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March 2, 2026

‘बस 10 मिनट चाहिए’…19 साल के लड़के ने दी ऐसी दलील, सुप्रीम कोर्ट में जीता केस

The CSR Journal Magazine

सपने को सच करने की ठानी

मध्य प्रदेश के 19 साल के लड़के, अथर्व चतुर्वेदी ने NEET EWS कोटे के तहत MBBS एडमिशन पाने के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय में एक ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS प्रावधान न होने के तर्क को खारिज करते हुए अथर्व के पक्ष में फैसला सुनाया। अथर्व, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS कैटेगरी से आते हैं, ने दो बार नीट परीक्षा पास की थी, लेकिन फिर भी उन्हें एडमिशन नहीं मिला।

कानूनी लड़ाई का ऐतिहासिक सफर

अथर्व को ऐसा महसूस हुआ कि निजी कॉलेजों में EWS कोटे का कोई प्रावधान नहीं होने के कारण उन्हें न्याय नहीं मिल रहा था। उन्होंने पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, फिर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। यहां उन्होंने अपनी बात खुद रखी। शुरुआत में अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन अथर्व ने हार नहीं मानी।

सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा- मांगे 10 मिनट

अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा, “मुझे सिर्फ 10 मिनट का समय चाहिए।” यह शब्द सुनकर जस्टिस हैरान रह गए क्योंकि ये शब्द एक 12वीं पास लड़के के थे, जो अपनी केस की पैरवी कर रहा था। न्यायालय ने उनकी बात सुनी और मामला संज्ञान में लिया।

बातचीत का असर

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत ने मामले की सुनवाई की। अथर्व ने बताया कि राज्य सरकार ने EWS कोटे को लागू नहीं किया, जबकि वे सक्षम छात्र हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नीतिगत कमी की वजह से छात्रों को नुकसान नहीं होना चाहिए। अदालत ने अथर्व की बातों पर गौर करते हुए मान लिया कि केवल यह कारण पर्याप्त नहीं है कि राज्य ने आरक्षण की अधिसूचना जारी नहीं की।

ऐतिहासिक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिए कि EWS वर्ग के योग्य छात्रों को 2025-26 सत्र के लिए प्रोविजनल MBBS एडमिशन दिया जाए। इसके साथ ही अथर्व को भी 2025-26 सत्र के लिए एडमिशन देने का आदेश दिया गया। राज्य सरकार को इस मामले में जल्दी से कॉलेज आवंटित करने के निर्देश दिए गए हैं।

आगे का रास्ता

अथर्व चतुर्वेदी का यह केस सिर्फ एक लड़के की नहीं, बल्कि लाखों छात्रों की आवाज बना है। यह निर्णय न केवल उनके लिए, बल्कि उन सभी छात्रों के लिए उम्मीद का नया रास्ता खोलेगा, जो आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी से आते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे यह फैसला अन्य छात्रों पर असर डालता है।

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