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फसल के लिए पसीना और हक़ के लिए बहाया खून

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पैरों में छाले थे, हाथों में लाल झंडा था, टोपी भी लाल, लाल सलाम करते हुए किसान पग पग आगे बढ़ रहे थे, हौसले बुलंद थे और मांगें तमाम थी, सरकार पर  विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि  सरकार क्या इनके  सामने झुकेगी और क्या इनकी तमाम मांगें मान ली जाएँगी, क्योंकि इसके पहले भी दो बार अन्नदाता किसान सरकार से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर चुकी थी।  लेकिन इस बार किसानों के ना सिर्फ हौसले बुलंद थे बल्कि कुछ कर गुजरने का माद्दा रखने की चाहत थी। शायद यही कारन है कि इस बार सरकार ने इन अन्नदाताओं की ना सिर्फ बात सुनी बल्कि इनकी तमाम मांगों को मान भी लिया गया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यहाँ ये उठता है कि आखिरकार सरकार को कुम्भकर्णी नींद से जगाने  के लिए छह दिन का वक़्त क्यों लगा, इसे सरकार की नाकामी ही कहेंगे कि किसान छह दिन का लंबा संघर्ष कर नासिक से मुंबई पहुँचता है और फिर सरकार हरकत में आती है, शायद देवेंद्र फडणवीस सरकार के हाथ पैर इसलिए फूल गए क्योंकि सभी विपक्षी पार्टियों का समर्थन इस किसान रैली को मिल गया और लगातार ये रैली मीडिया और सोशल मीडिया में सुर्खियां बटोरने लगी।  लगभग 200  किलोमीटर पैदल चल कर मुंबई पहुंचे हजारों किसानों के लॉन्ग मार्च ने एक अभूतपूर्व शांतिपूर्ण आंदोलन की मिसाल पेश की, सोशल मीडिया लाल झंडों, लाल कमीजों और लाल टोपी और हंसिया हथौड़ा का बिल्ला टांगे इन किसानों की तस्वीरों से अटा पड़ा रहा, प्रमुख समाचार वेबसाइटों और कुछ टीवी समाचार चैनलों में भी इन दृश्यों को बड़ी तेजी से देखा जाने लगा, लेकिन मुंबई की सड़कों पर बहते इस लाल सागर के नजदीक पहुंचते ही कई और तस्वीरें हमें भारत के उस वंचित नागरिक की व्यथा भी दिखलाती हैं जिसे हम अन्नदाता कहते हैं, आदिवासी और बहुजन समुदायों के ये ज्यादातर आंदोलनकारी, छोटे स्तर के या भूमिहीन किसान हैं, घिसी हुई, मरम्मत की हुई चप्पलें, फटी हुई एड़ियां, अंगूठों और एड़ियों से रिसता खून लेकिन चेहरे  दमकते हुए, हंसते हुए और मुट्ठियां कसी हुईं, ये तस्वीरें अपने आप में ख़ास इसलिए भी थी क्योंकि ये तस्वीरें किसानों के हौसले और हिम्मत की नयी नयी कहानी लिख रही थी। कहने को तो मुंबई में करीब 25 हजार किसानों और आदिवासियों का यह विशाल अनुशासित हुजूम वाम संगठन अखिल भारतीय किसान सभा की अगुवाई में उतरा है लेकिन बात इनके वाम या किसी और दल के समर्थक किसान होने की नहीं है, बल्कि बात यही है कि इनका रंग या राजनीति देखकर इनसे मुंबई में किसी ने मुंह नहीं मोड़ा है। बोर्ड परीक्षाओं का ध्यान रखते हुए मुंबई में रविवार को दाखिल हुए किसानों को जगह जगह पानी पिलाने और नाश्ता कराने के लिए स्टॉल लगा दिए गए थे, मुंबई ने भी दिल खोलकर अपने अन्नदाता का स्वागत किया।

