भारत में गाय का दूध सिर्फ दैनिक आहार का हिस्सा नहीं, बल्कि पोषण, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि दूध प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन B12, D और आवश्यक वसा का संतुलित स्रोत है। वहीं A2 और A1 दूध को लेकर बहस तेज हो रही है। देश आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है और डेयरी उद्योग करोड़ों लोगों की आय का सहारा बना हुआ है।
पोषण का वैज्ञानिक आधार दूध क्यों है ‘कम्प्लीट फूड’?
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार गाय का दूध “कम्प्लीट फूड” के रूप में जाना जाता है क्योंकि इसमें शरीर के लिए आवश्यक लगभग सभी प्रमुख पोषक तत्व मौजूद होते हैं। औसतन 100 मिलीलीटर गाय के दूध में:
1. ऊर्जा: 60–70 कैलोरी
2. प्रोटीन: 3.2 ग्राम
3. वसा (Fat): 3.5–4.0 ग्राम
4. कार्बोहाइड्रेट (लैक्टोज): 4.5–5 ग्राम
5. कैल्शियम: लगभग 120 मिलीग्राम
6. फॉस्फोरस: 90–95 मिलीग्राम
7. विटामिन B2 (राइबोफ्लेविन)
8. विटामिन B12
9. विटामिन A और D (फोर्टिफाइड दूध में अधिक)
दूध में मौजूद कैसीन और व्हे प्रोटीन शरीर की मांसपेशियों के विकास और मरम्मत में मदद करते हैं। बच्चों और किशोरों में हड्डियों की वृद्धि के लिए कैल्शियम और फॉस्फोरस अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। बुजुर्गों में ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव में भी दूध उपयोगी माना जाता है। हालांकि, जिन लोगों को लैक्टोज असहिष्णुता (Lactose intolerance) होती है, उन्हें दूध पचाने में दिक्कत हो सकती है। ऐसे लोगों के लिए दही, छाछ या लैक्टोज-फ्री विकल्प बेहतर माने जाते हैं।
A2 बनाम A1 दूध क्या है अंतर और क्या कहता है शोध?
हाल के वर्षों में A2 दूध को लेकर बाजार और उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ी है। दूध में पाए जाने वाले बीटा-केसीन प्रोटीन के दो प्रकार हैं A1 और A2
A2 प्रोटीन: देसी भारतीय नस्लों जैसे गीर, साहीवाल, थारपारकर और रेड सिंधी गायों में पाया जाता है।
A1 प्रोटीन: अधिकतर यूरोपीय नस्लों जैसे होल्स्टीन फ्रिज़ियन और जर्सी में मिलता है।
कुछ अध्ययनों में संकेत मिले हैं कि A2 दूध पाचन में अपेक्षाकृत आसान हो सकता है और पेट संबंधी असुविधा कम कर सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में इस विषय पर अभी पूर्ण सहमति नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दूध की गुणवत्ता केवल A1 या A2 पर निर्भर नहीं करती, बल्कि पशु के आहार, पालन-पोषण और दुग्ध प्रसंस्करण की स्वच्छता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
कौन-सी गाय का दूध है बेहतर?
भारत में देसी नस्लों की गायों का महत्व ऐतिहासिक रूप से रहा है। प्रमुख नस्लें हैं:
1. गीर (गुजरात) – उच्च गुणवत्ता वाला A2 दूध, 4–5% तक वसा
2. साहीवाल (पंजाब-हरियाणा) – रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक
3. थारपारकर (राजस्थान) – गर्म जलवायु में टिकाऊ
4. रेड सिंधी – स्थिर दूध उत्पादन
देसी नस्लों का दूध वसा और पोषक तत्वों में समृद्ध माना जाता है। वहीं विदेशी या क्रॉस-ब्रीड गायें अधिक मात्रा में दूध देती हैं, जिससे वाणिज्यिक उत्पादन में लाभ होता है। “सबसे अच्छा दूध” व्यक्ति की जरूरत और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। बच्चों और एथलीट्स के लिए उच्च प्रोटीन और कैल्शियम उपयोगी होता है, जबकि कम वसा वाले विकल्प हृदय रोगियों के लिए बेहतर माने जाते हैं।
डेयरी उद्योग ग्रामीण भारत की आर्थिक ताकत
भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। हालिया सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश का वार्षिक दूध उत्पादन 220 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। पिछले एक दशक में इसमें लगभग 5–6% वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है। डेयरी क्षेत्र का योगदान केवल पोषण तक सीमित नहीं, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
करोड़ों किसान, विशेषकर महिलाएं, इस क्षेत्र से जुड़ी हैं। सहकारी मॉडल (जैसे अमूल) ने किसानों को सीधे बाजार से जोड़ा।
वैल्यू-एडेड उत्पाद घी, पनीर, मक्खन, दही, फ्लेवर्ड मिल्क — की मांग तेजी से बढ़ रही है।
ऑर्गेनिक और A2 दूध का शहरी बाजार में ऊंचा मूल्य मिल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोल्ड-चेन, पशु-चिकित्सा सुविधाओं और डिजिटल सप्लाई चेन में निवेश बढ़े, तो भारत का डेयरी निर्यात और तेज़ी से बढ़ सकता है।
क्या आगे बढ़ेगा दूध का महत्व?
स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, प्रोटीन युक्त आहार की मांग और फिटनेस ट्रेंड के कारण दूध और डेयरी उत्पादों की खपत में इजाफा होने की संभावना है। हालांकि, साथ ही प्लांट-बेस्ड विकल्प (सोया, बादाम, ओट मिल्क) भी बाजार में जगह बना रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार में दूध का स्थान अभी भी मजबूत है, बशर्ते उसका उत्पादन सुरक्षित और स्वच्छ हो।
गाय का दूध पोषण, परंपरा और अर्थव्यवस्था तीनों का संगम है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रोटीन, कैल्शियम और आवश्यक विटामिन का समृद्ध स्रोत है। A2 और A1 की बहस के बीच भी विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि गुणवत्ता, स्वच्छता और संतुलित सेवन सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।
भारत में डेयरी उद्योग न केवल स्वास्थ्य बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा है। बदलते समय में तकनीक और शोध के सहारे यह क्षेत्र और अधिक सशक्त हो सकता है।
‘सफेद सोना’ कहे जाने वाले दूध की ताकत आने वाले वर्षों में भी भारतीय अर्थव्यवस्था और जनस्वास्थ्य का आधार बनी रह सकती है।