हिमालय में सर्दियों के दौरान बर्फ़बारी तेज़ी से घट रही है। वैज्ञानिक अध्ययनों और मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, यह गिरावट केवल एक साल की घटना नहीं बल्कि लंबे समय से जारी एक गंभीर रुझान है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और पश्चिमी विक्षोभों की कमजोरी इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं, जिसका असर करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और पर्यावरण पर पड़ रहा है।
हिमालय में सर्दियों की बर्फ़बारी क्यों घट रही है?
पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में पिछले कुछ दशकों में सर्दियों के मौसम का स्वरूप बदल गया है। जहां पहले दिसंबर से फरवरी तक पहाड़ मोटी बर्फ़ की चादर से ढके रहते थे, वहीं अब कई इलाक़ों में पहाड़ नंगे और पथरीले दिखाई देने लगे हैं।
1980 से 2020 के औसत आंकड़ों की तुलना में, पिछले पाँच वर्षों में बर्फ़बारी में स्पष्ट कमी दर्ज की गई है। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण बर्फ़ गिरने की मात्रा कम हो रही है और जो थोड़ी-बहुत बर्फ़ गिरती भी है, वह तेज़ी से पिघल जाती है। निचले हिमालयी इलाक़ों में बर्फ़बारी की जगह बारिश होने लगी है, जो सर्दियों के लिए असामान्य मानी जाती है।


कम बर्फ़बारी क्यों बन रही है बड़ी चिंता?
वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालय में ‘स्नो ड्रॉट’ यानी बर्फ़ का सूखा जैसी स्थिति पैदा हो रही है। सर्दियों में जमा होने वाली बर्फ़ वसंत के मौसम में धीरे-धीरे पिघलकर नदियों का मुख्य स्रोत बनती है। यही पानी पीने, सिंचाई और हाइड्रोपावर के लिए बेहद अहम होता है।
कम बर्फ़बारी का मतलब है कि आने वाले महीनों में नदियों में पानी की उपलब्धता घट सकती है। इसके अलावा सूखी परिस्थितियों के कारण जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ रहा है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि बर्फ़ और हिमालयी ग्लेशियर पहाड़ों को मजबूती देते हैं। इनके घटने से चट्टानें अस्थिर हो रही हैं, जिससे भूस्खलन, ग्लेशियर झीलों के फटने और मलबा बहने जैसी आपदाएं पहले से ज़्यादा आम हो रही हैं।


भारत और पड़ोसी देशों में क्या कह रहे हैं आंकड़े?
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, दिसंबर महीने में लगभग पूरे उत्तर भारत में बारिश और बर्फ़बारी न के बराबर रही। विभाग का अनुमान है कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत उत्तर-पश्चिमी भारत में जनवरी से मार्च के बीच लंबी अवधि के औसत की तुलना में बारिश और बर्फ़बारी में लगभग 86 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।
सिर्फ़ भारत ही नहीं, नेपाल जैसे केंद्रीय हिमालयी देशों में भी यही स्थिति है। वहां पिछले कई वर्षों से सर्दियों में बारिश और बर्फ़बारी लगातार कम हो रही है। कुछ इलाक़ों में हाल के वर्षों में भारी बर्फ़बारी की घटनाएं ज़रूर हुई हैं, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि ये सामान्य मौसमी प्रक्रिया नहीं बल्कि अस्थिर और चरम मौसम की घटनाएं हैं।



