है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद में आज एक नया और महत्वपूर्ण मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की संविधान पीठ के समक्ष केंद्र सरकार ने अपना ताजा हलफनामा पेश किया है। सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अदालतों को धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं के औचित्य पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई आज से शुरू की और केंद्र सरकार ने अपना हलफनामा पेश किया। केंद्र का कहना है कि इस मामले में धार्मिक आस्था और विश्वास पर अदालतें निर्णय नहीं कर सकतीं। यह विधायक विषय है और इस पर विचार करना कोर्ट का काम नहीं है।

आस्था बनाम अदालत

 केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि धार्मिक प्रथाओं की ‘अनिवार्यता’ (Essentiality) तय करना समुदाय की आंतरिक आस्था का विषय है। अदालतों को यह परिभाषित नहीं करना चाहिए कि किसी धर्म के लिए क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं। हलफनामे में जोर दिया गया कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक ‘लिंग आधारित भेदभाव’ नहीं है। यह भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ (शाश्वत ब्रह्मचारी) स्वरूप और मंदिर की विशिष्ट परंपरा से जुड़ा मामला है। सरकार ने कहा कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ का उपयोग सदियों पुराने रीति-रिवाजों को खत्म करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि वे अमानवीय या अनैतिक न हों। केंद्र ने दलील दी कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में हर पंथ की अपनी अलग मान्यताएं हैं। अनुच्छेद 25 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।

2018 का अदालत का मूल फैसला

अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला सबरीमाला मंदिर के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से यह फैसला सुनाया था।कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं (रजस्वला आयु) के मंदिर में प्रवेश पर लगे सदियों पुराने प्रतिबंध को हटा दिया। कोर्ट ने कहा कि महिलाएं किसी भी आयु में मंदिर जा सकती हैं। बहुमत के फैसले में कहा गया कि जैविक कारणों (Biological reasons) के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। कोर्ट ने माना कि हिंदू धर्म की सभी महिलाओं को अपनी आस्था प्रकट करने और पूजा करने का समान अधिकार है। किसी विशेष आयु वर्ग को रोकना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ (जो उस बेंच का हिस्सा थे) ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि महिलाओं को अपवित्र मानना पितृसत्तात्मक सोच का हिस्सा है, जिसे आधुनिक समाज और संविधान में जगह नहीं दी जा सकती।

इकलौता असहमति वाला फैसला

दिलचस्प बात यह है कि बेंच की एकमात्र महिला जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा, बहुमत के फैसले से सहमत नहीं थीं। उन्होंने अपने अलग फैसले में कहा था कि अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है और कौन सी नहीं। ‘समानता’ की अवधारणा को धार्मिक आस्था के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। अगर कोई समुदाय अपनी परंपराओं को मानता है, तो उसे तब तक नहीं बदला जाना चाहिए जब तक कि वह अमानवीय न हो।

फैसले के बाद महिलाओं की प्रतिक्रिया

इस फैसले के खिलाफ केरल और पूरे देश में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। श्रद्धालुओं का तर्क था कि यह मंदिर के देवता ‘भगवान अयप्पा’ के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप का अपमान है। इसी विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट में दर्जनों पुनर्विचार याचिकाएं (Review Petitions) दायर की गईं, जिनकी सुनवाई अब 9 जजों की बड़ी बेंच कर रही है। सबरीमाला मामले में महिलाओं की प्रतिक्रियाएं हमेशा से दो ध्रुवों (दो अलग-अलग विचारधाराओं) में बंटी रही हैं। जहाँ एक पक्ष इसे ‘समानता के अधिकार’ के रूप में देखता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे ‘धार्मिक परंपरा’ के संरक्षण से जोड़ता है।

मंदिर प्रवेश और समानता का समर्थन करने वाली महिलाएं

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और युवा महिलाओं के एक वर्ग ने 2018 के फैसले का पुरजोर स्वागत किया था। इनका तर्क है कि मासिक धर्म (Menstruation) के आधार पर महिलाओं को ‘अपवित्र’ मानना और उन्हें ईश्वर की भक्ति से रोकना अपमानजनक है। तृप्ति देसाई (भूमाता ब्रिगेड) जैसी कार्यकर्ताओं ने इसे महिलाओं की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की बड़ी जीत बताया था। सोशल मीडिया पर महिलाओं ने मासिक धर्म से जुड़ी रूढ़ियों को तोड़ने के लिए बड़े स्तर पर “हैप्पी टू ब्लीड’ (Happy to Bleed) कैंपेन अभियान चलाया था।