ऐसा संभवत पहली बार हो रहा था कि किसी राजनीतिक संगठन के आंदोलन का लोग तमाम विचारधाराओं से ऊपर उठकर स्वागत कर रहे थे, कहीं सिखों ने लंगर खोल दिए तो मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसा लगता था कि असली भारत की तस्वीर तो यहीं नुमाया है, देशभक्ति और राष्ट्रवाद का राग अलापते रहने वाली शक्तियों को भी मानो ये नागरिक गठबंधन एक संदेश देने की कोशिश कर रहा था, महाराष्ट्र में सत्ताधारी बीजेपी या शिवसेना हो या एमएनएस या कांग्रेस, एनसीपी- सारे दल इन किसानों के समर्थन में रहे, लेकिन किसान किसी राजनीतिक दल की सहानुभूति का नहीं बल्कि सरकार के ठोस फैसले का इंतजार कर रहे थे। आज़ाद मैदान में सुबह पांच बजे से धरना जारी था, किसान विधानभवन का घेराव करने का मन बना रहे थे लेकिन पुलिस की इतनी तगड़ी व्यवस्था थी कि किसानों को आज़ाद मैदान से बाहर भी नहीं जाने दिया जा रहा था। चूँकि सरकार पहले ही मांगों को मनाने के लिए सकारात्मक रुख अख्तियार किये हुई थी लिहाजा किसान प्रतिनिधि मंडल ही सरकार के कमिटी और सीएम देवेंद्र फडणवीस से मुलाक़ात करती। यह उल्लेखनीय है कि पिछले साल नवंबर में महाराष्ट्र सरकार ने किसानों की कर्ज माफी का ऐलान किया था, 31 लाख से ज़्यादा किसानों के बैंक खातों में 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा ट्रांसफर कर दिए गए हैं, लेकिन वास्तविक कर्ज माफी अभी दूर है, तमाम मांगों में से स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने, कुछ आदिवासी किसान समुदाय ऐसे हैं जो जंगल की जमीन पर पीढ़ी दर पीढ़ी बरसों से फसल उगाते आ रहे हैं, वनभूमि अधिकार अधिनियम, 2006 के मुताबिक एक दशक पहले ही उन्हें वह जमीन कानूनी तौर पर सौंप दी जानी चाहिए थी, मगर ऐसा नहीं हुआ, किसानों के लिए फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी की मांग सरकार के सामने मुँह बाए खड़ी थी। इस बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सहयोगियों के साथ विधानसभा में किसान प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक की। करीब साढ़े तीन घंटे तक चली बैठक के बाद सरकार ने मांगे मानने का लिखित भरोसा दिया। बैठक खत्म होने के बाद नासिक के प्रभारी मंत्री गिरीश महाजन ने बताया कि किसानों की करीब 12-13 मांगे थीं, जिनमें से कई को मान लिया गया है। जो मांगें मानी गई हैं उसका लिखित ड्रॉफ्ट तैयार किया गया है। बैठक के बाद फडणवीस सरकार के तीन मंत्री चंद्रकांत पाटिल, गिरीश महाजन और शिवसेना कोटे के मंत्री एकनाथ शिंदे आजाद मैदान पहुंचे। चंद्रकांत पाटिल ने किसानों के बीच कहा कि सरकार ने उनकी मांगें मान ली है। जिस तरह से ये पैदल मार्च ऐतिहासिक रहा वही 25 साल के राजनीतिक इतिहास में कभी इतना बड़ा लाल बादल नहीं देखा गया ।साथ ही सरकार का विधिमंड़ल सत्र शुरू रहते अबतक किसी भी प्रदर्शन और मांग पर लिखित आश्वासन दिया गया। महाराष्ट्र सरकार की ओर से मांगें मान लेने के बाद नासिक से 180 किलोमीटर पैदल मार्च कर मुंबई पहुंचे किसानों ने अपना आंदोलन खत्म कर दिया है, इन मांगों में सरकार की कर्ज माफी के दायरे के बाहर रह गए किसानों को शामिल करना और बॉलवॉर्म की मार से पीड़ित किसानों को मुआवजा देना शामिल है,  सरकार ने वनाधिकार कानून के तहत किसानों कों जमीन का हक भी देगी, किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक उनकी फसल की ऊंची कीमत भी दिलाई जाएगी।
लेकिन सीएम फड़णवीस का यह कहना कि मोर्चे में शामिल किसान यह असलमे किसान नही वह 95 फीसदी आदिवासी है। सीएम का यह बयान बेहद गैरजिम्मेदाराना था। सीएम फड़णवीस के बाद सांसद पूनम महाजन ने तो  यह कहकर कहर कर दीया की मोर्चे के पिछे शहरी माओवादियोंका हाथ है।

इन  दोनों बयानोने मोर्चे में पैदल शामिल किसानोंकी बुरितरहसे अवहेलना की। 
बाकी विपक्ष ने सरकार को यह कहकर जमकर लताड़ा की सरकार को  सड़क पर पैदल चलनेवाले भूखे और प्यासे किसानोंकी इतनिही फिक्र थी तो वह खुद बीच रास्ते क्यो नही मिलने गए।ताकि उनको 180 किलोमीटर चलने की जरूरत ना पड़ती।
किसानों का यह पहला आंदोलन नहीं था, पिछले साल भी किसानों ने कर्ज माफी और अपनी फसलों की ज्यादा कीमत के सवाल पर आंदोलन छेड़ा था, इसके बाद सरकार ने कर्ज माफी की योजना घोषित की थी, लेकिन यहाँ सवाल खड़ा होता है कि महाराष्ट्र में बार-बार क्यों खड़े होते हैं किसान आंदोलन, सरकार से क्या चाहते हैं किसान और क्या हैं उनकी परेशानियों का हल – महाराष्ट्र में लगभग 52 फीसदी लोगो की जीविका खेतीबाड़ी है और इससे जुडी गतिविधियां है, कृषि की लिहाज से यूपी के बाद महाराष्ट्र सबसे अहम् है। महाराष्ट्र राज्य गन्ने और कपास के मामले में दूसरा बड़ा राज्य है, दलहन को लेकर देश भर में महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर है, इसके आलावा राज्य में टमाटर, प्याज, ज्वार, बाजरा, अंगूर, अनार का भी बड़ा उत्पादक है। लेकिन महाराष्ट्र में एक बड़ी समस्या है पानी की। राज्य के मराठवाड़ा और विदर्भ में पानी की भारी कमी है और किसानों की पैदावार बारिश के पानी पर ही निर्भर है और सिंचित क्षेत्र की भी कमी है इसलिए यहाँ कई बार पैदावार की भी कमी है और सूखे की वजह से फसल मारी भी जाती है ।  यही कारन है कि यहाँ किसान हताश और बेबस होकर मौत को गले लगाता है। महाराष्ट्र में विपक्षी दलों आकड़ों की माने तो राज्य में पिछले तीन साल की बीजेपी सरकार के कार्यकाल में 10,000 किसानों ने फ़सल ख़राब होने और क़र्ज़ के चलते आत्महत्या कर ली है। इन सब के बीच महाराष्ट्र में सरकारें आती गई, सरकारों द्वारा आश्वासने कई मिली लेकिन देश के अन्नदाता की हालात में कोई बदलाव नहीं आया। अगर यही स्तिथि रही तो वो दिन दूर नहीं जब देश में एक एक खाने के दाने के लिए मोहताज हो जायेगा।

(इस कहानी में अतिरिक्त योगदान मनोज भोयर द्वारा दिया गया है)