Vivad पर Election Commission का Response क्या है?

The CSR Journal Magazine
चुनाव आयोग में कथित अंदरूनी मतभेद को लेकर The Indian Express की रिपोर्ट सामने आने के बाद Election Commission ने बुधवार को अपना पक्ष रखा है। आयोग के अधिकारियों ने कहा कि Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े फैसलों समेत आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं और तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं। यह प्रतिक्रिया उस रिपोर्ट के बाद आई है, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में इन आपत्तियों को Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटा तक पहुंच, नाम हटाने और पश्चिम बंगाल में अपील जैसी प्रक्रियाओं से जोड़ा गया है।

आयोग ने सबसे पहले क्या साफ किया?

Election Commission के सूत्रों ने कहा कि आयोग के किसी भी फैसले को अकेले CEC ज्ञानेश कुमार ने नहीं लिया। अधिकारियों के मुताबिक SIR हो या मतदाता सूची से जुड़ा कोई अन्य निर्णय, उसे तीनों सदस्यों की मंजूरी प्राप्त थी। आयोग का यह बयान उस धारणा का जवाब माना जा रहा है, जो Indian Express की रिपोर्ट सामने आने के बाद बनी कि तीन सदस्यीय आयोग के भीतर गंभीर मतभेद हैं। आयोग से जुड़े अधिकारियों ने ऐसी तस्वीर को खारिज करते हुए कहा कि अंतिम निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए।

लेकिन फिर 14 आपत्तियों का क्या?

यहीं इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। Indian Express ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि संधू और जोशी ने अलग-अलग मौकों पर आयोग के भीतर कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में कुछ अपीलों की प्रक्रिया और गोवा में सॉफ्टवेयर से जुड़ी समस्या जैसे मुद्दे शामिल थे। लेकिन आयोग की ओर से दिया गया जवाब यह है कि इन चिंताओं के बावजूद अंतिम निर्णय तीनों आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए। यानी आयोग के जवाब और मीडिया रिपोर्ट के बीच मुख्य अंतर यह है कि रिपोर्ट में लिखित आपत्तियों और प्रक्रियागत सवालों को सामने रखा गया है, जबकि आयोग अंतिम फैसलों की सर्वसम्मति पर जोर दे रहा है।

Form-6 पर क्या विवाद था?

Indian Express के मुताबिक नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से जुड़ा एक सवाल जोड़ा गया था। रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर सवाल उठाया था और सुखबीर सिंह संधू ने भी इस पर सहमति जताई थी। बाद में संधू ने कथित तौर पर इस बदलाव को अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए हटाने की मांग की थी। आयोग की बुधवार की प्रतिक्रिया में इस विशिष्ट आपत्ति का अलग से विस्तृत जवाब सामने नहीं आया। आयोग ने व्यापक रूप से कहा कि सभी निर्णय तीनों आयुक्तों की मंजूरी से हुए।

मतदाता डेटा को लेकर क्या कहा गया?

दूसरा मुद्दा मतदाता सूची के डिजिटल डेटा और उसके नियंत्रण का है। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर चिंता जताई थी कि मतदाता डेटाबेस का नियंत्रण धीरे-धीरे केंद्रीय स्तर पर जा रहा है और राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने इस पर ऑडिट कराने की बात भी कही थी। आयोग की ओर से जारी प्रतिक्रिया में हालांकि इस आरोप को लेकर कोई विस्तृत तकनीकी स्पष्टीकरण सामने नहीं आया। आयोग ने मुख्य रूप से यह स्पष्ट किया कि SIR समेत उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

पश्चिम बंगाल और गोवा का मामला

Indian Express ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़ी अपीलों और गोवा में 97 पात्र मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल न होने की घटना को भी अपनी रिपोर्ट में उठाया है। गोवा मामले में रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय अधिकारियों ने दस्तावेजों के आधार पर 97 मतदाताओं को पात्र पाया था, लेकिन सॉफ्टवेयर में उस निर्णय को दर्ज करने की सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी। आयोग की तरफ से फिलहाल जो सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने आया है, उसमें इन दोनों मामलों पर अलग-अलग विस्तृत जवाब देने के बजाय यह कहा गया है कि मतदाता सूची संशोधन से जुड़े अंतिम फैसले भी आयोग की सामूहिक मंजूरी से हुए।

तो क्या आयोग ने 14 आपत्तियों से इनकार किया?

उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर तस्वीर थोड़ी अलग है। आयोग के अधिकारियों ने यह नहीं कहा कि दोनों आयुक्तों ने कोई चिंता उठाई ही नहीं थी। बल्कि रिपोर्टों में अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि दोनों आयुक्तों ने अलग-अलग राज्यों में नाम हटाने और मतदाता डेटा से जुड़े मुद्दे उठाए थे। लेकिन आयोग का जोर इस बात पर है कि इन चिंताओं का मतलब यह नहीं है कि अंतिम निर्णय बिना उनकी मंजूरी के लिए गए। यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम बिंदु है।

अब विवाद में दो अलग तस्वीरें

एक तरफ Indian Express की जांच में दस्तावेजों के आधार पर दोनों चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों का जिक्र है। दूसरी तरफ Election Commission कह रहा है कि आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए। इसलिए अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि आयोग के भीतर कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज होने की मीडिया रिपोर्ट सामने आई है, जबकि Election Commission ने अंतिम निर्णयों में किसी असहमति से इनकार करते हुए उन्हें सर्वसम्मत बताया है।
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