परंपरा और विश्वास का समर्थन करने वाली महिलाएं

केरल और देश के अन्य हिस्सों में लाखों महिला श्रद्धालुओं ने 2018 के फैसले का कड़ा विरोध किया। ‘रेडी टू वेट’ (Ready to Wait) अभियान इस मामले का सबसे चर्चित आंदोलन था। इसमें हजारों महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर कहा कि वे 50 वर्ष की आयु पार करने तक इंतजार करने को तैयार हैं, क्योंकि वे मंदिर की ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ परंपरा का सम्मान करती हैं। इन महिलाओं का तर्क है कि सबरीमाला में प्रवेश का मामला ‘लिंग भेद’ का नहीं बल्कि ‘देवता की प्रकृति’ का है। उनका मानना है कि श्रद्धा और परंपरा को कानूनी तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए। कई महिला श्रद्धालुओं ने बेंच की एकमात्र महिला जज इंदु मल्होत्रा के उस फैसले का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अदालतों को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

केरल में ‘महिला दीवार’ (Women’s Wall)

जनवरी 2019 में, केरल सरकार के समर्थन से लाखों महिलाओं ने कासरगोड से तिरुवनंतपुरम तक लगभग 620 किमी लंबी ‘मानव श्रृंखला’ (Women’s Wall) बनाई थी। इसका उद्देश्य लैंगिक समानता और पुनर्जागरण मूल्यों का समर्थन करना था। संक्षेप में कहें तो, एक तरफ वे महिलाएं हैं जो संवैधानिक समानता को सर्वोपरि मानती हैं, और दूसरी तरफ वे ‘भक्त’ महिलाएं हैं जो धार्मिक रीति-रिवाजों और आस्था को अपनी पहचान मानती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का ध्यान

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत के नेतृत्व वाली 9-जजों की बेंच इस समय उन पुनर्विचार याचिकाओं (Review Petitions) पर सुनवाई कर रही है, जिन्होंने 2018 के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।इस सुनवाई में सबरीमाला मंदिर की परंपरा के साथ ही महिलाओं के अधिकारों का भी जिक्र किया जाएगा। केंद्र की इस दलील ने फिर से इस मुद्दे को गरमा दिया है।

सुनवाई का महत्व

अदालत अब इस कानूनी पहलू पर विचार कर रही है कि क्या ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ और ‘समानता के अधिकार’ के बीच कोई टकराव है, और क्या न्यायपालिका को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए। इस सुनवाई का परिणाम न केवल सबरीमाला मंदिर के लिए बल्कि पूरे देश के धार्मिक स्थलों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसमें महिलाओं के धार्मिक अधिकारों और उनके प्रति समाज की सोच के बारे में भी चिंतन होगा। सभी की नजरें अब इस सुनवाई पर टिकी हैं।

क्या बदल सकता है कानून?

अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अपने निर्णय में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव लाता है तो यह भारतीय संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश को लेकर इससे आगे और क्या कुछ हो सकता है, यह देखने वाली बातें होंगी।

महिलाओं के अधिकार और आस्था

महिलाएं अब अपने हक के लिए आवाज उठाने लगी हैं। यह सुनना दिलचस्प होगा कि अदालतें इस मामले में क्या निर्णय देती हैं। केंद्र का निष्कर्ष स्पष्ट है, लेकिन महिलाओं का न्याय का जो सवाल है, वो अब अदालतों के समक्ष है।

आस्था या कानून: आगे का रास्ता

इस मुद्दे के सहारे भारत में धार्मिक आस्था और कानूनी अधिकारों के बीच संघर्ष को अभिव्यक्त किया जा सकता है। सार्वजनिक जीवन में आस्था और कानून के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। इस जटिलता में कानूनी दृष्टिकोण को भी समझने की आवश्यकता है।

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